सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- शिर, पाद, नेत्र, अनेक पाठवान् पुरुष ) पुरुषसूक्त, तथा विकसित कमलके समान जिनके नेत्र चार भुजासे युक्त शंख, चक्र, गदादि आयुधोंको धारण किये पीताम्बर कौस्तुभ श्रीवत्सादि भूषणोंसे भूषित अद्भुत बालकको श्रीवसुदेवजी देखते हुए इत्यादि पुराण प्रमाणोंसे सिद्ध नरसिंह शरीर असत् नहीं हो सकता अत' हमारा अभिमत देहनित्यत्व अत्यन्त अदृष्ट न होनेसे मोक्षार्थियोंको रसायनसे शरीर स्थैर्य्यही सम्पादन करना चाहिये ॥ १२ ॥ अतएवोक्तम्-“आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् । श्रेय पर किमप्यन्यच्छरीरमजरामरं विहायैकम्॥” इति । अजरा- मरीकरणसमर्थश्च रसेन्द्र एव । तदाह-“एकोऽसौ रसराज शरीरमजरामरं कुरुते” इति ॥ किं वर्ण्यते रसस्य माहात्म्यं दर्शनस्पर्शनादिनापि महत्फलं भवति । तदुक्तं रसार्णवे- “दर्शनात् स्पर्शनात्तस्य भक्षणात् स्मरणादपि । पूजनाद्रसदा- नाच्च दृश्यते षड्विधं फलम् ॥ १३ ॥ अतएव कहा है कि विद्याका स्थान धर्म अर्थ काम और मोक्षका मूल परमश्रेष्ठ अजर अमर शरीरको छोडकर अन्य श्रेष्ठ क्या हो सकता है अजर और अमरका साधक केवल रसन्द्रही है रसका माहात्म्य कहाँतक वर्णन करें। दर्शन, स्पर्शन, भक्षण, स्मरण, पूजन और रसदानसे षड्विध फल होते हैं ॥ १३ ॥ केदारादीनि लिङ्गानि पृथिव्यां यानि कानिचित् । तानि दृष्ट्वा तु यत्पुण्यं तत्पुण्यं रसदर्शनात् ॥” इत्यादिना॥ अन्यत्रापि- “काश्यादिसर्वलिङ्गेभ्यो रसलिङ्गार्चनं शिवम् । प्राप्यते येन तल्लिङ्गं भोगारोग्यामृतामरम् ॥ ” इति ॥ १४ ॥ पृथिवीमें केदारनाथ और विश्वनाथ प्रभृति जो शिवलिङ्ग हैं उनके दर्शनसे जो पुण्य होता है वह रसके दर्शनसे हो जाता है । काशीविश्वनाथादि शिवलिङ्गके अर्चनकी अपेक्षा रसलिङ्गका अर्चन बहुत श्रेष्ठ है। क्योंकि रसलिङ्गसे भोग आरोग्य और अमृत ( मोक्ष ) तीनों प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥ रसनिन्दायां प्रत्यवायोऽपि दर्शित । “ प्रमादाद्रसनिन्दायां श्रुतायेन स्मरेत् सुधी । द्राक् त्यजेन्निन्दकं नित्यं निन्द्या