सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १८३ ) यदि कहो जीवित संसारी होता है संसाररहित मुक्त कहा जाता है तब परस्पर विरुद्ध जीवत्व मुक्तत्व एकमें कैसे रहेगा ? यह ठीक नही है मुक्ति सब दर्शनकारोको अभिमत है वह मुक्ति ज्ञानका विषय है या नही ? यदि न हो तो खरगोशके सींगके समान तुच्छ होगी । ज्ञानका विषय मानो तो जीवनके विना ज्ञातृत्व असम्भव होनेसे जीवन्मुक्तिभी सिद्ध होगी यह रसेश्वरसिद्धान्तमे प्रसिद्ध है रसाङ्गसिद्धान्तमें प्रति- पादित जीवन्मोक्षसे भिन्न २ मुक्ति और प्रमाणान्तरवादी विमुख रहते हैं परन्तु मुक्ति- को सब सिद्धान्तवादियोंके ज्ञानका विषय कहा है जीवनके विना ज्ञान नहीं हो सकता और ज्ञानके विना ज्ञेयभी नही हो सकता है अत जीवन्मोक्ष अवश्य मानना होगा ॥ १० ॥ न चेदमदृष्टचरमिति मन्तव्यं विष्णुस्वामिमतानुसारिभिः नृपञ्चास्यशरीरस्य नित्यत्वोपपादनात । तदुक्तं साकारसिद्धौ- “सच्चिन्नित्यनिजाचिन्त्यपूर्णानन्दैकविग्रहम् ॥ नृपञ्चास्यमहं वन्दे श्रीविष्णुस्वामिसम्मतम् ॥” इति ॥ ११ ॥ यह किसी सिद्धान्तमें नहीं देखा गया है ऐसा नही कह सकते क्योकि विष्णुस्वा- मिमतानुयायियोंने नृसिंहशरीरको नित्य माना है और साकारसिद्धिमे कहा है कि सत् चित् नित्य स्वकीय अचिन्त्य परिपूर्ण ज्ञान और आनन्दस्वरूप श्रीविष्णुस्वा- मीके सम्मत नरसिंहका मैं वन्दना करता हू ॥ ११ ॥ नन्वेतत् सावयवं रूपवदवभासमानं नृकण्ठीरवाङ्गं सदिति न सङ्गच्छत इत्यादिनाक्षेपपुरःसरं सनकादिप्रत्यक्षं सहस्रशीर्षा पुरुष इत्यादि श्रुति , तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शंख- गदार्युदायुधम् इत्यादिपुराणलक्षणेन प्रमाणत्रयेणसिद्धं नृपञ्चा- ननाङ्गं कथमसत् स्यादिति । सदादीनि विशेषणानि गर्भश्री- कान्तामिश्रै विष्णुस्वामिचरणपरिणतान्त करणे प्रतिपादि- तानि । तस्मादस्मदिष्टदेहनित्यत्वमत्यन्तादृष्टं न भवतीति पुरुषार्थकामुकै पुरुषैरैष्टव्यम् ॥ १२ ॥ रूपवान्के समान प्रतीयमान सावयव नृसिंह शरीर सत्य नहीं हो सकता इत्यादि आक्षेपोंका समाधानभी सनकादिकोंके प्रत्यक्ष, सहस्र शीर्षेति श्रुति ( अनेक