भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 316 में से

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पृष्ठ 189

( १८२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- सूतक करना चाहिये । हे देवि लोहे और देहमें समान विश्वास कर प्रथम लोहेमें परीक्षा कर पश्चात् देहमें प्रयोग करे ॥ ८ ॥ ननु सच्चिदानन्दात्मकपरतत्त्वस्फुरणादेव मुक्तिसिद्धौ किमनेन दिव्यदेहसम्पादनप्रयासेनेति चेत्तदेतदवातं वार्त्तशरीरालाभे तद्वार्त्ताया अयोगात् । तदुक्तं रसहृदये—“गलितानल्पविकल्पः सर्व्वाध्वविवक्षितश्चिदानन्द । स्फुरितोऽप्यस्फुरिततनोः करोति किं जन्तुवर्गस्य॥ इति। “ यं जरया जर्जरितं काशश्वा- सादिदु खविशदञ्च । योग्यं तं न समाधौ प्रतिहतबुद्धीन्द्रिय- प्रसरम् ॥ बाल षोडशवर्षो विषयरसास्वादलम्पट परत । यातविवेको वृद्धो मर्त्य कथमप्नुयान्मुक्तिम् ॥” इति च ॥ ९ ॥ सच्चिदानन्द आत्मतत्त्व प्रकाशसे ही मुक्ति हो जायगी दिव्यदेहप्राप्तिसे क्या प्रयोजन है ऐसा नहीं कह सकते क्योकि वार्त्तशरीर ( दिव्यशरीर ) न होनेसे मुक्ति की वार्त्ताभी असम्भव है । रसहृदयमे कहा है सम्पूर्ण विकल्प जालसे रहित हो ओर सर्व तीर्थंकरोका अभिमत चिदानन्द आत्मतत्त्व प्रकाशित होनेपरभी अप्रकाशित शरीरका क्या कर सकता है अर्थात् कुछभी नहीं कर सकता जो जरावस्थासे जर्ज- रित हो खाँसी श्वास आदि दु खसे पीडित हो बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यापारसे कुण्ठित हो वह समाधिके योग्य नहीं हे, बालक, सोलह वर्षका युवा, विषयभोगमें लम्पट ओर अप्राप्तविवेक वृद्ध मनुष्य किस प्रकार मुक्ति पासक्ते हैं ॥ ९ ॥ ननु जीवत्वं नाम संसारित्वं तद्विपरीतत्वं मुक्तत्वं तथा च पर- स्परविरुद्धयो कथमेकायतनत्वमुपपन्नं स्यादिति चेत्तदनुपपन्नं विकल्पाानुपपत्ते । मुक्तिस्तावत् सर्वतीर्थंकरसम्मता । सा किं ज्ञेयपदे निविशते न वा चरमे शशविषाणकल्पा स्यात् । प्रथमे न जीवनं वर्जनीयमजीवतो ज्ञातृत्वानुपपत्तेः । तदुक्तं रसे- श्वरसिद्धान्ते-“रसाङ्गम्येमार्गोक्तो जिवमोक्षोऽस्त्यधोमना । प्रमाणान्तरवादेषु युक्तिभेदावलम्बिषु ॥ ज्ञानज्ञेयमिदं विद्धि सर्वतन्त्रेषु सम्मतम् । न जीवन् ज्ञास्यति ज्ञेयं यदतोऽस्त्येन जनिनम् ॥” इति ॥ १० ॥

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