भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

( १९२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- सद्भावात् द्वित्वाद्युत्पत्तिप्रकार प्रदर्श्यते । तत्र प्रथममिन्द्रि- यार्थसन्निकर्षस्तस्मादेकत्वसामान्यज्ञानं, ततोऽपेक्षाबुद्धिः, ततो द्वित्वोत्पत्तिस्ततो द्वित्वसामान्यज्ञानं तस्माद्वित्वगुण- ज्ञानं तत संस्कारः ॥ १० ॥ द्वित्वसंख्याकी किस प्रकार उत्पत्ति है पाकजरूपादिकी उत्पत्ति एव विभाग विभागज विभाग कैसे होते हैं, इत्यादि जाननेमें जिसकी बुद्धि कुण्ठित न हो उस- को वैशेषिक कहते हैं इत्याद लोकोक्ति है । अतः द्वित्वादिकी उत्पत्तिका क्रम कहते हैं प्रथम इन्द्रियका अर्थके साथ सम्बन्ध अनन्तर एकत्वज्ञान ( अयमेकः अयमपि एक इति ) अनन्तर अपेक्षाबुद्धि ( एतदेकत्वविशिष्टोऽयमेक. ) अनन्तर द्वित्वकी उत्पत्ति ( इमौ द्वौ ) अनन्तर द्वित्वत्वसामान्य ज्ञान पश्चात् द्वित्वगुणज्ञान और तदनन्तर सस्कार कहा है ॥ १० ॥ तदाह-“आदाविन्द्रियसन्निकर्षघटनादेकत्वसामान्यधीरेकत्वो- भयगोचरा मतिरतोद्वित्व ततो जायते । द्वित्वत्वप्रमितिस्त- तोऽनुपरतो द्वित्वप्रमानन्तरं द्वे द्रव्ये इति धीरियं निगदिता द्वित्वोदयप्रक्रिया ॥” इति ॥ ११ ॥ प्रथम इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष होनेसे एकत्वसामान्यका ज्ञान होता है अनन्तर एकत्व दोनोंमें है ऐसा ज्ञान होता है अनन्तर द्वित्वकी उत्पत्ति तदुत्तर द्वित्वत्वका ज्ञान अनन्तर द्वित्वगुणज्ञान तदुत्तर दो द्रव्य हैं ऐसा बुद्धि होती है यही द्वित्वोत्पत्ति- प्रक्रिया है ॥ ११ ॥ द्वित्वादेरपेक्षाबुद्धिजन्त्यत्वे किं प्रमाणम् । अत्राहुराचार्याः- अपेक्षाबुद्धिर्द्वित्वादेरुत्पादिका भवितुमर्हति व्यञ्जकत्वानुप- पत्ते । तेनानुविधीयमानत्वात् शब्दं प्रति संयोगादिति ॥ वयं तु ब्रूमः द्वित्वादिकमेकत्वद्वयविषयानित्यबुद्धिव्यङ्ग्यं न भवति अनेकाश्रितगुणत्वात् पृथक्त्वादिवदिति ॥ १२ ॥ द्वित्वादिकी अपेक्षा बुद्धिजन्मत्वमें युक्तिभी उदयनाचार्यने कही है-कारण उत्पा- दक व्यञ्जक भेदसे दो प्रकार हैं । द्वित्वादिके प्रति अपेक्षा बुद्धि व्यञ्जक नहीं हो सकती अतः उत्पादिका है यथा दण्डभेरीके संयोगानन्तर उत्पन्नशब्दके प्रति