भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( १९० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- द्रव्यं नवविधम्-पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसीति। तत्र पृथिव्यादिचतुष्टयस्य पृथिवीत्वादिजातिर्लक्षणम् । पृथि- वीत्वं नाम पाकजरूपसामानाधिकरण्यद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्य- जातिः । अप्त्वं नाम सरित्सागरसमवेतत्वे सति सलिलसमवेत- सामान्यम् । तेजस्त्वं नाम चन्द्रचामीकरसमवेतत्वे सति ज्वलन- समवेतं सामान्यम् । वायुत्वं नाम त्वगिन्द्रियसमवेतद्रव्यत्वसा- क्षाद्व्याप्यजातिः । आकाशकालदिशामेकत्वादपरजात्यभावे पारिभाषिक्यस्तिस्रः संज्ञा भवन्ति, आकाशः कालो दिगिति । संयोगाजन्यजन्यविशेषगुणसमानाधिकरणविशेषाधिकरणमा- काशम् । विभुत्वे सति दिगसमवेतपरत्वासमवायिकारणाधि- करणं कालः । अकालत्वे सत्यविशेषगुणा महती दिक् । आत्ममनसोरात्मत्वमनस्त्वे । आत्मत्वं नाम अमूर्त्तसमवेत- द्रव्यत्वापरजातिः । मनस्त्वं नाम द्रव्यसमवायिकारणत्वरहि- ताणुसमवेतद्रव्यत्वापरजातिः ॥ ७ ॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, और मन यह नौ द्रव्य हैं। पृथिवीत्वजातिमत्त्व पृथिवीका लक्षण और जलत्वजातिमत्त्व जलका, तेजस्त्व जातिमत्त्व तेजका, वायुत्वजातिमत्त्व वायुका लक्षण है। पाकजरूप अर्थात् विजातीय तेजके संयोगसे जायमान रूप जिसमें हो उसमें रहनेवाली द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य जातित्व पृथिवीत्व है साक्षात् व्याप्य उसको कहते हैं जो स्वव्याप्यका व्याप्य न हो यथा घटत्व द्रव्यत्वका साक्षात् व्याप्य नहीं है कारण द्रव्यत्वका व्याप्य पृथिवीत्व का व्याप्य होगया पृथिवीत्वादि साक्षाद्व्याप्य है जलम समवेत जोग जलमे भिन्नमें असमवेतसामान्य जलत्व है । चन्द्रमरकतादिसमवेतत्वविशिष्ट वह्निसमवेतसामान्य तेजस्त्व जाति है। त्वगिन्द्रियमें समवेतद्रव्यत्व साक्षात् व्याप्यजाति वायुत्व है आकाश काल दिक् एक एक व्यक्ति होनेसे एक मात्र व्यक्तिसमवेतमें जातित्व न होनेके कारण द्रव्यत्व छोडकर उसमें अन्यजाति नहीं रहती है संयोगसे अजन्यविशेष गुण ( शब्द ) का आश्रय आकाश है । विभुत्वसमानाधिकरणपरत्वका असमवायिकारण परोपरोंका अधिकरण काल है । रागभिन्नत्व समानाधिकरणविशेष गुण शून्यत्ववि शिष्ट विभुत्ववान् दिक् है। आत्मा और मनका आत्मत्व जातिमत्त्व और मनस्त्वजा-