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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

( १९० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- द्रव्यं नवविधम्-पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसीति। तत्र पृथिव्यादिचतुष्टयस्य पृथिवीत्वादिजातिर्लक्षणम् । पृथि- वीत्वं नाम पाकजरूपसामानाधिकरण्यद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्य- जातिः । अप्त्वं नाम सरित्सागरसमवेतत्वे सति सलिलसमवेत- सामान्यम् । तेजस्त्वं नाम चन्द्रचामीकरसमवेतत्वे सति ज्वलन- समवेतं सामान्यम् । वायुत्वं नाम त्वगिन्द्रियसमवेतद्रव्यत्वसा- क्षाद्व्याप्यजातिः । आकाशकालदिशामेकत्वादपरजात्यभावे पारिभाषिक्यस्तिस्रः संज्ञा भवन्ति, आकाशः कालो दिगिति । संयोगाजन्यजन्यविशेषगुणसमानाधिकरणविशेषाधिकरणमा- काशम् । विभुत्वे सति दिगसमवेतपरत्वासमवायिकारणाधि- करणं कालः । अकालत्वे सत्यविशेषगुणा महती दिक् । आत्ममनसोरात्मत्वमनस्त्वे । आत्मत्वं नाम अमूर्त्तसमवेत- द्रव्यत्वापरजातिः । मनस्त्वं नाम द्रव्यसमवायिकारणत्वरहि- ताणुसमवेतद्रव्यत्वापरजातिः ॥ ७ ॥ पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, और मन यह नौ द्रव्य हैं। पृथिवीत्वजातिमत्त्व पृथिवीका लक्षण और जलत्वजातिमत्त्व जलका, तेजस्त्व जातिमत्त्व तेजका, वायुत्वजातिमत्त्व वायुका लक्षण है। पाकजरूप अर्थात् विजातीय तेजके संयोगसे जायमान रूप जिसमें हो उसमें रहनेवाली द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य जातित्व पृथिवीत्व है साक्षात् व्याप्य उसको कहते हैं जो स्वव्याप्यका व्याप्य न हो यथा घटत्व द्रव्यत्वका साक्षात् व्याप्य नहीं है कारण द्रव्यत्वका व्याप्य पृथिवीत्व का व्याप्य होगया पृथिवीत्वादि साक्षाद्व्याप्य है जलम समवेत जोग जलमे भिन्नमें असमवेतसामान्य जलत्व है । चन्द्रमरकतादिसमवेतत्वविशिष्ट वह्निसमवेतसामान्य तेजस्त्व जाति है। त्वगिन्द्रियमें समवेतद्रव्यत्व साक्षात् व्याप्यजाति वायुत्व है आकाश काल दिक् एक एक व्यक्ति होनेसे एक मात्र व्यक्तिसमवेतमें जातित्व न होनेके कारण द्रव्यत्व छोडकर उसमें अन्यजाति नहीं रहती है संयोगसे अजन्यविशेष गुण ( शब्द ) का आश्रय आकाश है । विभुत्वसमानाधिकरणपरत्वका असमवायिकारण परोपरोंका अधिकरण काल है । रागभिन्नत्व समानाधिकरणविशेष गुण शून्यत्ववि शिष्ट विभुत्ववान् दिक् है। आत्मा और मनका आत्मत्व जातिमत्त्व और मनस्त्वजा-

  • दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १९१ ) तिमत्त्व लक्षण है । मूर्त्तिभिन्न द्रव्यसमवेत जाति आत्मत्व है । मनस्त्व द्रव्यसमवायि- कारणत्वसे भिन्न अणुसमवेतद्रव्यत्व व्याप्य जाति है ॥ ७ ॥ रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापर- त्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्च कण्ठोक्ताः सप्तदश चशब्दस- मुच्चिताः गुरुत्वद्रवत्वस्नेहसंस्कारादृष्टशब्दाः सप्तैवेत्येवं चतु- र्विंशतिर्गुणा । तत्र रूपादि शब्दान्तानां रूपत्वादिजातिर्लक्ष- णम् । रूपत्वं नाम नीलसमवेतगुणत्वापरजातिः । अनया दिशा शिष्टानां लक्षणानि द्रष्टव्यानि ॥ कर्म पञ्चविधम्-उत्क्षेपणाकु- ञ्चनप्रसारणगमनभेदात् । भ्रमणरेचनादीनां गमन एवान्त- र्भावः । उत्क्षेपणादीनामुत्क्षेपणत्वादिजातिर्लक्षणम् । तत्र उत्क्षेपणत्वं नाम ऊर्ध्वदेशसंयोगासमवायिकारणप्रमेयसमवेत- कर्मत्वापरजाति । एवमवक्षेपणादीनां लक्षणं कर्त्तव्यम् ॥ ८ ॥ रूपादि १७ गुण सूत्रमें कण्ठतः पठित हैं सूत्रस्य चशब्दसे गुरुत्वादिसात गुणका संग्रह है सब मिलकर २४ गुण हैं । पूर्वोक्त प्रकार रूपत्वादि जातिमत्त्व इनका लक्षण है। नीलवर्णमें समवायसम्बन्धसे विद्यमान गुणत्व साक्षात् व्याप्यजाति है इस प्रकार अन्यका भी लक्षण समझलेना। उत्क्षेपणादि भेदोंसे कर्म पाच प्रकार हैं भ्रमण, रेचन, स्यन्दन, ऊर्ध्वज्वलन और तिर्यग्गमन, यह पाँचों गमनहीमें अन्तर्भूत हैं उत्क्षेपणत्व ऊर्ध्वदेश संयोगका असमवायिकारण वस्तुसमवेत कर्मत्व व्याप्यजाति है इसी प्रकार अपक्षेपणादिका भी लक्षण है ॥ ८ ॥ सामान्यं द्विविधं परमपरञ्च । परं सत्ता द्रव्यगुणसमवेता गुण- कर्मसमवेता वा, अपरं द्रव्यत्वादि तल्लक्षणं प्रागेवोक्तम् । विशे- षाणामनन्तत्वात् समवायस्य चैकत्वाद्विभागो न सम्भवति । तल्लक्षणञ्च प्रागेवावादि ॥ ९ ॥ परत्व अपरत्व भेदसे सामान्य दो प्रकार है । द्रव्य गुण कर्मसमवेत सत्ता जाति पर सामान्य अपर पूर्वोक्त द्रव्यत्वादि है विशेषण अनन्तरूप और समवाय एक होनेसे उसका विभाग असम्भव है ॥ ९ ॥ “द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे । यस्य न स्ख- लिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥” इति आभाणकस्य

( १९२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ औलूक्य- सद्भावात् द्वित्वाद्युत्पत्तिप्रकार प्रदर्श्यते । तत्र प्रथममिन्द्रि- यार्थसन्निकर्षस्तस्मादेकत्वसामान्यज्ञानं, ततोऽपेक्षाबुद्धिः, ततो द्वित्वोत्पत्तिस्ततो द्वित्वसामान्यज्ञानं तस्माद्वित्वगुण- ज्ञानं तत संस्कारः ॥ १० ॥ द्वित्वसंख्याकी किस प्रकार उत्पत्ति है पाकजरूपादिकी उत्पत्ति एव विभाग विभागज विभाग कैसे होते हैं, इत्यादि जाननेमें जिसकी बुद्धि कुण्ठित न हो उस- को वैशेषिक कहते हैं इत्याद लोकोक्ति है । अतः द्वित्वादिकी उत्पत्तिका क्रम कहते हैं प्रथम इन्द्रियका अर्थके साथ सम्बन्ध अनन्तर एकत्वज्ञान ( अयमेकः अयमपि एक इति ) अनन्तर अपेक्षाबुद्धि ( एतदेकत्वविशिष्टोऽयमेक. ) अनन्तर द्वित्वकी उत्पत्ति ( इमौ द्वौ ) अनन्तर द्वित्वत्वसामान्य ज्ञान पश्चात् द्वित्वगुणज्ञान और तदनन्तर सस्कार कहा है ॥ १० ॥ तदाह-“आदाविन्द्रियसन्निकर्षघटनादेकत्वसामान्यधीरेकत्वो- भयगोचरा मतिरतोद्वित्व ततो जायते । द्वित्वत्वप्रमितिस्त- तोऽनुपरतो द्वित्वप्रमानन्तरं द्वे द्रव्ये इति धीरियं निगदिता द्वित्वोदयप्रक्रिया ॥” इति ॥ ११ ॥ प्रथम इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष होनेसे एकत्वसामान्यका ज्ञान होता है अनन्तर एकत्व दोनोंमें है ऐसा ज्ञान होता है अनन्तर द्वित्वकी उत्पत्ति तदुत्तर द्वित्वत्वका ज्ञान अनन्तर द्वित्वगुणज्ञान तदुत्तर दो द्रव्य हैं ऐसा बुद्धि होती है यही द्वित्वोत्पत्ति- प्रक्रिया है ॥ ११ ॥ द्वित्वादेरपेक्षाबुद्धिजन्त्यत्वे किं प्रमाणम् । अत्राहुराचार्याः- अपेक्षाबुद्धिर्द्वित्वादेरुत्पादिका भवितुमर्हति व्यञ्जकत्वानुप- पत्ते । तेनानुविधीयमानत्वात् शब्दं प्रति संयोगादिति ॥ वयं तु ब्रूमः द्वित्वादिकमेकत्वद्वयविषयानित्यबुद्धिव्यङ्ग्यं न भवति अनेकाश्रितगुणत्वात् पृथक्त्वादिवदिति ॥ १२ ॥ द्वित्वादिकी अपेक्षा बुद्धिजन्मत्वमें युक्तिभी उदयनाचार्यने कही है-कारण उत्पा- दक व्यञ्जक भेदसे दो प्रकार हैं । द्वित्वादिके प्रति अपेक्षा बुद्धि व्यञ्जक नहीं हो सकती अतः उत्पादिका है यथा दण्डभेरीके संयोगानन्तर उत्पन्नशब्दके प्रति

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । (१९३) संयोगकारण हे एवम् अपेक्षा बुद्धिके अनन्तर उत्पन्न द्वित्वके उक्त प्रति अपेक्षाबुद्धि उत्पादिका है मैं कहता हू द्वित्वादि एकत्वद्वय (एक एक) विषय अनित्यबुद्धि व्यङ्ग नहीं हो सकती क्योंकि पृथक्त्वादिवत् अनेकमें रहनवालागुण है ॥ १२ ॥ निवृत्तिक्रमो निरूप्यते । अपेक्षाबुद्धित एकत्वसामान्यज्ञानस्य द्वित्वोत्पत्तिसमकालं निवृत्तिः, अपेक्षाबुद्धेर्द्वित्वसामान्यज्ञा- नात् द्वित्वगुणबुद्धिसमसमयं, द्वित्वस्यापेक्षाबुद्धिनिवृत्तेर्द्रव्यबु- द्धिसमकालं, गुणबुद्धेः, द्रव्यबुद्धितः संस्कारोत्पत्तिसमकालं द्रव्यबुद्धेस्तदनन्तरं संस्कारादिति ॥ १३ ॥ निवृत्तिक्रम कहते हैं-अपेक्षाबुद्धिसे द्वित्वोत्पत्तिकालमें एकत्वसामान्यज्ञानकी निवृत्ति होती है । द्वित्वत्वसामान्यज्ञानके अनन्तर द्वित्वगुणसमकालमें द्वित्वोत्पादक अपेक्षाबुद्धिकी निवृत्ति होती है अपेक्षाबुद्धिनाशके अनन्तर द्रव्यगुण समकालमें द्वित्वकी निवृत्ति है द्रव्यबुद्धिसे संस्कारोत्पत्तिकालमें गुणबुद्धिकी निवृत्ति होती है अनन्तर सस्कारसे द्रव्यबुद्धिकी निवृत्ति होती है ॥ १३ ॥ तथा च संग्रहश्लोकाः । "आदावपेक्षाबुद्ध्या हि नश्येदेकत्व- जातिधी । द्वित्वोदयसमं पश्चात् सा च तज्जातिबुद्धितः ॥ द्वित्वाख्यगुणधीकाले ततो द्वित्वं निवर्त्तते । अपेक्षाबुद्धिना- शेन द्रव्यधीजन्मकालत ॥ गुणबुद्धिर्द्रव्यबुद्ध्या संस्कारोत्प- त्तिकालत. ॥ द्रव्यबुद्धिश्च संस्कारादिति नाशक्रमो मतः ॥ "इति ॥ बुद्धेर्बुद्धयन्तरविनाश्यत्वे संस्कारविनाश्य- त्वे च प्रमाणं विवादाध्यासितानि ज्ञानानि उत्तरोत्तरकार्यनि- नाश्यनि क्षणिकविभुविशेषगुणत्वात् शब्दवत् । द्रव्यारम्भ- कसंयोगप्रतिद्वन्द्विविभागजनककर्मसमकालमेकत्वसामान्यचि- न्तया आश्रयनिवृत्तेरेव द्वित्वनिवृत्ति कर्मसमकालमपेक्षाबुद्धि- चिन्तनादुभाभ्यामिति संक्षेपः । अपेक्षाबुद्धिर्नाम विनाशकनि- नाशप्रतियोगिनी बुद्धिरिति वोद्धव्यम् ॥ १४ ॥ इसीका सग्रह श्लोकोंमे किया है प्रथम अपेक्षाबुद्धिमे द्वित्वोत्पत्तिसमकालमें एकत्व बुद्धिका नाश होता है इत्यादि सब पूर्वोक्तही अर्थ है पूर्वपूर्व ज्ञानके उत्तरोत्तर ज्ञान १३

( १९४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ औलूक्य-

और संस्कारमे विनाशमें प्रमाण यह है कि शब्दवत् व्यापकद्रव्यका क्षणिकविशेष गुण होनेसे विवादग्रस्त ज्ञान स्वोत्तर उत्पद्यमान कार्य (गुण) से नष्ट होता है इत्यादि अनुमान है द्रव्यके आरम्भक संयोगके विरोधी विभागोत्पादक कर्म्मके समकालमें एकत्वज्ञानसे आश्रयकी निवृत्ति होती है कर्म समकालमें अपेक्षाबुद्धि- संस्कारसे अपेक्षाबुद्धि और आश्रयबुद्धि दोनोंकी निवृत्ति होती है। विनाशककी विना शक बुद्धि अपेक्षाबुद्धि है। मुक्तावलीमें अनेक एकत्व (अयमेक अयमेक इत्यादि) बुद्धिको अपेक्षाबुद्धि मानी है ॥ १४ ॥ अथ द्व्यणुकनाशमारभ्य कतिभि क्षणै पुनरन्यद्द्व्यणुक- मुत्पद्य रूपादिमद्भवतीति जिज्ञासायामुत्पत्तिप्रकार कथ्यते । नोदनादिक्रमेण द्व्यणुकनाशः१, नष्टे द्व्यणुके परमाणवग्निसं- योगात् श्यामादीनां निवृत्तिः२, निवृत्तेषु श्यामादिषु पुनरन्यस्मा- दग्निसंयोगाद्रक्तादीनामुत्पत्तिः३ उत्पन्नेषु रक्तादिषु अदृष्टवदात्म- संयोगात् परमाणौ द्रव्यारम्भणाय क्रिया, तया पूर्वदेशाद्विभागः५, विभागेन पूर्वदेशसंयोगनिवृत्ति , तस्मिन्निवृत्ते परमाण्वन्तरेण संयोगोत्पत्तिः७, संयुक्ताभ्यां परमाणुभ्यां द्व्यणुकारम्भ , आरब्धे द्व्यणुके कारणगुणादिभ्यः कार्यगुणादीनां रूपादीनामुत्पत्ति- रिति यथाक्रमं नव क्षणा । दशक्षणादिप्रकारान्तरं विस्तरभया- न्नेह प्रतन्यते । इत्थं पीलुपाकप्रक्रिया । पीठपाकप्रक्रिया तु नैया- यिकधीसम्मता ॥ १५ ॥ जब द्व्यणुकनाशसे लेकर कितने क्षणमें द्व्यणुकान्तर उत्पन्न होकर रूपवान् होता है इस जिज्ञासाशान्तिके लिये उत्पत्तिक्रम कहते है-अग्निसंयोगानन्तर क्रिया पूर्वसंयोगनाशक्रमसे द्व्यणुकका नाश होता है १ द्व्यणुक नाश होनेपर अग्निसंयोग वश श्यामरूपकी निवृत्ति होती है २ श्यामतानिवृत्तिके अनन्तर पुन अग्निसंयोगसे रक्तादिरूपोंकी उत्पत्ति होती है ३ रक्तोत्पत्तिके अनन्तर अदृष्टवान् (पुण्यपापयुक्त) आत्म संयोगसे परमाणुमें द्रव्यारम्भक क्रिया होती है ४ उसी क्रियासे पूर्वदेशसे विभाग होता है ५ विभागोत्तर पूर्वसंयोगका नाश होता है ६ अनन्तर परमाण्वन्तरसे संयोग होता है ७ संयुक्तपरमाणुद्वयसे द्व्यणुकका आरम्भ होता है ८ द्व्यणुकोत्पत्तिके अन न्तरकारण (परमाणु) गुणसे कार्यगुणकी उत्पत्ति होती है ९ एव नव क्षण होते हैं

~दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १९५) दशक्षण एकादशक्षणादि क्रम मुक्तावल्यादिग्रन्थोंमें स्पष्ट हैं यही पीलुपाक ( परमाणुपाक ) वादियोंकी प्रक्रिया है। इनके मतमें परमाणुसेही रूपनाशपूर्वक रूपान्तरोत्पत्ति होती है पिठर ( द्व्यणुकादि अवयवी ) पाकवादियोंकी प्रक्रिया नैया- यिकोंके सम्मत है ॥ १५ ॥ विभागजविभागो द्विविधः । कारणमात्रविभागजः कारणाकार- णविभागजश्च । तत्र प्रथमः कथ्यते । कार्य्यव्याप्ते कारणे कर्मोत्पन्नं यदावयवान्तराद्विभागं विधत्ते न तदाकाशादिदेशा- द्विभागं ।यदात्वाकाशादिदेशाद्विभागः न तदावयवान्तरादिति स्थितिनियमः कर्मणो गगनविभागाकर्तृत्वस्य द्रव्यारम्भकसँ- योगविरोधिभागारम्भकत्वेन धूमस्य धूमध्वजसँसर्गेणैव व्यभि- चारानुपलम्भात् ततश्चावयवकर्म अवयवान्तरादेव विभागं करोति नाकाशादिदेशात् तस्माद्विभागाद्द्रव्यारम्भकसंयोगनि- वृत्तिः। तत कारणाभावात् कार्य्याभाव इति न्यायाद्वयविनि- वृत्ति , निवृत्तेऽवयविनि तत्कारणयोरवयवयोर्वर्त्तमानो विभागः कार्य्यविनाशविशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वाऽवयवमपेक्ष्य मक्रियस्यैवावयवस्य कार्य्यसंयुक्तादाकाशदेशाद्विभागमारभते न निष्क्रियस्य कारणाभावात् ॥ १६ ॥ कारणमात्र विभागज और कारणाकारणविभागज भेदसे विभागज विभाग दो प्रकार है उसमें प्रथम इस भाँति है कि कार्यसे व्याप्त कारणमें उत्पन्न कर्म्म जिस समय अवयवसे विभाग उत्पन्न करता है उस समय आकाशदेशसे विभाग नहीं होता जब आकाशदेशसे विभाग होगा तब अवयवान्तरमे न होगा ऐसा स्थितिका नियम है जिस प्रकार धूमका वह्निके साथ व्यभिचार नहीं होता है अर्थात् वह्निके अभावस्थलमें नहीं रहता है इसी प्रकार द्रव्यका आरम्भक संयोगविरोधी विभाग आरम्भक होनेसे गगनादि विभाग कर्तृत्व कर्मका नहीं रहता है। इसलिये अवयवका कर्म अवयवान्तरमे विभागोत्पादन करता है आकाशदेशमें नहीं करता अनन्तर विभागसे द्रव्यके आरम्भकप्रयोगकी निवृत्ति होती है अनन्तर कारण न होनेसे कार्य्यभी नहीं होता है इस न्यायसे अवयवी ( कार्य ) की निवृत्ति होती है अवयवकी

( १९६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ औलूक्य- निवृत्ति होनेसे उसके कारण अवयव द्वयमें वर्तमान विभाग कार्य विनाशसहकृत कालकी अथवा स्वतन्त्र अवयवकी अपेक्षा कर क्रियायुक्त अवयवको कार्यसंयुक्त आकाश देशसे विभाग उत्पन्न करता है निष्क्रियका कारणत्व नही है ॥ १६ ॥ द्वितीयस्तु हस्ते कर्मोत्पन्नमवयवान्तराद्विभागं कुर्वत् आका- शादिदेशेभ्यो विभागानारभते । ते कारणाकारणविभागाः कर्म या दिशं प्रति कार्य्यारम्भाभिमुखं तामपेक्ष्य कार्य्याका र्थ्यविभागमारभते यथा हस्ताकाशविभागाच्छरीराकाशवि- भागः । न चासौ शरीरक्रियाकार्य्यस्तदा तस्य निष्क्रियत्वात् नापि हस्तक्रियाकार्य्यं व्यधिकरणस्य कर्मणो विभागकर्तृ- त्वानुपपत्तेः । अत पारिशेष्यात् कारणाकारणविभागस्य कारणत्वमङ्गीकरणीयम् ॥ १७ ॥ कारणाकारणविभाग हस्तमें उत्पन्न कर्म अवयवान्तरसे विभाग करते हुए आकाशदेशसेभी विभाग करता है वे विभाग कारणाकारणविभाग है । जिस देशके प्रति कार्योन्मुख कर्म हो उसी देशकी अपेक्षा कार्याकार्यविभागारम्भ होता है । जैसे हाथ और व आकाशके विभागसे शरीर आकाशका विभाग होता है यह विभाग शरीरक्रियाजन्य नहीं है क्योंकि उस कालमें शरीर निष्क्रिय है न तो हस्तक्रियाजन्य है भिन्न अधिकरणवृत्तिकर्म्म अन्यका विभागजनक नही हो सकता अत परिशेषात् कारणाकारणविभागकोभी अवश्य कारण मानना चाहिये ॥ १७ ॥ यदवादि अन्धकारादौ भावत्वं निविद्यत इति तदसङ्गतं तत्र चतुर्द्धा विवादसम्भवात्। तथाहि द्रव्यं तम इति भट्ठा वेदान्ति- नश्च भणन्ति । आरोपितं नीलरूपमिति श्रीधराचार्या , आलो- कज्ञानाभाव इति प्रभाकरैकदेशिन , आलोकाभाव इति नैया- यिकादय इति चेत्तन्न द्रव्यत्वपक्षो न घटते विकल्पानुपपत्ते । द्रव्यं भवदन्धकारं द्रव्याद्यन्यतममन्यद्वा । नाद्य यत्रान्तर्भागोऽ स्य तस्य यावन्तो गुणास्तानङ्गुणकत्वप्रसङ्गात् । न च तमसो

-दर्शनम्] भाषाटीकासमेतः। ( १९७) द्रव्यबहिर्भाव इति साम्प्रतं निर्गुणस्य तस्य द्रव्यत्वासम्भवेन द्रव्यान्तरत्वस्य सुतरामसम्भवात् ॥ १८ ॥ पहिले जो कहा कि अन्धकारमें भावत्वका निषेध करते हैं सो असङ्गत है क्योंकि उसमें चार प्रकारके विवाद हो सकते हैं ( तथाहि ) मीमांसकमतावलम्बी भट्ट और वेदान्ती लोग तमको द्रव्य कहते हैं । श्रीधराचार्य नीलरूपको आरोपित कहते हैं । आलोकज्ञानाभाव तम है ऐसे प्रभाकरके अनुयायी कहते हैं । नैयायिक लोग आलोकाभावको तम कहते हैं । द्रव्यपक्ष असङ्गत है क्योंकि द्रव्य मानो तो प्रसिद्ध नवद्रव्यके अन्तर्गत मानोगे, किंवा उससे अतिरिक्त मानोगे ? अन्तर्गत मानो तो जिसमें अन्तर्भाव हो उसके सब गुण होने चाहिये परन्तु वे गुण उसमें नहीं हैं । अतिरिक्तभी नहीं मान सकते जब निर्गुण उक्त द्रव्य नहीं तो अतिरिक्तत्व कैसे होगा ॥ १८ ॥ ननु तमालश्यामलत्वेनोपलभ्यमानं तमः कथं निर्गुणं स्यादिति नीलं नभः इतिवत् भ्रान्तिरेवेत्यलं वृद्धवीवधया । अतएव नारोपितरूपं तम अधिष्ठानप्रत्ययमन्तरेणारोपायोगात् बाह्या- लोकसहकारिरहितस्य चक्षुषो रूपारोपे सामर्थ्यानुपलम्भाच्च । न चायमचाक्षुष प्रत्ययः तदनुविधानस्यानन्यथासिद्धत्वात् । न च विधिप्रत्ययवेद्यत्वायो गो भावे इति साम्प्रतं प्रलुम्विना- शावधानादिषु व्यभिचारात् । अतएव नालोकज्ञानाभावः अभावस्य प्रतियोगिग्राहकेन्द्रियग्राह्यतानियमेन मानसत्व- प्रसङ्गात् । तस्मादालोकाभाव एव तम न चाभावे भावधर्मा- ध्यारोपो दुरुपपादः । दुःखाभावे सुखत्वारोपस्य संयोगाभावे विभागत्वाभिमानस्य च दृष्टत्वात् ॥ १९ ॥ यदि कहो तमालके समान श्यामवर्ण उपलब्ध होनेसे निर्गुण कैसे है यहभी नहीं कह सकते अन्धकारमें नीलत्वकी प्रतीति केवल भ्रम है आरोपित नीलरूपभी नहीं कहसकते क्योंकि अधिष्ठानका प्रत्यक्षके बिना आरोप असम्भव है । चाक्षुष प्रत्यक्षके लिये आलोक संयोगकी अपेक्षा रहती है अन्धकार प्रत्यक्ष आलोक शून्य चक्षुसे होता है अत आरोपसहकारी निरपेक्ष चक्षुरूपके आरोपमें असमर्थ है ।

( १९८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ औलूक्य- अन्धकारका प्रत्यक्ष चक्षुरिन्द्रियादिजन्यभी नहीं मान सकता चक्षु संयोगान्तर भावी होनेसे अनन्यथासिद्ध हे । अस्ति इत्यादि विधिसत्ताप्रतीतिके अयोग्य भाव अंधकार है ऐसा कहनाभी असगत है प्रलयविनाशादिमेभी अतिप्रसक्ति हो जायगी आलोक ज्ञानाभावपक्षभी अयुक्त हे जिस इन्द्रियसे जिस वस्तुका ग्रहण होता है उसी इन्द्रियसे उसके अभावकाभी ग्रहण होता है ऐसा नियम है अतः ज्ञानको मानसप्रत्यक्ष होनेसे तद्भावरूप अन्धकारकोभी मानसत्व प्रसङ्ग होगा-अतः तमः आलोकाभावही है। यदि अभावरूप होगा तो अभावमे नीलत्वादि भावधर्मका आरोप असम्भव होगा यहभी नहीं कह सकते जिस प्रकार भारादिके उतार देनेसे दुःखाभावमें मै सुखी हूं इत्यादि सुखत्वका और सयोगके अभावमें विभागका अभि मान होता है उसी प्रकार अभावरूप अन्धकारमेंभी भावधर्मके आरोपमें बाधक नहीं है ॥ १९ ॥ न चालोकाभावस्य घटाद्यभाववद्रूपवद्भावत्वेनालोकसापेक्ष- चक्षुर्जन्यज्ञानविषयत्वं स्यादित्येपितव्यं यद्ग्रहे यदपेक्षं चक्षु- स्तदभावग्रहेऽपि तदपेक्षत इति न्यायेनालोकग्रहे आलोका- पेक्षाया अभावेन तदभावग्रहेऽपि तदपेक्षाया अभावात् । न चाधिकरणग्रहणावश्यम्भावः अभावप्रतीतावधिकरणग्रहणा- वश्यम्भावानङ्गीकारादपरथा निवृत्त कोलाहल इति शब्दप्रध्वं सप्रत्यक्षो न स्यादिति अप्रामाणिकं तव वचनम् । पर तत्सर्वम- भिसन्धाय भगवान् कणाद् प्रणिनाय सूत्रं 'द्रव्यगुणकर्मनिष्प- त्तिवैधर्म्यादभावस्तम' इति प्रत्ययवेद्यत्वेनापि निरूपितम् ॥२०॥ आलोकका अभाव तम है तो जिस प्रकार घटादि रूपवान्के प्रत्यक्षमे आलोककी अपेक्षा है उसी प्रकार आलोकाभावप्रत्यक्षमेंभी आलोककी अपेक्षा होनी चाहिये यहभी नहीं कह सकते क्योंकि जिस वस्तुके ग्रहणमें जो अपेक्षित हो उसके अभावमेंभी उसकी अपेक्षा होती है ऐसा नियम है आलोकके प्रत्यक्षमें आलोकान्तरकी अपेक्षा न होनेसे आलोकाभावके प्रत्यक्षमेंभी आलोककी अपेक्षा नही होगी अभावप्रत्यक्षमें अधिकरणप्रत्यक्षकीभी आवश्यकता नहीं है अतएव कोलाहल नष्ट होगया इत्यादि स्थलमें शब्दध्वसका प्रत्यक्ष होता है अन्यथा यह अप्रामाणिक होजायगा । इसी अभिप्रायसे भगवान् कणादमुनिनेभी द्रव्यादिके धर्मसे विलक्षण होनेके कारण तमको अभाव माना है ॥ २० ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासंमत' । ( १३९ ) अभावस्तु निषेधमुखप्रमाणगम्यः सप्तमो निरूप्यते । स चास- मवायवत्त्वे सत्यसमवायः संक्षेपतो द्विविधः संसर्गाभावान्योन्या- भावभेदात् । संसर्गाभावोऽपि त्रिविधः प्राक्प्रध्वंसात्यन्ता- भावभेदात् । तत्रानित्यो अनादितमः प्रागभावः उत्पत्तिमान् । अविनाशी प्रध्वंसः प्रतियोग्याश्रयोऽभावोत्यन्ताभावः अत्य- न्ताभावव्यतिरिक्तत्वे सत्यनवधिरभावोऽन्योन्याभाव ॥ २१ ॥ अभाव निषेध प्रमाण वोध्य है समवाय और समवायवान् दोनामे भिन्न अभाव है वह संक्षेपत संसर्गाभाव अन्योन्याभाव भेदमे दो प्रकार है । प्रागभाव प्रध्वंसाभाव अत्यन्ताभाव भेदसे प्रथम तीन प्रकार है अनित्य तथा विनाशी प्रागभाव, उत्पत्ति- मान्, अविनाशी प्रध्वंसाभाव प्रतियोगीकी अपेक्षासङ्कृत अभाव अत्यन्ताभाव है अत्यन्ताभावसे भिन्न अनवधि अभाव अन्योन्याभाव है ॥ २१ ॥ नन्वन्योन्याभाव एवात्यंताभाव इति चेत् अहो राजमार्ग एव भ्रमः । अन्योन्याभावो हि तादात्म्यप्रतियोगिकः प्रतिषेधः यथा घटः पटात्मा न भवतीति संसर्गप्रतियोगिक प्रतिषेधोऽ- त्यन्ताभावः यथा वायौ रूपसम्बन्धो नास्तीति । न चास्य पुरुषार्थोपयिकत्व नास्तीत्याशङ्कनीयं दुःखायन्तोच्छेदापरप- र्यायनि श्रेयसरूपत्वेन परमपुरुषार्थत्वात् ॥ २२ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे औलूक्यदर्शनं समाप्तम् ॥ १० ॥ शंका—अन्योन्याभावहीको अत्यन्ताभाव क्यो नही माना जाय ? उत्तर—यह स्फुटत् प्रकाश विस्तृत राजमार्गमेंभी भ्रमके समान है ? अन्योन्याभाव तादात्म्यसम्बन्ध प्रतियोगिक अभाव है यथा घट पट नहीं यहा पर तादात्म्यसे पटमें घट नहीं अर्थात् पटत्वरूपसे पटम घट नही ससर्ग ( सम्बन्ध ) प्रतियोगिक निषेध अत्यन्ताभाव है यथा वायुमें रूप नहीं अर्थात् वायु रूपसम्बन्धी नहीं है वैशेषिकशास्त्रको मांक्षानुप- योगीमी नहीं कह सकते दु खके अत्यन्तनिवृत्तिरूप मोक्षका प्रयोजक है यह शास्त्र है ॥ २२ ॥ इति सर्वदर्शनसग्रहमे वैशेषिकदर्शन समाप्त ।

( २०० ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ अक्षपाद- अथाक्षपाददर्शनम् ॥ ११ ॥ तत्त्वज्ञानाहु खात्यन्तोच्छेदलक्षणं निःश्रेयसं भवतीति समान- तन्त्रेऽपि प्रतिपादितम् तदाह सूत्रकारः 'प्रमाणप्रमेयेत्यादितत्त्व- ज्ञानान्निःश्रेयसाधिगम' इति। इदं न्यायशास्त्रस्यादिमं सूत्रं न्या- यशास्त्रञ्च पञ्चाध्यायात्मकम्, तत्र प्रत्यध्यायस्याह्निकद्वयम् । तत्र प्रथमाध्यायस्य प्रथमाह्निके भगवता गौतमेन प्रमाणादि- पदार्थनवकलक्षणनिरूपणं विधाय द्वितीये वादादिसप्तपदार्थ- लक्षणनिरूपणं कृतम् । द्वितीयस्य प्रथमे संशयपरीक्षणं प्रमाण- चतुष्टयाप्रामाण्यशङ्कानिराकरणञ्च, द्वितीये अर्थापत्त्यादेरन्त- र्भावनिरूपणम् । तृतीयस्य प्रथमे आत्मशरीरेन्द्रियार्थपरीक्षणं द्वितीये बुद्धिमनःपरीक्षणम् । चतुर्थस्य प्रथमे प्रवृत्तिदोषप्रेत्य- भावफलदुःखापवर्गपरीक्षणम्, द्वितीये दोषनिमित्तत्वानि- रूपणम् अवयव्यादिनिरूपणञ्च । पञ्चमस्य प्रथमे जातिभेदं- निरूपणम् द्वितीये निग्रहस्थानभेदनिरूपणम् ॥ १ ॥ तत्त्वज्ञानसे दुःखकी अत्यन्तनिवृत्तिरूप निःश्रेयस होता है यह समानतन्त्र ( नै यायिकसिद्धान्तमें ) भी प्रतिपादित है। सूत्रकारनेभी प्रमाणादि तत्त्वज्ञानसे निःश्रेयस- की प्राप्ति कही है यह न्यायशास्त्रका प्रथम सूत्र है । न्यायशास्त्र पञ्च अध्यायात्मक है प्रत्येकाध्यायोंमें दो दो आह्निक हैं । प्रथमाध्यायके प्रथमाह्निकमें प्रमाणादि नौ पदार्थोंका लक्षण निरूपण करके द्वितीयाह्निकमें वादादि सात पदार्थोंका लक्षणका निरूपण किया द्वितीयाध्यायका प्रथमाह्निकमें संशयपरीक्षा और प्रमाणचतुष्टयका अप्रामाण्यकी शंकाका निराकरण है । द्वितीयमें अर्थापत्त्यादिप्रमाणान्तरका उक्त प्रमाणमें अन्तर्भाव वर्णन है । तृतीध्यायके प्रथमाह्निकमें आत्मा इन्द्रिय और शरीरका विचार है द्वितीय आह्निकमें बुद्धि और मनका विचार चतुर्थके प्रथमाह्निकमें प्रवृत्तिदोष पुनर्जन्म फल, दुःख और अपवर्गका परीक्षण है । च०द्वि० दोषके निमित्त निरूपण और अवयवीकी निरूपण है । पञ्चमके प्र० जातिभेदनिरूपण है । प०द्वि० आ० निग्रहस्थानका निरूपण है ॥ १ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । (२०१) मानाधीना मेयसिद्धिरिति न्यायेन प्रमाणस्य प्रथममुद्देशे तद- नुसारेण लक्षणस्य कथनीयतया प्रथमोद्दिष्टस्य प्रमाणस्य प्रथमं लक्षणं कथ्यते ॥ साधनाश्रयाव्यतिरिक्तत्वे सति प्रमा- व्याप्तं प्रमाणम् । एवञ्च प्रतितन्त्रसिद्धान्तमिह परमेश्वरप्रा- माण्यं संगृहीतं भवति । यदकथयत् सूत्रकारः ‘मन्त्रायुर्वेद- प्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात्’ इति ॥ तथाच न्यायपारावारपारदृश्वा विश्वविख्यातकीर्त्तिरुदयनाचार्योऽपि कुसुमाञ्जलौ चतुर्थस्तबके- “मितिः सम्यक्परिच्छित्तिस्त- द्वत्ता च प्रमातृत्ता । तद्योगव्यवच्छेदः प्रामाण्यं गातमे मते ॥” इति ॥ “साक्षात्कारिणि नित्ययोगिनि परद्वारान- पेक्षस्थितौ भूतार्थानुभवे निविष्टनिखिलप्रस्ताविवस्तुक्रमः । लेशाद्दष्टिनिमित्तदुष्टिविगमप्रभ्रष्टशङ्कातुप शङ्कोन्मेषकल- ङ्किभिः किमपरैस्तन्मे प्रमाणं शिव ॥” इति ॥ २ ॥ प्रमाणके आधीन प्रमेयकी सिद्धि होनेसे उद्देशमें प्रथम प्रमाणका उपादान किया है अतः उद्देशके अनुगुण लक्षणका कथन उचित होनेके कारण प्रथम प्रमा- णका लक्षण कहते हैं (साधनाश्रय इत्यादि) प्रमाणस्य प्रथम लक्षणं कथ्यते इति प्रमाणका साधन और प्रमाके आश्रय इन दोनोंसे अभिन्न होकर जो प्रमामें नित्य सम्बद्ध हो वह प्रमाण है ईश्वरभी प्रमामें नित्य सम्बद्ध होनेके कारण प्रमाण है जीव प्रमासे नित्य सम्बद्ध न होनेसे प्रमाण न हुआ एतादृश लक्षण करनेसे नैया- यिकसिद्धान्तसिद्ध ईश्वर प्रामाण्यभी उपपन्न हो गया । जिस प्रकार मन्त्र आयुर्वेदा- दिक आप्तके उच्चरित होनेसे प्रमाण है तिसी प्रकार ईश्वर आप्ततम होनेसे स्वतः प्रमाण है उक्त प्रमाणलक्षणम उदयनाचार्यकी सम्मति कहते हैं (तथाचेति) मिति सम्यक्ज्ञान है सम्यक ज्ञानवत्त्व प्रमातृत्व है तादृश प्रमातृत्वका नित्य सम्बन्ध गौतमके मतमें प्रमाण है साक्षात्कारविषय नित्य सम्बद्ध इतरके निरपेक्ष सिद्ध वस्तुके अनुभवमें निविष्ट हैं समस्तकवस्तु निसमें सर्वात्मना दर्शनसे नष्ट हे शङ्कारूप कलङ्क जिनके एवम्भूत शिवही प्रमाण हे ॥ २ ॥ तच्चतुर्विधं प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दभेदात् । प्रमेयं द्वादशप्र- कारम्, आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफल-

( २०२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ अक्षपाद- दुःखापवर्गभेदात् ॥ अनवधारणात्मकं ज्ञानं संशयः स त्रिविधः साधारणधर्मासाधारणधर्मविप्रतिपत्तिलक्षणभेदात् ॥ ३ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्दभेदसे प्रमाण चार प्रकार है । प्रमेयभी आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग भेदसे द्वादश प्रकार है आत्मा ज्ञानका अधिकरण है भोगका स्थान शरीर है ज्ञानका साधन मनके साथ संयुक्त और शब्दसे भिन्न अद्भुतविशेषगुणका आश्रय जो न हो वह इन्द्रिय है । समस्त व्यवहारोंकी असाधारण कारण बुद्धि है । प्रेत्यभाव पुन- र्जन्म है, अनिश्चयात्मक ज्ञान संशय है, वह साधारणधर्म असाधारणधर्म, विप्रति- पत्तिलक्षण भेदसे तीन प्रकार है ॥ ३ ॥ यमधिकृत्य प्रवर्त्तन्ते पुरुषास्तत्प्रयोजनम् । तद्विविधं दृष्टादृष्ट- भेदात् ॥ व्याप्तिसंवेदनभूमिर्दृष्टान्तः । स द्विविधः साधर्म्य- वैधर्म्यभेदात् ॥ ४ ॥ जिस उद्देशसे पुरुष प्रवृत्त हो वह प्रयोजन है वह दृष्ट और अदृष्ट भेदसे दो प्रकार है व्याप्तिज्ञानका स्थल दृष्टान्त है साधर्म्य ( समानधर्म ) विरुद्ध धर्मभेदसे वहभी दो प्रकार है ॥ ४ ॥ प्रामाणिकत्वेनाभ्युपगतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्विधः सर्वतन्त्र- प्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमभेदात् ॥ परार्थानुमानवाक्यैकदे- शोऽवयवः । स पञ्चविधः प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमन- भेदात् ॥ व्याप्यारोपे व्यापकारोपस्तर्कः । स चैकादशविधः व्याघातात्माश्रयेतरेतराश्रयचक्राश्रयानवस्थाप्रतिबन्धिक- ल्पनालाघवकल्पनागौरवोत्सर्गापवादनैजात्यभेदात् ॥ ५ ॥ प्रामाणिक रूपसे अंगीकृत अर्थ सिद्धान्त है वह सर्वतन्त्र, प्रतितन्त्र, अधिकरण और अभ्युपगमभेदसे चार प्रकार है । परार्थानुमानवाक्यके एकदेश अवयव है यह प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन भेदसे पाँच प्रकार है । व्याप्यका आरोपसे व्यापकका आरोपरूपतर्क ११ प्रकार है—व्याघात, आत्माश्रय, इतरेतराश्रय, चक्रक, अनवस्था, प्रतिबन्दी, लाघवकल्पना, गौरव, उत्सर्ग, अपवाद और वैजात्य भेद है ॥ ५ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २०३ ) यथार्थानुभवपर्याया प्रमितिर्निर्णयः । स चतुर्विध साक्षात्कृत्यनु- मित्यपमितिशाब्दभेदात् ॥ तत्त्वनिर्णयफलः कथाविशेषो वादः ॥ उभयसाधनवती विजिगीषुकथा जल्पः ॥ स्वपक्षस्थापनाहीनः कथाविशेषो वितण्डा ॥ कथा नाम वादिप्रतिवादिनो पक्षप्रति- पक्षपरिग्रहः ॥ असाधको हेतुत्वेनाभिमतो हेत्वाभास । स पञ्च- विधः सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमातीतकालभेदात् ॥ ६ ॥ यथार्थानुभवके पर्याय प्रमा निर्णय है । वह प्रत्यक्ष अनुमान, उपमान, और शब्दभेदसे चार प्रकार है । तत्त्वनिर्णयके लिये जो विचार है वह वाद है । दोनो पक्ष समर्थन करनेवाले विजिगीषुओंके विचारनेका नाम जल्प है । स्वपक्ष- स्थापन शून्य परपक्षखण्डन रूप कथा वितण्डा है । वादी और प्रतिवादी दोनोंके परस्पर पक्ष प्रतिपक्ष स्वीकारके नाम कथा है । साध्यका असाधक हो हेतुके समान भासमान है वह हेत्वाभास है। वह सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरण, सम और काला- त्यय भेदसे पाँच प्रकार है ॥ ६ ॥ शब्दवृत्तिव्यत्ययेन प्रतिषेधहेतुश्छलम् । तत्रिविधमभिधानता- त्पर्योपचारवृत्तिव्यत्ययभेदात् ॥ स्वव्याघातकमुत्तरं जातिः सा चतुर्विंशतिविधा । साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविक- ल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणाहे- त्वर्थापत्तिविशेषापत्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्य्यसम- भेदात् ॥ ७ ॥ शब्द वृत्ति ( शक्तिको ) व्यत्यास करके प्रतिषेध हेतु छल है वह अभिधानवृत्ति- व्यत्यय, तात्पर्य्यवृत्तिव्यत्यय और लक्षणोवृत्तिव्यत्ययभेदसे तीन प्रकार है । स्वपक्षका विघातक उत्तर जाति है वह साधर्म्य १ वैधर्म्य २ उत्कर्ष ३ अपकर्ष ४ वर्ण्य ५ अवर्ण्य ६ विकल्प ७ साध्य ८ प्राप्ति ९ अप्राप्ति १० प्रसङ्ग ११ प्रति- १ जैसे किसीके नूतन कम्बलके तात्पर्य्यमे 'नवकम्बलो देवदत्त ' ऐसा उच्चारण किया तहापर नवशब्दके नूतन अर्थमें जो शक्ति है उसको हटाकर नौसंख्यामें वृत्ति मानकर 'कथ नवकम्बलो देवदत्त एक एव कम्बल ' अर्थात् ९ कम्बल कहा है एकही कम्बल है ऐसा कहना सर्व शब्दके वृत्तिके व्यत्यासरूप कहा है ।

(२०४) सर्वदर्शनसंग्रहः। [अक्षपाद-

दृष्टान्त १२ अनुत्पत्ति १३ संशय १४ प्रकरण १५ अहेतु १६ अर्थापत्ति १७ विशेषा- पत्ति १८ उपलब्धि १९ अनुपलब्धि २० नित्य २१ अनित्य २२ कार्य २३ और सम २४ इन भेदोंसे २४ प्रकारके हैं ॥ ७ ॥ पराजयनिमित्तं निग्रहस्थानम् । तद्द्वाविंशतिप्रकारं प्रतिज्ञा- हानिप्रतिज्ञान्तरप्रतिज्ञाविरोधप्रतिज्ञासन्न्यासहेत्वन्तरार्थान्तर- निरर्थकाविज्ञातार्थापार्थकाप्राप्तकालन्यूनाधिकपुनरुक्ताननुभाष- णाज्ञानाप्रतिभाविक्षेपमतानुज्ञापर्य्यनुयोज्योपेक्षणनिरनुयोज्या- नुयोगापसिद्धान्तहेत्वाभासभेदात् ॥ अत्र सर्वान्तर्गणिकस्तु विशेषस्तत्र शास्त्रे विस्पष्टोऽपि विस्तरभिया न प्रस्तूयते ॥ ८ ॥ पराजयनिमित्त वाक्य निग्रहस्थान है वह २२ प्रकारके हैं इनके अवान्तर भेद और लक्षणादि सब न्यायदर्शनादिमें स्पष्ट हैं ॥ ८ ॥ ननु प्रमाणादिपदार्थषोडशके प्रतिपाद्यमाने कथमिदं न्याय- शास्त्रमिति व्यपदिश्यते । सत्यं, तथाप्यसाधारण्येन व्यपदेशा भवन्तीति न्यायेन न्यायस्य परार्थानुमानापरपर्यायस्य सक- लविद्यानुग्राहकतया सर्वकर्मानुष्ठानसाधनतया प्रधानत्वेन तथा व्यपदेशो युज्यते ॥ तथाभाणि सर्वज्ञेन, सोऽयं परमो न्याय विप्रतिपन्नपुरुषप्रतिपादकत्वात् तथा प्रवृत्तिहेतुत्वा- च्चेति ॥ पक्षिलस्वामिना च "सेयमान्वीक्षिकी विद्या प्रमाणा- दिभि पदार्थै प्रविभज्यमाना-"प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्म्माणां विद्योद्देशे परी- क्षिते ॥ " इति ॥ ९ ॥ शंका-इस शास्त्रमे प्रमाणादि षोडश पदार्थका प्रतिपादन है तो इसको न्यायशास्त्र क्यों कहा जाता है? उत्तर-यद्यपि पदार्थ प्रतिपादक हे तथापि प्रधान व्यपदेश न्यायसे परार्थानुमानके अपरपर्यायन्याय सकलशास्त्रके उपकार ओर सर्वकर्मानुष्ठानका साधक होनेके कारण न्यायशास्त्र व्यवहार होता है। सूत्रकारनेभी कहा हे विप्रतिपन्न पुरुषकी विप्रतिपत्तिके निराकरण साधन ओर प्रवृत्तिहेतु होनेसे न्यायही प्रधान हे । पक्षिलस्वा- मीनेभी कहा है कि प्रमाणादि पदार्थोंसे विभक्त इस विद्याको आन्वीक्षकी विद्या कहते हैं। संपूर्ण विद्याके प्रकाशकप्रदीप समस्त कर्मका उपाय, ओर समस्त धर्मका आश्रय

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २०५ ) विद्याके उद्देशमे विमृष्ट हे प्रत्यक्ष प्रमाणसे ईक्षित होनेपर आन्वीक्षकी कही जाती है ॥ ९ ॥ ननु तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसं भवतीत्युक्तं तत्र किं तत्त्वज्ञाना- दनन्तरमेव निःश्रेयसं सम्पद्यते नेत्युच्यते किन्तु तत्त्वज्ञाना- द्दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भाव इति ॥ तत्र मिथ्याज्ञानं नामानात्मनि देहादावात्मबुद्धिः तदनुकूलेषु रागः तत्प्रतिकूलेषु द्वेषः वस्तुतस्त्वात्मनः प्रति- कूलमनुकूलं वा न किञ्चित्समस्ति । परस्परानुबन्धत्वाच्च रागादीनां मूढो रज्यति रक्तो मुह्यति मूढ कुप्यति कुपितो मुह्यतीति । ततस्तैर्दोषैः प्रेरितः प्राणी प्रतिषिद्धानि शरीरेण हिंसास्तेयादीन्याचरति वाचा अनृतादीनि मनसा परद्रोहादीनि सेयं पापरूपा प्रवृत्तिरधर्ममावहतीति ॥ १० ॥ तत्त्वज्ञानसे मुक्ति होती है इस प्रकार कहा है सो वह क्या तत्त्वज्ञानसे अव्यव- हित उत्तरकालमें ही होती है उत्तर तत्त्वज्ञानके अनन्तर नहीं तत्त्वज्ञानसे दुःख, जन्म प्रवृत्ति, दोष मिथ्याज्ञानके उत्तर उत्तरके नाश द्वारा पूर्व पूर्वके नाश होनेसे होती है । अनात्मभूत देहेन्द्रियादिमें आत्मबुद्धि मिथ्या ज्ञान है तादृश देहानुकूल वस्तुमें राग और प्रतिकूल वस्तुमें द्वेष होता है वस्तुतः आत्माका न कुछभी प्रतिकूल है न अनुकूल है रागमोहादि परस्पर सम्बन्ध होनेसे होते हैं यथा मूढ अनुरक्त होता है अनुरक्त मुग्ध होता है मूढ क्रुद्ध होता है और क्रुद्ध मुग्ध हो जाता है । अतः उक्तदोषोंसे प्रेरित पुरुष शरीरसे निषिद्ध हिंसादि करते हैं वचनसे मिथ्याभाषणादि करते हैं और मनसे परद्रोहादि करते हैं । ऐसी पापरूप प्रवृत्तिसे अधर्म उत्पन्न होता है ॥ १० ॥ शरीरेण प्रशस्तानि दानपरपरित्राणादीनि वाचा हितसत्या- दीनि मनसा अहिंसादीनि सेयं पुण्यरूप प्रवृत्तिर्धर्मः ॥ सेय- त्तिः तत स्वानुरूपं प्रशस्तं निन्दितं वा जन्म पुनः शरीरादेः प्रादुर्भावः । तस्मिन् सति प्रतिकूलवेदनीय- तया वासनात्मक दुःखं भवति । त इमे मिथ्याज्ञानादयो

( २०६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ अक्षपाद- दुःखान्ता अविच्छेदेन प्रवर्त्तमानाः । संसारशब्दार्थो घटीच- क्रवन्निरवधिरनुवर्त्तते ॥ ११ ॥ शरीरसे उत्तम दान ओर प्राणियोकी रक्षा प्रभृति कर्म होते हैं, वचनसे सत्य ओर प्रिय भाषण और मनसे अहिंसादि होते हैं यह सब पुण्यरूप प्रवृत्तिके धर्म हे । यह पुण्य पापरूप दो प्रकारकी प्रवृत्ति हे उनसे पुण्य ओर पापरूप कर्मानुसार प्रशस्त अथवा निन्दित जन्म प्राप्त होते हैं । पश्चात् शरीरेन्द्रियादिका प्रादुर्भाव होता हे शरीर सम्बन्ध- वश प्रतिकूलवेदनीय दुःख होता हे एवम्भूत मिथ्याज्ञानादि दुःखान्त निरन्तर प्रवर्त्तमान होता हुआ ससार घटीय-न्त्रकी समान घूमता रहता हे ॥ ११ ॥ यदा कश्चित् पुरुषधौरेयः पुराकृतसुकृतपरिपाकवशादाचार्यो- पदेशेन सर्वमिदं दुःखायतनं दुःखानुषक्तं च पश्यति तदा तत्सर्वं हेयत्वेन बुध्यते । ततस्तन्निर्वर्त्तकमविद्यादि निवर्त्त- यितुमिच्छति, तन्निवृत्त्युपायश्च तत्त्वज्ञानमिति ॥ १२ ॥ जब कोई महापुरुष पूर्वकृत पुण्योंके फलसे आचार्यके उपदेशद्वारा ससारको दुःखका आलय और दुःखसे मिलेहुए देखते हैं तब उनको समस्त वस्तुओंमें त्याज्यबुद्धि होती है । अत ससारनिर्वर्त्तक ( प्रापक ) अविद्यादिसे छूटनेकी इच्छा करते हैं अविद्यानिवृत्तिका उपाय तत्त्व ज्ञान है ॥ १२ ॥ कस्यचिच्चतसृभिर्विद्याभिर्विभक्तं प्रमेयं भावयतः सम्यग्दर्शन- पदवेदनीयतया तत्त्वज्ञानं जायते, तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानमपैति मिथ्याज्ञानापाये दोषाः अपयान्ति, दोषापाये प्रवृत्तिरपैति प्रवृत्त्यपाये जन्मापैति, जन्मापाये दुःखमत्यन्तं निवर्त्तते, सात्यन्तिकी निवृत्तिरपवर्गः। निवृत्तेरात्यन्तिकत्वं नाम निवर्त्य सजातीयस्य पुनस्तत्रानुत्पाद इति ॥ तथाच पारमर्षं सूत्रम् ‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भावादपवर्ग' इति ॥ १३ ॥ आन्वीक्षकी आदि चार विद्याओंसे विभक्त प्रमेयकी भावना करनेवाले किसीको सम्यग् दर्शन पर्याय तत्त्वज्ञान होता है तत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति होती है उससे दोषोंका नाश, दोषनाशमे प्रवृत्तिनाश, प्रवृत्तिनाशमे जन्मनाश, जन्मनाशसे

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २०७ ) दुःखका अत्यन्त उच्छेद होता है। दुःख़ात्यन्तनिवृत्तिहीका नाम अपवर्ग (मोक्ष) है निवर्त्तनीय दुःखके समान दुःखान्तरकी अनुत्पत्तिके नाम आत्यन्तिक निवृत्ति है अर्थात् वासनासहितका उच्छेद हो । सूत्रार्थ पहिलेँ लिख चुका हूं ॥ १३ ॥ ननु दुःखात्यन्तोच्छेदोऽपवर्ग इत्येतदद्यापि कफोणिगुडायितं वर्तते तत्कथं सिद्धवत्कृत्य व्यवह्रियत इति चेन्मैवं सर्वेषां मोक्षवा- दिनामपवर्गदशायामात्यन्तिकी दुःख़निवृत्तिरस्तीत्यस्यार्थस्य सर्वतन्त्रसिद्धान्तसिद्धतया घण्टापथत्वात् । नह्यप्रवृत्तस्य दुःखं प्रत्यापद्यते इति कश्चित् प्रपद्यते । तथा हि आत्मोच्छेदो मोक्ष इति माध्यमिकमते दुः खोच्छेदोऽस्तीत्येतावत्तावदवि- वादम् ॥ १४ ॥ शंका-दुःखका अत्यन्त उच्छेद अपवर्ग है यह आजतक कफोणिगुडायितं अर्थात् हाथकी कलाईको गुड़के मीठा माननेके समान है जो असिद्ध है उसको प्रत्यक्ष सिद्धवत् कैसे व्यवहार करते हो। उत्तर-मोक्षदशामें दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति है इसमें सब मोक्षवादियोंके सिद्धान्त समान होनेसे यह निष्कण्टक मार्ग हे प्रवृत्ति- शून्यको दुःखकी प्राप्ति होती है ऐसे कोईभी नहीं मानते हैं यथा आत्मोच्छेदको मोक्ष माननेवाले माध्यमिकोंके मतमे दुःखका उच्छेद निर्विवाद है ॥ १४ ॥ अथ मन्येथा शरीरादिवदात्मापि दुःखहेतुत्वादुच्छेद्य इति तन्न सङ्गच्छते विकल्पानुपपत्तेः ॥ किमात्मा ज्ञानसन्तानो विवक्षित तदरिक्तो वा । प्रथमे न विप्रतिपत्ति । कः खल्व- नुकूलमाचरति प्रतिकूलमाचरेत् । द्वितीये तस्य नित्यत्वे निवृत्तिरशक्यविधानेव । प्रवृत्त्यनुपपत्तिश्चाधिकं दूषणं, न खलु कश्चित् प्रेक्षावानात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति सर्वतः प्रियतमस्यात्मन समुच्छेदाय प्रयतते । सर्वो हि प्राणी मुक्त इति व्यवहरति ॥ १५ ॥ यदि कहो शरीरवत् आत्माभी दुःखके हेतु होनेसे उच्छेद्य है वह असंगत है क्योंकि कल्पनामे विरुद्ध है तथाहि आत्मपदसे क्या ज्ञान सन्तान अभिमत है,

( २०८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ अक्षपाद- किंवा उससे अतिरिक्त ? पहिलेमे कुछ विरोध नही, कौन ऐसा होगा अनुकूल आचरण करनेवालेके विषयमें प्रतिकूल आचरण करेगा अतिरिक्तपक्षमें अतिरिक्त आत्माको यदि नित्य मानो तो नित्यकी निवृत्ति असम्भव होगी प्रत्युत प्रवृत्तिकी अनुपपत्ति दोष अधिक रह जाता है आत्माके लिये सब प्रिय होते हैं, इत्यादि सबसे प्रियतम आत्माको उच्छेदके लिये कोई बुद्धिमान् प्रयत्न न करेगा परन्तु सब कोई मुक्तव्यवहार करते हैं अत मुक्ति आत्मोच्छेदसे अन्य हैं ॥ १५ ॥ ननु धर्मिनिवृत्तौ निर्मलज्ञानोदयो महोदय इति विज्ञानवादि- वादे सामग्र्यभावः सामानाधिकरण्यानुपपत्तिश्च भावनाचतु- ष्टयं हि तस्य कारणमभीष्टम् । यच्च क्षणभङ्गपक्षे स्थिरैकाधा- रासम्भवात् लङ्घनाभ्यासादिवदनासादितप्रकर्षं न स्फुटमाभि- ज्ञानमभिजनयितु प्रभवति सोपप्लवस्य ज्ञानसन्तानस्य बद्धत्वे निरुपप्लवस्य च मुक्तत्वे यो बद्धः स एव मुक्त इति सामा- नाधिकरण्यं न सङ्गच्छते ॥ १६ ॥ धर्मी आत्माकी निवृत्ति होनेपर निर्मल ज्ञानका उदयरूपी मोक्ष हे इस प्रकार कहनेवाले विज्ञानवादीके मतमें सामग्रीका अभाव और सामानाधिकरण्यकी अनुपप- त्तिरूप दोषद्वय हैं। सर्वम् दुःख, स्वलक्षण, क्षणिक, शून्य, यह भावनाचतुष्टय उनके मतमें कारण है क्षणभङ्गपक्षमे आधार स्थिर न होनेसे अतिशयारोप जिसमें न हुआ हो उसमें स्फुटतरविज्ञान हो नहीं सकता यथा उपवासादि अभ्यास विना दीर्घकाल नहीं हो सकता सोपप्लव ( भ्रान्तियुक्त ) बद्ध और निरुपप्लव मुक्त हो तो जो बद्ध है सोई मुक्त हे ऐसा सामानाधिकरण्यभी न हो सकेगा ॥ १६ ॥ आवरणमुक्तिर्मुक्तिरिति जैनजनाभिमतोऽपि मार्गो न निर्गतो निरर्गल । अङ्ग भवान् पृष्टो व्याचष्टां किमावरणं, धर्माधर्म- भ्रान्तय इति चेत् इष्टमेव । अथ देहमेवावरणं तथाच तन्निवृत्तौ पञ्जरान्मुक्तस्य शुकस्येवात्मन सततोर्ध्वगमन मुक्तिरिति चेत्तदा वक्तव्यं किमयमात्मा मूर्त्तोऽमूर्त्तो वा । प्रथमे निरवयव- सावयवो वा । निरवयवत्वे निरवयवो मूर्त्तः परमाणुरिति पर- माणुलक्षणापत्त्या परमाणुधर्मवदात्मधर्माणामतीन्द्रियत्वं प्रस- ज्येत ॥ सावयवत्वे यत्सावयवं तदनित्यमिति प्रतिबन्धबलेना-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( २०९ ) नित्यत्वापत्तौ कृतप्रणाशाकृताभ्यागमौ निष्प्रतिबन्धौ प्रसरे- ताम् ॥ अमूर्त्तत्वे गमनमनुपपन्नमेव चलनात्मिकायाः क्रियाया- मूर्त्तप्रतिबन्धात् ॥ १७ ॥ आवरणभंग मुक्ति है ऐसा जैनियोंका मत हे । यहभी निर्दुष्ट नही। क्योकि आवरण किसको कहते हैं ऐसे किसीके पूछनेपर क्या उत्तर कहोगे ? धर्म्माधर्म्मकी भ्रान्ति कहो तो इष्टापत्ति है। यदि देहहीको आवरण कहकर देहनिवृत्ति होनेपर पिंजरासे छूटे पक्षीके समान सतत ऊर्ध्वगमनही मुक्ति मानो तो कहना होगा ! आत्मा क्या मूर्त्त हे या अमूर्त्त है ? मूर्त्त माना तो निरवयव, किंवा सावयव है ? निरवयव मानो तो निरवयव मूर्त्त परमाणु है परमाणुके धर्मरूपादिका प्रत्यक्ष होता नही तद्वत् आत्माभी परमाणुरूप होनेसे आत्माके धर्मकाभी प्रत्यक्ष न होगा। सावयव माने तो सावयव जनित्य होनेसे आत्माभी अनित्य होगा तो कृतका विनाश अकृतकी प्राप्ति दुर्নিবার हो जायगी अर्थात् दूसरेके किया हुआ कर्मका फल दूसरेको मिलने लगेगा। अमूर्त्त माने तो निरन्तर ऊर्ध्वगमनभी असम्भव होगा गमनक्रिया मूर्त्तद्रव्यहीमें होती है ॥ १७ ॥ पारतन्त्र्यं बन्धः स्वातन्त्र्यं मोक्ष इति चार्वाकपक्षेऽपि स्वात- न्त्र्यं दुःखनिवृत्तिश्चेदविवाद ऐश्वर्य्य चेत्सातिशयतया सहक्ष- तया च प्रेक्षावतां नाभिमतम् ॥ १८ ॥ परतन्त्रताको बन्ध और स्वतन्त्रताको मोक्ष कहनेवाले चार्वाकोंके मतमेंभी स्वात- न्त्र्यको दुःखनिवृत्ति मानो तो आपत्ति नही है यदि ऐश्वर्य्य मानो तो एकसे अधिक ऐश्वर्य्य दूसरेको उनसेभी अधिक और किसीको होंगे इस प्रकार सातिशय होनेसे बुद्धिमानोंके मन्तव्य नही है क्योंकि परायेकी उत्कृष्ट सम्पत्तिको देखकर अल्प- सम्पत्तिमान्को दुःख होता है ॥ १८ ॥ प्रकृतिपुरुषान्यत्वख्यातौ प्रकृत्युपरमे पुरुषस्य स्वरूपेणाव- स्थानं मुक्तिरिति साङ्ख्याख्यातेऽपि पक्षे दुःखोच्छेदोऽभ्युपेयते विवेकज्ञानं पुरुषाश्रयं प्रकृत्याश्रयं वेति एतावदवशिष्यते। तत्र पुरुषाश्रयमिति न श्लिष्यते पुरुषस्य कौटस्थ्यात् स्थाननिरोधा- पातान्नापि प्रकृत्याश्रय अचेतनत्वात्तस्या ॥ किञ्च प्रकृतिः प्रवृत्तिस्वभावा वा निवृत्तिस्वभावा वा । आद्ये अनिर्मोक्षः स्वभावस्यानपायात् । द्वितीये सम्प्रति संसारोऽस्तमियात् ॥१९॥ १४