सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ अक्षपाद- दुःखापवर्गभेदात् ॥ अनवधारणात्मकं ज्ञानं संशयः स त्रिविधः साधारणधर्मासाधारणधर्मविप्रतिपत्तिलक्षणभेदात् ॥ ३ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्दभेदसे प्रमाण चार प्रकार है । प्रमेयभी आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग भेदसे द्वादश प्रकार है आत्मा ज्ञानका अधिकरण है भोगका स्थान शरीर है ज्ञानका साधन मनके साथ संयुक्त और शब्दसे भिन्न अद्भुतविशेषगुणका आश्रय जो न हो वह इन्द्रिय है । समस्त व्यवहारोंकी असाधारण कारण बुद्धि है । प्रेत्यभाव पुन- र्जन्म है, अनिश्चयात्मक ज्ञान संशय है, वह साधारणधर्म असाधारणधर्म, विप्रति- पत्तिलक्षण भेदसे तीन प्रकार है ॥ ३ ॥ यमधिकृत्य प्रवर्त्तन्ते पुरुषास्तत्प्रयोजनम् । तद्विविधं दृष्टादृष्ट- भेदात् ॥ व्याप्तिसंवेदनभूमिर्दृष्टान्तः । स द्विविधः साधर्म्य- वैधर्म्यभेदात् ॥ ४ ॥ जिस उद्देशसे पुरुष प्रवृत्त हो वह प्रयोजन है वह दृष्ट और अदृष्ट भेदसे दो प्रकार है व्याप्तिज्ञानका स्थल दृष्टान्त है साधर्म्य ( समानधर्म ) विरुद्ध धर्मभेदसे वहभी दो प्रकार है ॥ ४ ॥ प्रामाणिकत्वेनाभ्युपगतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्विधः सर्वतन्त्र- प्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमभेदात् ॥ परार्थानुमानवाक्यैकदे- शोऽवयवः । स पञ्चविधः प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमन- भेदात् ॥ व्याप्यारोपे व्यापकारोपस्तर्कः । स चैकादशविधः व्याघातात्माश्रयेतरेतराश्रयचक्राश्रयानवस्थाप्रतिबन्धिक- ल्पनालाघवकल्पनागौरवोत्सर्गापवादनैजात्यभेदात् ॥ ५ ॥ प्रामाणिक रूपसे अंगीकृत अर्थ सिद्धान्त है वह सर्वतन्त्र, प्रतितन्त्र, अधिकरण और अभ्युपगमभेदसे चार प्रकार है । परार्थानुमानवाक्यके एकदेश अवयव है यह प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन भेदसे पाँच प्रकार है । व्याप्यका आरोपसे व्यापकका आरोपरूपतर्क ११ प्रकार है—व्याघात, आत्माश्रय, इतरेतराश्रय, चक्रक, अनवस्था, प्रतिबन्दी, लाघवकल्पना, गौरव, उत्सर्ग, अपवाद और वैजात्य भेद है ॥ ५ ॥