सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
( २०२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ अक्षपाद- दुःखापवर्गभेदात् ॥ अनवधारणात्मकं ज्ञानं संशयः स त्रिविधः साधारणधर्मासाधारणधर्मविप्रतिपत्तिलक्षणभेदात् ॥ ३ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्दभेदसे प्रमाण चार प्रकार है । प्रमेयभी आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग भेदसे द्वादश प्रकार है आत्मा ज्ञानका अधिकरण है भोगका स्थान शरीर है ज्ञानका साधन मनके साथ संयुक्त और शब्दसे भिन्न अद्भुतविशेषगुणका आश्रय जो न हो वह इन्द्रिय है । समस्त व्यवहारोंकी असाधारण कारण बुद्धि है । प्रेत्यभाव पुन- र्जन्म है, अनिश्चयात्मक ज्ञान संशय है, वह साधारणधर्म असाधारणधर्म, विप्रति- पत्तिलक्षण भेदसे तीन प्रकार है ॥ ३ ॥ यमधिकृत्य प्रवर्त्तन्ते पुरुषास्तत्प्रयोजनम् । तद्विविधं दृष्टादृष्ट- भेदात् ॥ व्याप्तिसंवेदनभूमिर्दृष्टान्तः । स द्विविधः साधर्म्य- वैधर्म्यभेदात् ॥ ४ ॥ जिस उद्देशसे पुरुष प्रवृत्त हो वह प्रयोजन है वह दृष्ट और अदृष्ट भेदसे दो प्रकार है व्याप्तिज्ञानका स्थल दृष्टान्त है साधर्म्य ( समानधर्म ) विरुद्ध धर्मभेदसे वहभी दो प्रकार है ॥ ४ ॥ प्रामाणिकत्वेनाभ्युपगतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्विधः सर्वतन्त्र- प्रतितन्त्राधिकरणाभ्युपगमभेदात् ॥ परार्थानुमानवाक्यैकदे- शोऽवयवः । स पञ्चविधः प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमन- भेदात् ॥ व्याप्यारोपे व्यापकारोपस्तर्कः । स चैकादशविधः व्याघातात्माश्रयेतरेतराश्रयचक्राश्रयानवस्थाप्रतिबन्धिक- ल्पनालाघवकल्पनागौरवोत्सर्गापवादनैजात्यभेदात् ॥ ५ ॥ प्रामाणिक रूपसे अंगीकृत अर्थ सिद्धान्त है वह सर्वतन्त्र, प्रतितन्त्र, अधिकरण और अभ्युपगमभेदसे चार प्रकार है । परार्थानुमानवाक्यके एकदेश अवयव है यह प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन भेदसे पाँच प्रकार है । व्याप्यका आरोपसे व्यापकका आरोपरूपतर्क ११ प्रकार है—व्याघात, आत्माश्रय, इतरेतराश्रय, चक्रक, अनवस्था, प्रतिबन्दी, लाघवकल्पना, गौरव, उत्सर्ग, अपवाद और वैजात्य भेद है ॥ ५ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २०३ ) यथार्थानुभवपर्याया प्रमितिर्निर्णयः । स चतुर्विध साक्षात्कृत्यनु- मित्यपमितिशाब्दभेदात् ॥ तत्त्वनिर्णयफलः कथाविशेषो वादः ॥ उभयसाधनवती विजिगीषुकथा जल्पः ॥ स्वपक्षस्थापनाहीनः कथाविशेषो वितण्डा ॥ कथा नाम वादिप्रतिवादिनो पक्षप्रति- पक्षपरिग्रहः ॥ असाधको हेतुत्वेनाभिमतो हेत्वाभास । स पञ्च- विधः सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमातीतकालभेदात् ॥ ६ ॥ यथार्थानुभवके पर्याय प्रमा निर्णय है । वह प्रत्यक्ष अनुमान, उपमान, और शब्दभेदसे चार प्रकार है । तत्त्वनिर्णयके लिये जो विचार है वह वाद है । दोनो पक्ष समर्थन करनेवाले विजिगीषुओंके विचारनेका नाम जल्प है । स्वपक्ष- स्थापन शून्य परपक्षखण्डन रूप कथा वितण्डा है । वादी और प्रतिवादी दोनोंके परस्पर पक्ष प्रतिपक्ष स्वीकारके नाम कथा है । साध्यका असाधक हो हेतुके समान भासमान है वह हेत्वाभास है। वह सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरण, सम और काला- त्यय भेदसे पाँच प्रकार है ॥ ६ ॥ शब्दवृत्तिव्यत्ययेन प्रतिषेधहेतुश्छलम् । तत्रिविधमभिधानता- त्पर्योपचारवृत्तिव्यत्ययभेदात् ॥ स्वव्याघातकमुत्तरं जातिः सा चतुर्विंशतिविधा । साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविक- ल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणाहे- त्वर्थापत्तिविशेषापत्युपलब्ध्यनुपलब्धिनित्यानित्यकार्य्यसम- भेदात् ॥ ७ ॥ शब्द वृत्ति ( शक्तिको ) व्यत्यास करके प्रतिषेध हेतु छल है वह अभिधानवृत्ति- व्यत्यय, तात्पर्य्यवृत्तिव्यत्यय और लक्षणोवृत्तिव्यत्ययभेदसे तीन प्रकार है । स्वपक्षका विघातक उत्तर जाति है वह साधर्म्य १ वैधर्म्य २ उत्कर्ष ३ अपकर्ष ४ वर्ण्य ५ अवर्ण्य ६ विकल्प ७ साध्य ८ प्राप्ति ९ अप्राप्ति १० प्रसङ्ग ११ प्रति- १ जैसे किसीके नूतन कम्बलके तात्पर्य्यमे 'नवकम्बलो देवदत्त ' ऐसा उच्चारण किया तहापर नवशब्दके नूतन अर्थमें जो शक्ति है उसको हटाकर नौसंख्यामें वृत्ति मानकर 'कथ नवकम्बलो देवदत्त एक एव कम्बल ' अर्थात् ९ कम्बल कहा है एकही कम्बल है ऐसा कहना सर्व शब्दके वृत्तिके व्यत्यासरूप कहा है ।
(२०४) सर्वदर्शनसंग्रहः। [अक्षपाद-
दृष्टान्त १२ अनुत्पत्ति १३ संशय १४ प्रकरण १५ अहेतु १६ अर्थापत्ति १७ विशेषा- पत्ति १८ उपलब्धि १९ अनुपलब्धि २० नित्य २१ अनित्य २२ कार्य २३ और सम २४ इन भेदोंसे २४ प्रकारके हैं ॥ ७ ॥ पराजयनिमित्तं निग्रहस्थानम् । तद्द्वाविंशतिप्रकारं प्रतिज्ञा- हानिप्रतिज्ञान्तरप्रतिज्ञाविरोधप्रतिज्ञासन्न्यासहेत्वन्तरार्थान्तर- निरर्थकाविज्ञातार्थापार्थकाप्राप्तकालन्यूनाधिकपुनरुक्ताननुभाष- णाज्ञानाप्रतिभाविक्षेपमतानुज्ञापर्य्यनुयोज्योपेक्षणनिरनुयोज्या- नुयोगापसिद्धान्तहेत्वाभासभेदात् ॥ अत्र सर्वान्तर्गणिकस्तु विशेषस्तत्र शास्त्रे विस्पष्टोऽपि विस्तरभिया न प्रस्तूयते ॥ ८ ॥ पराजयनिमित्त वाक्य निग्रहस्थान है वह २२ प्रकारके हैं इनके अवान्तर भेद और लक्षणादि सब न्यायदर्शनादिमें स्पष्ट हैं ॥ ८ ॥ ननु प्रमाणादिपदार्थषोडशके प्रतिपाद्यमाने कथमिदं न्याय- शास्त्रमिति व्यपदिश्यते । सत्यं, तथाप्यसाधारण्येन व्यपदेशा भवन्तीति न्यायेन न्यायस्य परार्थानुमानापरपर्यायस्य सक- लविद्यानुग्राहकतया सर्वकर्मानुष्ठानसाधनतया प्रधानत्वेन तथा व्यपदेशो युज्यते ॥ तथाभाणि सर्वज्ञेन, सोऽयं परमो न्याय विप्रतिपन्नपुरुषप्रतिपादकत्वात् तथा प्रवृत्तिहेतुत्वा- च्चेति ॥ पक्षिलस्वामिना च "सेयमान्वीक्षिकी विद्या प्रमाणा- दिभि पदार्थै प्रविभज्यमाना-"प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्म्माणां विद्योद्देशे परी- क्षिते ॥ " इति ॥ ९ ॥ शंका-इस शास्त्रमे प्रमाणादि षोडश पदार्थका प्रतिपादन है तो इसको न्यायशास्त्र क्यों कहा जाता है? उत्तर-यद्यपि पदार्थ प्रतिपादक हे तथापि प्रधान व्यपदेश न्यायसे परार्थानुमानके अपरपर्यायन्याय सकलशास्त्रके उपकार ओर सर्वकर्मानुष्ठानका साधक होनेके कारण न्यायशास्त्र व्यवहार होता है। सूत्रकारनेभी कहा हे विप्रतिपन्न पुरुषकी विप्रतिपत्तिके निराकरण साधन ओर प्रवृत्तिहेतु होनेसे न्यायही प्रधान हे । पक्षिलस्वा- मीनेभी कहा है कि प्रमाणादि पदार्थोंसे विभक्त इस विद्याको आन्वीक्षकी विद्या कहते हैं। संपूर्ण विद्याके प्रकाशकप्रदीप समस्त कर्मका उपाय, ओर समस्त धर्मका आश्रय
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २०५ ) विद्याके उद्देशमे विमृष्ट हे प्रत्यक्ष प्रमाणसे ईक्षित होनेपर आन्वीक्षकी कही जाती है ॥ ९ ॥ ननु तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसं भवतीत्युक्तं तत्र किं तत्त्वज्ञाना- दनन्तरमेव निःश्रेयसं सम्पद्यते नेत्युच्यते किन्तु तत्त्वज्ञाना- द्दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भाव इति ॥ तत्र मिथ्याज्ञानं नामानात्मनि देहादावात्मबुद्धिः तदनुकूलेषु रागः तत्प्रतिकूलेषु द्वेषः वस्तुतस्त्वात्मनः प्रति- कूलमनुकूलं वा न किञ्चित्समस्ति । परस्परानुबन्धत्वाच्च रागादीनां मूढो रज्यति रक्तो मुह्यति मूढ कुप्यति कुपितो मुह्यतीति । ततस्तैर्दोषैः प्रेरितः प्राणी प्रतिषिद्धानि शरीरेण हिंसास्तेयादीन्याचरति वाचा अनृतादीनि मनसा परद्रोहादीनि सेयं पापरूपा प्रवृत्तिरधर्ममावहतीति ॥ १० ॥ तत्त्वज्ञानसे मुक्ति होती है इस प्रकार कहा है सो वह क्या तत्त्वज्ञानसे अव्यव- हित उत्तरकालमें ही होती है उत्तर तत्त्वज्ञानके अनन्तर नहीं तत्त्वज्ञानसे दुःख, जन्म प्रवृत्ति, दोष मिथ्याज्ञानके उत्तर उत्तरके नाश द्वारा पूर्व पूर्वके नाश होनेसे होती है । अनात्मभूत देहेन्द्रियादिमें आत्मबुद्धि मिथ्या ज्ञान है तादृश देहानुकूल वस्तुमें राग और प्रतिकूल वस्तुमें द्वेष होता है वस्तुतः आत्माका न कुछभी प्रतिकूल है न अनुकूल है रागमोहादि परस्पर सम्बन्ध होनेसे होते हैं यथा मूढ अनुरक्त होता है अनुरक्त मुग्ध होता है मूढ क्रुद्ध होता है और क्रुद्ध मुग्ध हो जाता है । अतः उक्तदोषोंसे प्रेरित पुरुष शरीरसे निषिद्ध हिंसादि करते हैं वचनसे मिथ्याभाषणादि करते हैं और मनसे परद्रोहादि करते हैं । ऐसी पापरूप प्रवृत्तिसे अधर्म उत्पन्न होता है ॥ १० ॥ शरीरेण प्रशस्तानि दानपरपरित्राणादीनि वाचा हितसत्या- दीनि मनसा अहिंसादीनि सेयं पुण्यरूप प्रवृत्तिर्धर्मः ॥ सेय- त्तिः तत स्वानुरूपं प्रशस्तं निन्दितं वा जन्म पुनः शरीरादेः प्रादुर्भावः । तस्मिन् सति प्रतिकूलवेदनीय- तया वासनात्मक दुःखं भवति । त इमे मिथ्याज्ञानादयो
( २०६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ अक्षपाद- दुःखान्ता अविच्छेदेन प्रवर्त्तमानाः । संसारशब्दार्थो घटीच- क्रवन्निरवधिरनुवर्त्तते ॥ ११ ॥ शरीरसे उत्तम दान ओर प्राणियोकी रक्षा प्रभृति कर्म होते हैं, वचनसे सत्य ओर प्रिय भाषण और मनसे अहिंसादि होते हैं यह सब पुण्यरूप प्रवृत्तिके धर्म हे । यह पुण्य पापरूप दो प्रकारकी प्रवृत्ति हे उनसे पुण्य ओर पापरूप कर्मानुसार प्रशस्त अथवा निन्दित जन्म प्राप्त होते हैं । पश्चात् शरीरेन्द्रियादिका प्रादुर्भाव होता हे शरीर सम्बन्ध- वश प्रतिकूलवेदनीय दुःख होता हे एवम्भूत मिथ्याज्ञानादि दुःखान्त निरन्तर प्रवर्त्तमान होता हुआ ससार घटीय-न्त्रकी समान घूमता रहता हे ॥ ११ ॥ यदा कश्चित् पुरुषधौरेयः पुराकृतसुकृतपरिपाकवशादाचार्यो- पदेशेन सर्वमिदं दुःखायतनं दुःखानुषक्तं च पश्यति तदा तत्सर्वं हेयत्वेन बुध्यते । ततस्तन्निर्वर्त्तकमविद्यादि निवर्त्त- यितुमिच्छति, तन्निवृत्त्युपायश्च तत्त्वज्ञानमिति ॥ १२ ॥ जब कोई महापुरुष पूर्वकृत पुण्योंके फलसे आचार्यके उपदेशद्वारा ससारको दुःखका आलय और दुःखसे मिलेहुए देखते हैं तब उनको समस्त वस्तुओंमें त्याज्यबुद्धि होती है । अत ससारनिर्वर्त्तक ( प्रापक ) अविद्यादिसे छूटनेकी इच्छा करते हैं अविद्यानिवृत्तिका उपाय तत्त्व ज्ञान है ॥ १२ ॥ कस्यचिच्चतसृभिर्विद्याभिर्विभक्तं प्रमेयं भावयतः सम्यग्दर्शन- पदवेदनीयतया तत्त्वज्ञानं जायते, तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानमपैति मिथ्याज्ञानापाये दोषाः अपयान्ति, दोषापाये प्रवृत्तिरपैति प्रवृत्त्यपाये जन्मापैति, जन्मापाये दुःखमत्यन्तं निवर्त्तते, सात्यन्तिकी निवृत्तिरपवर्गः। निवृत्तेरात्यन्तिकत्वं नाम निवर्त्य सजातीयस्य पुनस्तत्रानुत्पाद इति ॥ तथाच पारमर्षं सूत्रम् ‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भावादपवर्ग' इति ॥ १३ ॥ आन्वीक्षकी आदि चार विद्याओंसे विभक्त प्रमेयकी भावना करनेवाले किसीको सम्यग् दर्शन पर्याय तत्त्वज्ञान होता है तत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति होती है उससे दोषोंका नाश, दोषनाशमे प्रवृत्तिनाश, प्रवृत्तिनाशमे जन्मनाश, जन्मनाशसे
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २०७ ) दुःखका अत्यन्त उच्छेद होता है। दुःख़ात्यन्तनिवृत्तिहीका नाम अपवर्ग (मोक्ष) है निवर्त्तनीय दुःखके समान दुःखान्तरकी अनुत्पत्तिके नाम आत्यन्तिक निवृत्ति है अर्थात् वासनासहितका उच्छेद हो । सूत्रार्थ पहिलेँ लिख चुका हूं ॥ १३ ॥ ननु दुःखात्यन्तोच्छेदोऽपवर्ग इत्येतदद्यापि कफोणिगुडायितं वर्तते तत्कथं सिद्धवत्कृत्य व्यवह्रियत इति चेन्मैवं सर्वेषां मोक्षवा- दिनामपवर्गदशायामात्यन्तिकी दुःख़निवृत्तिरस्तीत्यस्यार्थस्य सर्वतन्त्रसिद्धान्तसिद्धतया घण्टापथत्वात् । नह्यप्रवृत्तस्य दुःखं प्रत्यापद्यते इति कश्चित् प्रपद्यते । तथा हि आत्मोच्छेदो मोक्ष इति माध्यमिकमते दुः खोच्छेदोऽस्तीत्येतावत्तावदवि- वादम् ॥ १४ ॥ शंका-दुःखका अत्यन्त उच्छेद अपवर्ग है यह आजतक कफोणिगुडायितं अर्थात् हाथकी कलाईको गुड़के मीठा माननेके समान है जो असिद्ध है उसको प्रत्यक्ष सिद्धवत् कैसे व्यवहार करते हो। उत्तर-मोक्षदशामें दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति है इसमें सब मोक्षवादियोंके सिद्धान्त समान होनेसे यह निष्कण्टक मार्ग हे प्रवृत्ति- शून्यको दुःखकी प्राप्ति होती है ऐसे कोईभी नहीं मानते हैं यथा आत्मोच्छेदको मोक्ष माननेवाले माध्यमिकोंके मतमे दुःखका उच्छेद निर्विवाद है ॥ १४ ॥ अथ मन्येथा शरीरादिवदात्मापि दुःखहेतुत्वादुच्छेद्य इति तन्न सङ्गच्छते विकल्पानुपपत्तेः ॥ किमात्मा ज्ञानसन्तानो विवक्षित तदरिक्तो वा । प्रथमे न विप्रतिपत्ति । कः खल्व- नुकूलमाचरति प्रतिकूलमाचरेत् । द्वितीये तस्य नित्यत्वे निवृत्तिरशक्यविधानेव । प्रवृत्त्यनुपपत्तिश्चाधिकं दूषणं, न खलु कश्चित् प्रेक्षावानात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति सर्वतः प्रियतमस्यात्मन समुच्छेदाय प्रयतते । सर्वो हि प्राणी मुक्त इति व्यवहरति ॥ १५ ॥ यदि कहो शरीरवत् आत्माभी दुःखके हेतु होनेसे उच्छेद्य है वह असंगत है क्योंकि कल्पनामे विरुद्ध है तथाहि आत्मपदसे क्या ज्ञान सन्तान अभिमत है,
( २०८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ अक्षपाद- किंवा उससे अतिरिक्त ? पहिलेमे कुछ विरोध नही, कौन ऐसा होगा अनुकूल आचरण करनेवालेके विषयमें प्रतिकूल आचरण करेगा अतिरिक्तपक्षमें अतिरिक्त आत्माको यदि नित्य मानो तो नित्यकी निवृत्ति असम्भव होगी प्रत्युत प्रवृत्तिकी अनुपपत्ति दोष अधिक रह जाता है आत्माके लिये सब प्रिय होते हैं, इत्यादि सबसे प्रियतम आत्माको उच्छेदके लिये कोई बुद्धिमान् प्रयत्न न करेगा परन्तु सब कोई मुक्तव्यवहार करते हैं अत मुक्ति आत्मोच्छेदसे अन्य हैं ॥ १५ ॥ ननु धर्मिनिवृत्तौ निर्मलज्ञानोदयो महोदय इति विज्ञानवादि- वादे सामग्र्यभावः सामानाधिकरण्यानुपपत्तिश्च भावनाचतु- ष्टयं हि तस्य कारणमभीष्टम् । यच्च क्षणभङ्गपक्षे स्थिरैकाधा- रासम्भवात् लङ्घनाभ्यासादिवदनासादितप्रकर्षं न स्फुटमाभि- ज्ञानमभिजनयितु प्रभवति सोपप्लवस्य ज्ञानसन्तानस्य बद्धत्वे निरुपप्लवस्य च मुक्तत्वे यो बद्धः स एव मुक्त इति सामा- नाधिकरण्यं न सङ्गच्छते ॥ १६ ॥ धर्मी आत्माकी निवृत्ति होनेपर निर्मल ज्ञानका उदयरूपी मोक्ष हे इस प्रकार कहनेवाले विज्ञानवादीके मतमें सामग्रीका अभाव और सामानाधिकरण्यकी अनुपप- त्तिरूप दोषद्वय हैं। सर्वम् दुःख, स्वलक्षण, क्षणिक, शून्य, यह भावनाचतुष्टय उनके मतमें कारण है क्षणभङ्गपक्षमे आधार स्थिर न होनेसे अतिशयारोप जिसमें न हुआ हो उसमें स्फुटतरविज्ञान हो नहीं सकता यथा उपवासादि अभ्यास विना दीर्घकाल नहीं हो सकता सोपप्लव ( भ्रान्तियुक्त ) बद्ध और निरुपप्लव मुक्त हो तो जो बद्ध है सोई मुक्त हे ऐसा सामानाधिकरण्यभी न हो सकेगा ॥ १६ ॥ आवरणमुक्तिर्मुक्तिरिति जैनजनाभिमतोऽपि मार्गो न निर्गतो निरर्गल । अङ्ग भवान् पृष्टो व्याचष्टां किमावरणं, धर्माधर्म- भ्रान्तय इति चेत् इष्टमेव । अथ देहमेवावरणं तथाच तन्निवृत्तौ पञ्जरान्मुक्तस्य शुकस्येवात्मन सततोर्ध्वगमन मुक्तिरिति चेत्तदा वक्तव्यं किमयमात्मा मूर्त्तोऽमूर्त्तो वा । प्रथमे निरवयव- सावयवो वा । निरवयवत्वे निरवयवो मूर्त्तः परमाणुरिति पर- माणुलक्षणापत्त्या परमाणुधर्मवदात्मधर्माणामतीन्द्रियत्वं प्रस- ज्येत ॥ सावयवत्वे यत्सावयवं तदनित्यमिति प्रतिबन्धबलेना-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( २०९ ) नित्यत्वापत्तौ कृतप्रणाशाकृताभ्यागमौ निष्प्रतिबन्धौ प्रसरे- ताम् ॥ अमूर्त्तत्वे गमनमनुपपन्नमेव चलनात्मिकायाः क्रियाया- मूर्त्तप्रतिबन्धात् ॥ १७ ॥ आवरणभंग मुक्ति है ऐसा जैनियोंका मत हे । यहभी निर्दुष्ट नही। क्योकि आवरण किसको कहते हैं ऐसे किसीके पूछनेपर क्या उत्तर कहोगे ? धर्म्माधर्म्मकी भ्रान्ति कहो तो इष्टापत्ति है। यदि देहहीको आवरण कहकर देहनिवृत्ति होनेपर पिंजरासे छूटे पक्षीके समान सतत ऊर्ध्वगमनही मुक्ति मानो तो कहना होगा ! आत्मा क्या मूर्त्त हे या अमूर्त्त है ? मूर्त्त माना तो निरवयव, किंवा सावयव है ? निरवयव मानो तो निरवयव मूर्त्त परमाणु है परमाणुके धर्मरूपादिका प्रत्यक्ष होता नही तद्वत् आत्माभी परमाणुरूप होनेसे आत्माके धर्मकाभी प्रत्यक्ष न होगा। सावयव माने तो सावयव जनित्य होनेसे आत्माभी अनित्य होगा तो कृतका विनाश अकृतकी प्राप्ति दुर्নিবার हो जायगी अर्थात् दूसरेके किया हुआ कर्मका फल दूसरेको मिलने लगेगा। अमूर्त्त माने तो निरन्तर ऊर्ध्वगमनभी असम्भव होगा गमनक्रिया मूर्त्तद्रव्यहीमें होती है ॥ १७ ॥ पारतन्त्र्यं बन्धः स्वातन्त्र्यं मोक्ष इति चार्वाकपक्षेऽपि स्वात- न्त्र्यं दुःखनिवृत्तिश्चेदविवाद ऐश्वर्य्य चेत्सातिशयतया सहक्ष- तया च प्रेक्षावतां नाभिमतम् ॥ १८ ॥ परतन्त्रताको बन्ध और स्वतन्त्रताको मोक्ष कहनेवाले चार्वाकोंके मतमेंभी स्वात- न्त्र्यको दुःखनिवृत्ति मानो तो आपत्ति नही है यदि ऐश्वर्य्य मानो तो एकसे अधिक ऐश्वर्य्य दूसरेको उनसेभी अधिक और किसीको होंगे इस प्रकार सातिशय होनेसे बुद्धिमानोंके मन्तव्य नही है क्योंकि परायेकी उत्कृष्ट सम्पत्तिको देखकर अल्प- सम्पत्तिमान्को दुःख होता है ॥ १८ ॥ प्रकृतिपुरुषान्यत्वख्यातौ प्रकृत्युपरमे पुरुषस्य स्वरूपेणाव- स्थानं मुक्तिरिति साङ्ख्याख्यातेऽपि पक्षे दुःखोच्छेदोऽभ्युपेयते विवेकज्ञानं पुरुषाश्रयं प्रकृत्याश्रयं वेति एतावदवशिष्यते। तत्र पुरुषाश्रयमिति न श्लिष्यते पुरुषस्य कौटस्थ्यात् स्थाननिरोधा- पातान्नापि प्रकृत्याश्रय अचेतनत्वात्तस्या ॥ किञ्च प्रकृतिः प्रवृत्तिस्वभावा वा निवृत्तिस्वभावा वा । आद्ये अनिर्मोक्षः स्वभावस्यानपायात् । द्वितीये सम्प्रति संसारोऽस्तमियात् ॥१९॥ १४
( २१० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ अक्षपाद- प्रकृति और पुरुषके भेदज्ञान द्वारा प्रवृत्तिके नष्ट होनेपर पुरुषका स्वरूपसे अवस्थानको मुक्ति माननेवाले सांख्योंके मतमें भी दुःखोच्छेद होतेही है केवल विवेक- ज्ञान प्रकृतिमे है या पुरुषमें यह विचार अवशिष्ट है । पुरुपाश्रय नहीं कह सकते क्योंकि पुरुष कूटस्थ और निर्विकार है स्थाननिरोध होनेसे प्रकृत्याश्रयभी नहीं कह सकते क्योकि प्रकृति अचेतन भी है किंवा प्रकृति प्रवृत्तिस्वभाव है किंवा निवृत्ति स्वभाव है प्रथम पक्षम स्वभावका नाश न होनेसे अनिर्मोक्ष होगा द्वितीय पक्षमें सं- सारहीका उच्छेद होगा ॥ १९ ॥ नित्यनिरतिशयसुखाभिव्यक्तिर्मुक्तिरिति भट्टसर्वज्ञाद्याभिमतेपि दुःखनिवृत्तिरभिमतैव । परन्तु नित्यसुखं न प्रमाणपद्ध- तिमध्यास्ते ॥ श्रुतिस्तत्र प्रमाणमिति चेन्न योग्यानुपलब्धि- वाधिते तदनवकाशादवकाशे वा ग्रावप्तावेऽपि तथाभावप्र- सङ्गात् ॥ २० ॥ नित्यनिरतिशयसुखप्राप्तिकी मुक्ति माननेवाले भट्ट ओर सर्वज्ञ मुनिके मतमें भी दुःखनिवृत्ति अवश्य हे परन्तु नित्यसुखप्राप्तिमें प्रमाण नहीं ‘सर्वान् कामानवाप्नोति सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ ‘जानात्येवाय पुरुष’ इत्यादि श्रुतिभी योग्यानुपलब्धि- तर्कसे वाधितहैं । अन्यथा ‘ग्रावाणः प्लवन्ते’ इत्यादि पाषाणतरणकाभी प्रामाण्य होने लगेगा ॥ २० ॥ ननु सुखाभिव्यक्तिर्मुक्तिरिति पक्षं परित्यज्य दुःखनिवृत्तिरेव मुक्तिरिति स्वीकारः क्षीरं विहायारोचकग्रस्तस्य सौवीररुचि- मनुभवतीति चेत्तदेतन्नाटकपक्षपतितं त्वद्वच इत्युपेक्ष्यते । सुखस्य सातिशयत्या प्रत्यक्षतया बहुप्रत्यनीकाक्रान्ततया साधनप्रार्थनापरिक्लिष्टतया च दुःखाविनाभूतत्वेन विषानुषक्त- मधुवत् दुःखपक्षनिक्षेपात् ॥ २१ ॥ सुखाभिव्यक्तिरूप मुक्तिको छोडकर दुःखनिवृत्तिमात्रकी मुक्ति मानना अरुचिग्र- स्तको दूधको छोडकर कांजी या बेरकी रुचि करानेका समान है ऐसा कहना केवल नाटकमात्र हे क्योंकि सुख पक्षमे एक अतिशय युक्त प्रत्यक्ष होता है और अनेक विघ्नोंसे बिगड़ता है ओर साधन चिन्ताओंद्वारा परिक्लिष्ट होनेसे विषसंयुक्त मधुके समान दुःखही है ॥ २१ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २११ ) नन्वेकमनुसन्धित्सतोऽपरं प्रच्यवते इति न्यायेन दुःखवत् सुखमित्युच्छिद्यत इति अकाम्योऽयं पक्ष इति चेन्मैवं मंस्थाः। सुखसम्पादने दुःखसाधनबाहुल्यानुषङ्गनियमेन तप्तायः पिण्डे तपनीयबुद्ध्या प्रवर्त्तमानेन साम्यापातात् । तथाहि न्यायोपा- र्जितेषु विषयेषु कियन्तः सुखखद्योताः कियन्ति दुःखदुर्दि- नानि अन्यायोपार्जितेषु तु यद्भविष्यति तन्मनसापि चिन्त- यितुं न शक्यमित्येतत् स्वानुभवमप्रच्छादयन्तः सन्तो विदां- कुर्वन्तु विदांवरा भवन्तः ॥ २२ ॥ एकके अनुसन्धानसे दूसरा नष्ट होता है इस न्यायके समान दुःखके समान सुखकाभी उच्छेद करना यह पक्ष अयुक्त है ऐसा नहीं कहसकते सुखके सम्पादनमें अनेक दुःखसाधनसम्पर्क होनेसे तप्तलोहमें कनकबुद्धिसे प्रवृत्तिकी समान है तथाहि नीतिसे सम्पादित विषयोंमें कितने सुख खद्योत ( जुगूनू ) है ओर कितने दुःख दुर्दिन है ओर एव अन्यायसे सम्पादितोंमें जो हैं उनको मनसे चिन्तवनभी नहीं कर सकते इसको विद्वान्लोग विचारलें ॥ २२ ॥ तस्मात् परिशेषात् परमेश्वरानुग्रहवशाच्छ्रवणादिक्रमेणात्मत- त्त्वसाक्षात्कारवतः पुरुषधौरेयस्य दुःखनिवृत्तिरात्यन्तिकी निःश्रेयसमिति निरवद्यम् ॥ २३ ॥ अतः परिशिष्ट परमेश्वरके अनुग्रहवश श्रवणमननादि क्रमसे आत्मतत्त्वको साक्षा- त्कृतपुरुषको आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष होता है यह निर्दुष्ट सिद्ध है ॥२३॥ नन्वीश्वरसद्भावे किं प्रमाणं प्रत्यक्षमनुमानमागमो वा । न ताव- दत्र प्रत्यक्षं क्रमते रूपादीरहितत्वेनातीन्द्रियत्वात्, नाप्यनु- मानं तद्व्याप्तिलिङ्गाभावात्, नागमः विकल्पासहत्वात् ॥ किं नित्योऽवगमयत्यनित्यो वा । आद्ये अपसिद्धान्तापातः । द्वितीये परस्पराश्रयापातः । उपमानादिकमशक्यशङ्कं नियत- विषयत्वात् ॥ तस्मादीश्वरः शशविषाणायते इति चेत्तदेतन्न चतुरचेतसां चेतसि चमत्कारमाविष्करोति । विवादास्पदं
(२१२) सर्वदर्शनसंग्रह । [ अक्षपाद- नगसागरादिकं सकर्तृकं कार्य्यत्वात् कुम्भवत् न चायम- सिद्धो हेतु सावयवत्वेन तस्य सुसाधनत्वात् ॥ २४ ॥ प्रत्यक्षादिके मध्यमे ईश्वरसद्भावमे कोनसा प्रमाण हे रूपीद्रव्यका प्रत्यक्ष होता है ईश्वर रूपादि शून्य होनेसे अतीन्द्रिय है अत. उसको प्रत्यक्ष नही कह सकते व्याप्तिज्ञान न होनेसे अनुमानभी नही हो सकता । आगमको मानां तो क्या ईश्वर बोधक वेद नित्य है या अनित्य हे ?, नित्य माने तो सिद्धान्त विरुद्ध होगा क्योंकि नैयायिकलोग वेदको ईश्वरोच्चारित मानते हैं । अनित्यभी नही कह सक्ने वेदसे ईश्वर सिद्धि होगी ईश्वर सिद्ध होनेपर तदुच्चरित वेदसिद्धि होगी इस प्रकार अन्योन्याश्रय होगा । उपमान दृष्ट वस्तुके सदृशमें होता हे अत वहभी नही हो सक्ता इसलिये ईश्वर खरगोशके शृंगके समान तुच्छ है ऐसा कथन चतुरके हृदयमें चम- त्कार पहुँचानेवाला नहीं हे। क्योकि विवादग्रस्त पर्वत मही सागरादिके कर्त्ता कोई है घटके समान कार्य होनेसे इत्यादि अनुमान ईश्वर साधक हे पर्वतादिमे कार्यत्व न होनेसे हेतुकी आश्रयासिद्धिकी आशंका नहीं कर सक्ने सावयवत्वहेतुमे उसमभी कार्यत्व सिद्ध हे ॥ २४ ॥ ननु किमिदं सावयवत्त्वम् अवयवसंयोगित्वम् अवयवसमवा- यित्वं वा । नाद्यं गगनादौ व्यभिचारात् । न द्वितीयं तन्तुत्वा- दावनैकान्त्यात् । तस्मादनुपपन्नमिति चेन्मैवं वादी । समवे- तद्रव्यत्वं सावयवत्वमिति निरुक्तेर्वक्तुं शक्यत्वात् । अवान्तरम- हत्त्वेन वा कार्य्यत्वानुमानस्य सुकरत्वात् नापि विरुद्धो हेतुः साध्यविपर्य्ययव्याप्तेरभावात् । नाप्यनैकान्तिकः पक्षादन्यत्र वृत्तेरदर्शनात् । नापि कालात्ययापदिष्ट बाधकानुपलम्भात् । नापि सत्प्रतिपक्ष प्रतिभटादर्शनात् ॥ २५ ॥ सावयवत्वहेतुसे पर्वतादिम जो कार्यत्व साधन किया उसम सावयवत्वका निर्व- चन क्या है ? अवयव संयोगित्व हे अथवा अवयवसमवेतत्व हे कपालादि अवय- वका आकाशके साथ सयोग होनेसे अवयवसंयोगित्व हेतु आकाशादिमें व्यभिच- रित है तन्तुआदि अवयवम तन्तुत्व द्रव्यत्वादि समवेत होनेसे अवयव समवायित्व- सामान्यादिमें व्यभिचरित होनेके कारण द्वितीयमी नहीं कहसकते अत सावयवत्व अनुपपन्न है ऐसा नहीं कहसक्ते हो क्योकि समवेत (समवाय स वन्धसे वर्तमान)
[ दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २१३ ) द्रव्यत्व सावयवका निर्वचन हो सकता है सामान्यमें समवेतत्व है परन्तु द्रव्यत्व नहीं आकाशम द्रव्यत्व है समवेतत्व नहीं इसलिये उसमें व्यभिचार नही अवान्त- रमहत्त्वसेभी कार्यत्वानुमान हो सकता है अवान्तरमहत्त्व अपकर्षाश्रयमहत्त्व है पर्व- तादिम आकाशकी अपेक्षा अपकर्षभी है अन्यापेक्षा महत्त्वभी है अतः लक्षण- समन्वय होजायगा साध्यविपरीतसे व्याप्त न होनेके कारण हेतु विरुद्धभी नहीं पक्षसे अन्यत्र न रहनेसे अनैकान्तिकभी नहीं बाधकोपलव्धि न होनेमे कालात्ययापदिष्ट ( असिद्ध ) भी नहीं साध्याभावसाधकहेत्वन्तर न होनेसे सत्प्रतिपक्षभी नहीं ॥ २५ ॥ ननु नगादिकमकर्तृकं शरीराजन्यत्वात् गगनवदिति चेन्नैत- त्परीक्षाक्षममीक्ष्यते । न हि कठोरकण्ठीरवस्य कुरङ्गशावः प्रतिभटो भवति अजन्यत्वस्यैव समर्थतया शरीरविशेषणवै- यर्थ्यात् । तर्ह्यजन्यत्वमेव साधनमिति चेन्नासिद्धे । नापि सोपाधिकत्वशङ्काकलङ्कांकुर सम्भवी अनुकूलतर्कसम्भवात् । यद्ययमकर्तृक स्यात् कार्यमपि न स्यादिह जगति नास्त्येव तत्कार्य नाम य कारकचक्रमवधीर्यात्मानमासादयेदित्येत- दनिर्वादम् ॥ २६ ॥ शरीरसे न जन्य होनेके कारण पर्वतादिक अकर्तृक इत्यादि सत्प्रतिपक्षभी परी- क्षायोग्य नहीं है भयङ्कर सिंहका प्रतिभट हरिणका बच्चा नहीं होता है अजन्यत्व रूप हेतुसे काम चलहीगा तो शरीरत्वविशेषणरूपभी व्यर्थ है तर्हि अजन्यत्वही हेतु रहे यहभी नहीं कह सकते क्योंकि स्वरूपासिद्ध है सोपाधिकत्वरूप शंकाक- लङ्कमी नही कहसकते, कार्यत्व नही होता तो सावयवत्वभी नही होता ऐसा अनुकूल तर्क रहता है । यदि सकर्तृक न होते तो कार्यभी नहीं होते ऐसे सकर्तृकानुमानमेंभी अनुकूल तर्क हे यह निर्विवाद है कि ऐसा संसारमें कोई कार्य नहीं जो कारक कलापका तिरस्कार करके आत्मलाभ प्राप्त करता हो ॥ २६ ॥ तच्च सर्वं कर्तृविशेषोपहितमर्यादं कर्तृत्वं चेतरकारकाप्रयो- ज्यत्वे सति सकलकारकप्रयोक्तृत्वलक्षणं ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्ना- धारत्वम् एवञ्च कर्तृव्यावृत्तेस्तदुपहितसमस्तकारकव्यावृत्ता- वकारणककार्योत्पादप्रसङ्ग इति स्थूल प्रमाद ॥ २७ ॥
( २१४ ) सर्वदर्शनसंग्रह. । [ अक्षपाद-
कर्तृविशेष वृत्ति कर्तृत्व कारकान्तरसे अजन्य हो स्वयं कारकचक्रका प्रयोजकत्व रूप ज्ञान चिकीर्षाका आधार है तथा कर्तासे रहित होनेपर तदधीन सम्पूर्ण कारककी निवृत्ति होनेसे अकारणक कार्योत्पत्ति हो जायगी ॥ २७ ॥ तथा निराटंकि शंकरकिंकरेण । "अनुकूलेन तर्केण सनाथे सति साधने । साध्यव्यापकताभङ्गात् पक्षे नोपाधिस- म्भव ॥" इति । यदीश्वर कर्त्ता स्यात्तर्हि शरीरी स्यादि- त्यादिप्रतिकूलतर्कजातं जागर्तीति चेदीश्वरसिद्धयसिद्धिभ्यां व्याघात ॥ तदुदितमुदयनेन । “आगमादे प्रमाणत्वे बाध- नाद्विनिषेधनम् । आभासत्वे तु सैव स्यादाश्रयासिद्धिरु- द्धता ॥" इति । न च विशेषविरोधः शक्यशङ्क ज्ञातत्वा- ज्ञातत्वविकल्पप राहतत्वात् ॥ २८ ॥ शंकरामिश्रनेभी कहा है अनुकूल तर्कसे हेतु सनाथ हो जानेपर साध्य व्याप- कता न रहनेसे पक्षमें हेतुका उपाधिविशिष्टत्वभी नहीं है इति अर्थात् साध्यका अव्यापक होकर साधनका अव्यापक उपाधि होता है । यदि कहो ईश्वर कर्त्ता हो तो शरीरीभी होगा इत्यादि प्रतिकूल तर्क विद्यमान है तो ईश्वरसिद्धि और असिद्धि दोनों प्रकारसे व्याहत है उदयनाचार्यने कहा है आगमादि ईश्वरमे प्रमाण है तो प्रकरणके बाध होनेसे निषेध नहीं हो सकता प्रमाणाभास मानो तो आश्रयासिद्धि होगी विशेष विरोध भी अशक्य है यदि ईश्वर ज्ञात हो तो निषेध असम्भव है अज्ञात हो तो अप्रसिद्धका निषेधभी व्यर्थ है ॥ २८ ॥ तदेतत्परमेश्वरस्य जगन्निर्माणे प्रवृत्तिः किमर्था स्वार्था परार्था वा । आद्येऽपीष्टप्राप्त्यर्था अनिष्टपरिहारार्था वा । नाद्यः अना- प्तसकलकामस्य तदनुपपत्ते अत एव न द्वितीय ॥ द्वितीये प्रवृत्त्यनुपपत्ति क खलु परार्थ प्रवर्त्तमानं प्रेक्षावानित्याच- क्षीत । अथ करुणया प्रवृत्त्युपपत्तिरित्याचक्षीत कश्चित्तं प्रत्याचक्षीत तर्हि सर्वान् प्राणिन सुखिन एव सृजेदीश्वरः न दु खशबलान् करुणानिरोधात् । स्वार्थमनपेक्ष्य परदु खप्रहर- णेच्छा हि कारुण्यम् । तस्मादीश्वरस्य जगत्सृर्जनं न युज्यते
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१५ ) तदुक्तं भट्टाचार्यैः- "प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते । जगच्चासृजतस्तस्य कि नाम न कृतं भवेत् ॥" इति ॥ २९ ॥ उक्त जगन्निर्माणमें ईश्वरकी प्रवृत्ति स्वार्थ हे अथवा परार्थ है ? स्वार्थपक्षमेंभी क्याह इष्टप्राप्तिके लिये या अनिष्टनिवृत्तिके लिये ? अवाप्तसमस्तकाम होनेसे दोनों नहीं कह सकते परार्थभी प्रवृत्ति नहीं हो सकती है केवल परार्थ प्रवर्त्तमानको कोन बुद्धिमान् कहेगा । यदि करुणासे प्रवृत्ति मानो तो ईश्वर समस्त प्राणियोंको सुखी करते दुःख- प्रपंचही न करते दुःखसृष्टि करना करुणाके विपरीत होता है स्वार्थनिरपेक्ष होकर परदुःखनिवारणकी इच्छाही करुणा है अतः ईश्वरका जगत्कर्तृत्व अनुपपन्न है भट्टाचार्यने भी कहा है कि प्रयोजनके विना मन्दभी नही प्रवृत्त होता है जगतको न रचनेसे ईश्वरको अकृत (अप्राप्त) क्या रहता है अर्थात् कुछभी नहीं ॥ २९ ॥ नास्तिकशिरोमणे तावदीर्ष्याकषायिते चक्षुषी निमील्य परि- भावयतु भवान् करुणया प्रवृत्तिरस्त्येव न च निसर्गत सुख- मयसर्गप्रसंग सृज्यप्राणिकृतसुकृतदुष्कृतपरिपाकविशेषाद्- वैषम्योपपत्तेः । न च स्वातन्त्र्यभंग शङ्कनीयः स्वांगं स्वव्य- वधायको न भवतीति न्यायेन प्रत्युत तन्निर्वाहात् एक एव रुद्रो न द्वितीयोवतस्थे इत्यादिरागमस्तत्र प्रमाणम् ॥ ३० ॥ अयि नास्तिकशिरोमणि ! पहिले द्वेषदूषित नेत्रको बन्दकर विचार करो करुणासे प्रवृत्ति हेही यदि कहो सुखमय सृष्टि होनी चाहिये यहभी नही सृष्टव्यप्राणियोंके सुकृतदुष्कृतवश विषम सृष्टि होती है अपना अङ्ग अपनेको व्यवधायक नहीं होता इस न्यायमे स्वातन्त्र्यभंगभी नहीं होता प्रत्युत उसका निर्वाहक है एकही रुद्र पूर्व थे द्वितीय कोई नहीं थे इत्यादि आगमभी ईश्वरमे प्रमाण है ॥ ३० ॥ यद्येवं तर्हि परस्पराश्रयबाधव्यानिवं समाधत्स्वेति चेत् तस्या- न्नुत्थानात् किमुत्पत्तौ परस्पराश्रय शंक्यते ज्ञप्तौ वा । नाद्यः आगमस्येश्वरार्धनोत्पत्तिकत्वेऽपि परमेश्वरस्य नित्यत्वेनोत्प- त्तेरनुपपत्तेः । नापि ज्ञप्तौ परमेश्वरस्य आगमाधीनज्ञप्तिक- त्वेऽपि तस्यान्यतोऽवगमात् । नापि तदनित्यतज्ज्ञप्तौ आग- माऽनित्यतस्य तीव्रादिधर्मोपेतत्वादिना सुगगत्वात् ॥ तस्मा-
( २१६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय-
निवर्तकधर्मानुष्ठानवशादीश्वरप्रसादसिद्धावभिमतार्थसिद्धिरिति सर्वमवदातम् ॥ ३१ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे अक्षपाददर्शनं समाप्तम् ॥ ११ ॥ यदि आगम प्रमाण मानो तो पूर्वोक्त अन्योन्याश्रय होगा यहभी नहीं है क्योंकि अन्योन्याश्रयको उत्पत्तिमें कहते हो या ज्ञानमें कहते हो ? आगमकी उत्पत्ति ईश्व- राधीन होनेपरभी नित्य ईश्वरकी उत्पत्ति न होनेसे प्रथम पक्ष नहीं कह सकते । ईश्व- रका ज्ञान आगमाधीन होनेपरभी आगमज्ञान प्रकारान्तर होनेसे द्वितीय पक्षभी निर्बल है । आगमानित्यत्वज्ञप्तिभी तीव्रमन्दादिधर्मयुक्त होनेसे सुगम है अतः निवर्तक धर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरप्रसन्नतासे अभिमत सिद्धि निरापद है ॥ ३१ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे अक्षपाददर्शनम् ।
अथ जैमिनीयदर्शनम् ॥ १२ ॥ ननु धर्मानुष्ठानवशादभिमतधर्मसिद्धिरिति जेगीयते भवता । तत्र धर्मं किल्लक्षणः किंप्रमाणक इति चेत् उच्यते श्रूयता- मवधानेन । अस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनं प्राच्या मीमांसायां प्रादर्शि जैमिनिना मुनिना ॥ सा हि मीमांसा द्वादशलक्षणी॥ १॥ धर्मानुष्ठानसे अभिमत धर्मसिद्धि होती है ऐसा उद्घोष करते हैं अतः धर्मका लक्षण और प्रमाण क्या है सो कहते हैं सावधान चित्तसे उत्तर सुनिये इसका उत्तर पूर्वमीमांसामें जैमिनिमुनिने कहा है मीमांसाशास्त्र 'अथातो धर्मजिज्ञासा' से आरम्भ कर जन्महेत्वन्त द्वादशाध्यायात्मक है ॥ १ ॥ तत्र प्रथमेऽध्याये विध्यर्थवादमन्त्रस्मृतिनामधेयार्थकस्य शब्द- राशेः प्रामाण्यम् । द्वितीये कर्मभेदोपोद्घातप्रमाणापनादप्रयो- गभेदरूपोऽर्थः । तृतीये श्रुतिलिङ्गवाक्यादिनिरूपप्रतिपत्तिक- र्मानारभ्याधीतबहुप्रधानोपकारकप्रयाजादियाजमानचिन्तनम्। चतुर्थे प्रधानप्रयोजकत्वाप्रधानप्रयोजकत्वजुहूपर्णतादिफलरा- जसूयगतजघन्याकांक्ष्यूतादिचिन्ता । पञ्चमे श्रुत्यादिक्रमत- द्विशेषवृद्ध्यर्द्धनमानल्पदौर्बल्यचिन्ता । षष्ठे अधिकारित-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१७ ) धर्मद्रव्यप्रतिनिध्यर्थलोपनप्रायश्चित्तसत्रदेयवह्निविचारः । सप्त- मे प्रत्यक्षवचनातिदेशेषु नामलिङ्गातिदेशविचारः । अष्टमे स्पष्टास्पष्टप्रबललिङ्गातिदेशापवादविचारः । नवमे ऊहविचा- रारम्भसामोहमन्त्रोहतत्प्रसंगागतविचारः ॥ दशमे बाधहेतुद्वा- रलोप-विस्तारबाधकारणकार्यैकत्वग्रहादिसामप्रकीर्ण-नञर्थवि- चारः । एकादशे तन्त्रोपोद्घाततन्त्रावापतन्त्रप्रपञ्चनावापप्रपञ्च- नचिन्तनानि । द्वादशे प्रसंगतन्त्रनिर्णयसमुच्चयविकल्पवि- चारः ॥ २ ॥ प्रथमाध्यायमें विधि अर्थवाद मन्त्रस्मृति नामधेय और शब्दका प्रामाण्य वर्णन किया है । द्वितीयमें कर्मभेद उपोद्घातप्रमाण और अपवादप्रयोग है । तृतीयमे श्रुति- लिंगादिविरोध, प्रतिपत्तिकर्म, अनारभ्याधीत और बहुप्रधानोपकारक प्रयाजादि याजमानचिन्तन है । चतुर्थमें प्रधानप्रयोजकत्व, अप्रधानप्रयोजकत्व, जुहू ओर पर्ण- तादिफल राजसूयगतजघन्याङ्ग अक्षद्यूतादिचिन्ता है । पञ्चममें श्रुत्यादिक्रम तद्देशोप- वृद्धि जबर्द्धन प्राबल्य दोर्बल्यका विचार है । षष्ठमें अधिकारी और उसका धर्म द्रव्य प्रतिनिधि ओर अर्थलोपप्रायश्चित्त सत्रदेयवह्निविचार है । सप्तममें प्रत्यक्षवचन अतिदेशमें नामलिङ्गका अतिदेशविचार है । अष्टमम स्पष्ट अस्पष्ट प्रवल लिङ्गका अतिदेश अपवादका विचार है, नवममें ऊहाविचारारम्भ सामोह मन्त्रोह तथा तत्प्र- संगप्राप्तका विचार है दशममें वाधहेतुद्वारलोपविस्तार वाधकारणकार्य एकत्वग्रहादि- साम प्रकीर्णन नञर्थविचार है । एकादशमें तन्त्र उपोद्घाततन्त्र आवापतन्त्र प्रपञ्चन नावापप्रपञ्चन विचार है । द्वादशाध्यायमें प्रसङ्गतन्त्र निर्णय समुच्चय विचार ओर विकल्प विचार किया है ॥ २ ॥ तत्र 'अथातो धर्मजिज्ञासा' इति प्रथममधिकरणं पूर्वमीमांसार- म्भोपपादनपरम् ॥ अधिकरणञ्च पञ्चावयवमाचक्षते परीक्षकाः । ते च पञ्चावयवा विषयसंशयपूर्वपक्षसिद्धान्तसङ्गतिरूपा ॥ तत्राचार्यमतानुसारेणाधिकरणं निरूप्यते । 'स्वाध्यायोऽध्ये- तव्यः' इत्येतद्वाक्यं विषय ॥ ३ ॥ अथातो धर्म्मजिज्ञासा यह प्रथमाधिकरण पूर्वमीमांसाका आरम्भपरक है और विषय १, संशय २, पूर्वपक्ष ३, सिद्धान्त ४, सङ्गतिरूप पञ्चावयव अधिकरण है । प्रथम
( २१८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय- कुमारिलमतके अनुसार अधिकरणार्थका विचार करते हैं- (स्वाध्यायेति) अध्या- यका अर्थ वेद है स्वकीय अध्याय स्वाध्याय है यहां स्वत्व विवक्षित है तथा च “वेदानधीत्य वेदौ वेत्यादि” मनुवचनसे यद्यपि वेदचतुष्टयका अध्ययन प्रतीत होता है तथापि “शाखाखण्डं सविज्ञेय इत्यादि” वचनोंसे शाखान्तरका अध्ययन निषिद्ध होनेके कारण स्वकीय वेदमें स्वशाखामात्रका अध्ययन और वेदान्तरका यथावकाश अध्ययनका कर्तव्यबोधक उक्त वाक्यविषय है ॥ ३ ॥ चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म इत्यारभ्यान्वाहार्ये च दर्शनादित्येत- दन्तं जैमिनीयं धर्मशास्त्रमनारभ्यमारभ्यं वेति सन्देहः ॥ ४ ॥ मीमांसाशास्त्र आरम्भणीय है, या नहीं ? इस प्रकार संशय है ॥ ४ ॥ अध्ययनविधेरदृष्टार्थदृष्टार्थत्वाभ्या तत्रानारभ्यमिति पूर्वः पक्ष । अध्ययनविधेरर्थावबोधलक्षकदृष्टफलकत्वानुपपत्ते- रर्थावबोधार्थमध्ययनविधिरिति वदन् वादी प्रष्टव्य किमत्य- न्तमप्राप्तमध्ययनं विधीयते किंवा पाक्षिकमवघातवन्नियम्यत इति ॥ न तावदाद्य , विवादपदं वेदाध्ययनमर्थावबोधहेतुः अध्ययनत्वाद्भारताध्ययनवदित्यनुमानेन विध्यनपेक्षतया प्राप्त- त्वात् ॥ अस्तु तर्हि द्वितीय यथा नखविदलादिना तण्डुल- निष्पत्तिसम्भवात् अवघातनिष्पन्नैरेव तण्डुलै पिष्टपुरोडाशा- दिकरणे अवान्तरापूर्वद्वारा दर्शपूर्णमासौ परमापूर्वमुत्पादयत- नापरथा अतः अपूर्वमवघातस्य नियमहेतु प्रकृते लिखित- पाठजन्येनाध्ययनजन्येन वार्थविबोधेन क्रत्वनुष्ठानसिद्धेरध्यय- नस्य नियमहेतुर्नास्त्येव । तस्मादर्थावबोधहेतुविचारशास्त्रस्य वैधत्वं नास्तीति । तर्हि श्रूयमाणस्य विधे का गतिरिति चेत् स्वर्गफलकोऽक्षरग्रहणमात्रविधिरिति भवान् परितुष्यतु ॥ ५ ॥ अध्ययनविधि अदृष्टार्थ हो, या दृष्टार्थपर हो, उभयथापि विचारशास्त्रका आरम्भ न करना चाहिये यह पूर्वपक्ष है अध्ययनविधि अर्थावबोधनरूप दृष्टफलक नहीं हो सकता अतः अर्थावबोधनार्थ अध्ययनविधि है ऐसे कहनेवाले वादीसे पूछना चाहिये अत्यन्त अप्राप्त अध्ययनका विधान करता है व्रीहीन् अवहन्ति इतिवत पक्षमें प्राप्तको नियम
१०. जैमिनीय पूर्व मीमांसा दर्शन
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१९ ) करता है विवादाध्यासित वेदाध्ययन विधिभी भारतका अध्ययनवत् अर्थावबोधक है इत्यादि अनुमानद्वारा सिद्ध होनेसे प्रथम पक्षको कह नहीं सकते 'व्रीहीनवहन्ति' इत्यादि स्थलमें हननविधि जैसा नियम करता है अवहननसे निष्पन्न तण्डुलद्वारा सम्पादित हविष्यसे उत्पन्न अवान्तर अपूर्वद्वारा दर्शपूर्णमासयागमें परम अपूर्व होता है अन्यथा नहीं इत्यादि अपूर्व अवघातके नियमपरत्वमें कारण है। यहापर लिखित पाठजन्य अर्थज्ञानसे किंवा अध्ययनजन्य अर्थज्ञानसे यज्ञका अनुष्ठान सिद्ध है अतः अध्ययनविधिको नियमपरत्वमें कोई हेतु नहीं है अतः अर्थावबोधक विचारशास्त्र विधिसिद्ध नहीं है। श्रूयमाण अध्ययन विधिकी क्या दशा होगी अक्षरराशिमात्रग्रहण- रूप अध्ययनविधिको स्वर्गसाधक मानकर संतोप करो ॥ ५ ॥ विश्वजिन्यायेनाश्रुतस्यापि कल्पयितुं शक्यत्वात् यथा स स्वर्गः सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वादिति विश्वजित्यश्रुतमप्यधि- कारिण सम्पादयता तद्विशेषणं स्वर्गः फलं युक्त्या निरणायि तद्वदध्ययनेऽप्यस्तु ॥ तदुक्तम्- “विनापि विधिना दृष्टलाभान्न हि तदर्थता । कल्पास्तु विधिसामर्थ्यात् स्वर्गो विश्वजिदा- दिवत् ॥” इति ॥ ६ ॥ यदि कहो स्वर्ग अध्ययनविधिमें उद्देश्यरूपसे श्रुत न होनेके कारण फलरूपसे स्वर्गकी कल्पना नहीं कर सकते हैं सो भी नहीं कह सकते जिस प्रकार 'विश्वजि- ता यजेत' इति विश्वजित्यागमें फल अश्रुत होनेपरभी सबके कामनाविषय होनेसे स्वर्गफलकी कल्पना होती है तिसी प्रकार यहापरभी होगा। अध्ययनविधिके विनाभी अर्थज्ञानरूप फल निगमनिरुक्तादिद्वारा सम्भव होनेसे अध्ययनविधि अर्थज्ञानार्थ नहीं हो सकता एवञ्च विधिके सार्थकताके लिये विश्वजिन्यायवत् स्वर्गादि फलकी कल्पना करनी होगी ॥ ६ ॥ एवञ्च सति वेदमधीत्य स्नायादिति स्मृतिरनुगृहीता भवति । अत्र हि वेदाध्ययनसमावर्त्तनयोरव्यवधानमवगम्यते ॥ तावके मते त्वधीतेऽपि वेदेधर्मविचाराय गुरुकुले वस्तव्यं तथा सत्य- व्यवधान वाध्येत । तस्माद्विचारशास्त्रस्य वैधत्वाभावात् पाठमात्रेण स्वर्गसिद्धे समावर्त्तनशास्त्राच्च धर्मविचारशास्त्रमना- रम्भणीयम् इति पूर्वपक्षसंक्षेपः ॥ ७ ॥
( २२० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय- अतएव वेदाध्ययनानन्तर समावर्तन ( गृहस्थाश्रमग्रहण ) विधिभी उपपन्न होता है यह विधि अध्ययन और समावर्तनका अव्यवहित पूर्वापरकाल निर्णय करती है आपके मतमें वेदाध्ययन करके धर्मविचारके लिये गुरुकुलम निवास करना होगा तब तो अव्यवधान बाधित होगा अतः विचारशास्त्र विधिविषय न होनेसे अक्षर- पाठमात्रसेही स्वर्गसिद्धि होनेके कारण और समावर्तन शास्त्रवलसे धर्मविचार ( मी मासा ) शास्त्र अनारम्भणीय हे ॥ ७ ॥ सिद्धान्तस्त्वन्यत प्राप्तत्वादप्राप्तविधित्वं मास्तु नियमविधि- त्वपक्षस्तु वज्रहस्तेनापि नापहस्तयितु पार्यते ॥ तथाहि स्वा- ध्यायोध्येतव्य इति तव्यप्रत्यय प्रेरणापर्यायां पुरुषप्रवृत्तिरू- पार्थभावनाभाव्यामभिधाभावनां प्रत्याययति । सा ह्यर्थभा- वनासहितमनुबद्धं भाव्यमाकाङ्क्षति न तावत्समानपदोपात्त- मध्ययनभाव्यं परिरभते ॥ अध्ययनशब्दार्थस्य स्वाधीनोच्चा- रणक्षमत्वस्य वाङ्मनसव्यापारस्य क्लेशार्थकस्य भाव्यत्वासम्भ- वात् । नापि समानवाक्योपात्त स्वाध्याय स्वाध्यायशब्दा- र्थस्य वर्णराशेर्नित्यत्वेन विभुत्वेन चोत्पत्त्यादीनां चतुर्णां क्रियाफलानामसम्भवात् । तस्मात्सामर्थ्यप्राप्तोऽर्थावबोधो भा- व्यत्वेनावतिष्ठते ॥ ८ ॥ (सिद्धान्त इति ) प्रकारान्तरद्वारा प्राप्त होनेसे अप्राप्तविधि न हो परन्तु नियमविधि- पक्षको वज्रपाणिभी नहीं हटा सकते हैं ( तथाहि इति ) शाब्दी और आर्थी भेदसे दो प्रकारकी भावना होती हे लिङ् लेट् लोट् तव्यप्रत्ययादिवाच्यभावना शाब्दी कही जाती है शब्दभावना निष्पाद्य पुरुषनिष्ठ प्रवृत्तिरूप भावना आर्थी हे प्रत्येक भावनामें साध्यसाधन इतिकर्तव्यतारूप अंशत्रय रहते हैं । एवञ्च अध्येतव्यमें तव्यप्रत्यय प्रेरणापर्याय पुरुषप्रवृत्तिरूप अर्थ भावना भाव्य शब्दभावनाको बोध करता है वही भावना अर्थभावनासहित भाव्यकी अपेक्षा करती है उसमें एकपदोपात्त अध्ययन भाव्य नहीं हो सकता क्योंकि अध्ययनशब्दार्थ स्वाधीनोच्चारणक्षम क्लेशजनक वाङ्मनोव्यापार है अत उसका भाव्यत्व असम्भव है समान वाक्योपात्त स्वाध्यायभी भाव्य नहीं हो सकता । क्योंकि स्वाध्यायशब्दवाच्य अक्षरराशिको नित्य मानो तो उसमें उत्पत्ति वृद्धि अपक्षय और नाशरूप चतुर्विध क्रियाफल असम्भव है अत सामर्थ्यप्राप्त अर्थावबोध भाव्यतयासम्वन्ध हो सकता है ॥ ८ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २२१ ) 'अर्थी समर्थो विद्वानधिक्रियते' इति न्यायेन दर्शपूर्णमासादि- विषयावबोधमवेक्षमाणा तत्त्वबोधे स्वाध्यायं विनियुञ्जते । अध्ययनविधिश्च लिखितपाठादिव्यावृत्त्या अध्ययनसंस्कृतत्वं स्वाध्यायस्यावगमयति । तथाच यथा दर्शपूर्णमासादिजन्यं परमापूर्वम् अवघातादिजन्यस्यावान्तरापूर्वस्य कल्पकं तथा समस्तक्रतुजन्यमपूर्वजातं क्रतुज्ञानसाधनाध्ययननियमजन्यम- पूर्वं कल्पयिष्यति नियमादृष्टानिष्ठौ विधिश्रवणवैफल्यमापद्येत। न च विश्वजिद्न्यायेन फलकल्पनावकल्प्यते अर्थावबोधे दृष्टे फले सति फलान्तरकल्पनाया अयोगात् ॥ ९ ॥ अर्थी समर्थ और विद्वान् अधिकारी होता हे ऐसा नियम हे दर्शपूर्णमासादि-वि- षयनिर्णयाभिलाषी तत्त्वबोधमें स्वाध्यायविधिको विनियोग करते हैं अध्ययनविधि लिखितपाठको व्यावृत्ति करक अध्ययन सहकृतत्व बोधन करता है यथा दर्शपूर्ण- मासादिजन्यपरमापूर्व अवघातादिजन्य अवान्तर अपूर्वको कल्पना करता है तथा समस्त क्रतुजन्य अपूर्वजाति क्रतुज्ञानसाधन अध्ययननियमजन्य अपूर्वको कल्पना करेगा नियमजन्य अपूर्वको न मानो तो विधिही व्यर्थ हो जायगा विश्वजिद्न्यायसे स्वर्गफल- कल्पना अयुक्त है क्योंकि अर्थावबोधरूप दृष्टफल सम्भव हो तो अदृष्टफलकल्पना अन्याय है ॥ ९ ॥ तदुक्तम्-“लभ्यमाने फले दृष्टे नादृष्टफलकल्पना । विधेस्तु नियमार्थत्वान्नानर्थक्यं भविष्यति ॥ "इति ॥ १० ॥ दृष्टफल प्राप्त हो तो अदृष्टकल्पना नही होती है अध्ययनविधिकी नियमार्थता सम्भव होनेसे वैयर्थ्य नहीं ॥ १० ॥ ननु वेदमात्राध्यायिनोऽर्थावबोधानुदयेऽपि साङ्गवेदाध्यायिन पुरुषस्यार्थावबोधसम्भवात् । विचारशास्त्रस्य वैफल्यमिति चेत्तदसमञ्जसम्, बोधमात्रसम्भवेऽपि निर्णयस्य विचाराधीन- त्वात् । तद्यथा, अक्ता शर्करा उपदधातीत्यत्र घृतेनैव न तैलादिनेत्यर्थनिर्णयो व्याकरणेन निगमेन निरुक्तेन वा न लभ्यते,