सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय-
निवर्तकधर्मानुष्ठानवशादीश्वरप्रसादसिद्धावभिमतार्थसिद्धिरिति सर्वमवदातम् ॥ ३१ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे अक्षपाददर्शनं समाप्तम् ॥ ११ ॥ यदि आगम प्रमाण मानो तो पूर्वोक्त अन्योन्याश्रय होगा यहभी नहीं है क्योंकि अन्योन्याश्रयको उत्पत्तिमें कहते हो या ज्ञानमें कहते हो ? आगमकी उत्पत्ति ईश्व- राधीन होनेपरभी नित्य ईश्वरकी उत्पत्ति न होनेसे प्रथम पक्ष नहीं कह सकते । ईश्व- रका ज्ञान आगमाधीन होनेपरभी आगमज्ञान प्रकारान्तर होनेसे द्वितीय पक्षभी निर्बल है । आगमानित्यत्वज्ञप्तिभी तीव्रमन्दादिधर्मयुक्त होनेसे सुगम है अतः निवर्तक धर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरप्रसन्नतासे अभिमत सिद्धि निरापद है ॥ ३१ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे अक्षपाददर्शनम् ।
अथ जैमिनीयदर्शनम् ॥ १२ ॥ ननु धर्मानुष्ठानवशादभिमतधर्मसिद्धिरिति जेगीयते भवता । तत्र धर्मं किल्लक्षणः किंप्रमाणक इति चेत् उच्यते श्रूयता- मवधानेन । अस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनं प्राच्या मीमांसायां प्रादर्शि जैमिनिना मुनिना ॥ सा हि मीमांसा द्वादशलक्षणी॥ १॥ धर्मानुष्ठानसे अभिमत धर्मसिद्धि होती है ऐसा उद्घोष करते हैं अतः धर्मका लक्षण और प्रमाण क्या है सो कहते हैं सावधान चित्तसे उत्तर सुनिये इसका उत्तर पूर्वमीमांसामें जैमिनिमुनिने कहा है मीमांसाशास्त्र 'अथातो धर्मजिज्ञासा' से आरम्भ कर जन्महेत्वन्त द्वादशाध्यायात्मक है ॥ १ ॥ तत्र प्रथमेऽध्याये विध्यर्थवादमन्त्रस्मृतिनामधेयार्थकस्य शब्द- राशेः प्रामाण्यम् । द्वितीये कर्मभेदोपोद्घातप्रमाणापनादप्रयो- गभेदरूपोऽर्थः । तृतीये श्रुतिलिङ्गवाक्यादिनिरूपप्रतिपत्तिक- र्मानारभ्याधीतबहुप्रधानोपकारकप्रयाजादियाजमानचिन्तनम्। चतुर्थे प्रधानप्रयोजकत्वाप्रधानप्रयोजकत्वजुहूपर्णतादिफलरा- जसूयगतजघन्याकांक्ष्यूतादिचिन्ता । पञ्चमे श्रुत्यादिक्रमत- द्विशेषवृद्ध्यर्द्धनमानल्पदौर्बल्यचिन्ता । षष्ठे अधिकारित-