भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१५ ) तदुक्तं भट्टाचार्यैः- "प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते । जगच्चासृजतस्तस्य कि नाम न कृतं भवेत् ॥" इति ॥ २९ ॥ उक्त जगन्निर्माणमें ईश्वरकी प्रवृत्ति स्वार्थ हे अथवा परार्थ है ? स्वार्थपक्षमेंभी क्याह इष्टप्राप्तिके लिये या अनिष्टनिवृत्तिके लिये ? अवाप्तसमस्तकाम होनेसे दोनों नहीं कह सकते परार्थभी प्रवृत्ति नहीं हो सकती है केवल परार्थ प्रवर्त्तमानको कोन बुद्धिमान् कहेगा । यदि करुणासे प्रवृत्ति मानो तो ईश्वर समस्त प्राणियोंको सुखी करते दुःख- प्रपंचही न करते दुःखसृष्टि करना करुणाके विपरीत होता है स्वार्थनिरपेक्ष होकर परदुःखनिवारणकी इच्छाही करुणा है अतः ईश्वरका जगत्कर्तृत्व अनुपपन्न है भट्टाचार्यने भी कहा है कि प्रयोजनके विना मन्दभी नही प्रवृत्त होता है जगतको न रचनेसे ईश्वरको अकृत (अप्राप्त) क्या रहता है अर्थात् कुछभी नहीं ॥ २९ ॥ नास्तिकशिरोमणे तावदीर्ष्याकषायिते चक्षुषी निमील्य परि- भावयतु भवान् करुणया प्रवृत्तिरस्त्येव न च निसर्गत सुख- मयसर्गप्रसंग सृज्यप्राणिकृतसुकृतदुष्कृतपरिपाकविशेषाद्- वैषम्योपपत्तेः । न च स्वातन्त्र्यभंग शङ्कनीयः स्वांगं स्वव्य- वधायको न भवतीति न्यायेन प्रत्युत तन्निर्वाहात् एक एव रुद्रो न द्वितीयोवतस्थे इत्यादिरागमस्तत्र प्रमाणम् ॥ ३० ॥ अयि नास्तिकशिरोमणि ! पहिले द्वेषदूषित नेत्रको बन्दकर विचार करो करुणासे प्रवृत्ति हेही यदि कहो सुखमय सृष्टि होनी चाहिये यहभी नही सृष्टव्यप्राणियोंके सुकृतदुष्कृतवश विषम सृष्टि होती है अपना अङ्ग अपनेको व्यवधायक नहीं होता इस न्यायमे स्वातन्त्र्यभंगभी नहीं होता प्रत्युत उसका निर्वाहक है एकही रुद्र पूर्व थे द्वितीय कोई नहीं थे इत्यादि आगमभी ईश्वरमे प्रमाण है ॥ ३० ॥ यद्येवं तर्हि परस्पराश्रयबाधव्यानिवं समाधत्स्वेति चेत् तस्या- न्नुत्थानात् किमुत्पत्तौ परस्पराश्रय शंक्यते ज्ञप्तौ वा । नाद्यः आगमस्येश्वरार्धनोत्पत्तिकत्वेऽपि परमेश्वरस्य नित्यत्वेनोत्प- त्तेरनुपपत्तेः । नापि ज्ञप्तौ परमेश्वरस्य आगमाधीनज्ञप्तिक- त्वेऽपि तस्यान्यतोऽवगमात् । नापि तदनित्यतज्ज्ञप्तौ आग- माऽनित्यतस्य तीव्रादिधर्मोपेतत्वादिना सुगगत्वात् ॥ तस्मा-