भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( २१४ ) सर्वदर्शनसंग्रह. । [ अक्षपाद-

कर्तृविशेष वृत्ति कर्तृत्व कारकान्तरसे अजन्य हो स्वयं कारकचक्रका प्रयोजकत्व रूप ज्ञान चिकीर्षाका आधार है तथा कर्तासे रहित होनेपर तदधीन सम्पूर्ण कारककी निवृत्ति होनेसे अकारणक कार्योत्पत्ति हो जायगी ॥ २७ ॥ तथा निराटंकि शंकरकिंकरेण । "अनुकूलेन तर्केण सनाथे सति साधने । साध्यव्यापकताभङ्गात् पक्षे नोपाधिस- म्भव ॥" इति । यदीश्वर कर्त्ता स्यात्तर्हि शरीरी स्यादि- त्यादिप्रतिकूलतर्कजातं जागर्तीति चेदीश्वरसिद्धयसिद्धिभ्यां व्याघात ॥ तदुदितमुदयनेन । “आगमादे प्रमाणत्वे बाध- नाद्विनिषेधनम् । आभासत्वे तु सैव स्यादाश्रयासिद्धिरु- द्धता ॥" इति । न च विशेषविरोधः शक्यशङ्क ज्ञातत्वा- ज्ञातत्वविकल्पप राहतत्वात् ॥ २८ ॥ शंकरामिश्रनेभी कहा है अनुकूल तर्कसे हेतु सनाथ हो जानेपर साध्य व्याप- कता न रहनेसे पक्षमें हेतुका उपाधिविशिष्टत्वभी नहीं है इति अर्थात् साध्यका अव्यापक होकर साधनका अव्यापक उपाधि होता है । यदि कहो ईश्वर कर्त्ता हो तो शरीरीभी होगा इत्यादि प्रतिकूल तर्क विद्यमान है तो ईश्वरसिद्धि और असिद्धि दोनों प्रकारसे व्याहत है उदयनाचार्यने कहा है आगमादि ईश्वरमे प्रमाण है तो प्रकरणके बाध होनेसे निषेध नहीं हो सकता प्रमाणाभास मानो तो आश्रयासिद्धि होगी विशेष विरोध भी अशक्य है यदि ईश्वर ज्ञात हो तो निषेध असम्भव है अज्ञात हो तो अप्रसिद्धका निषेधभी व्यर्थ है ॥ २८ ॥ तदेतत्परमेश्वरस्य जगन्निर्माणे प्रवृत्तिः किमर्था स्वार्था परार्था वा । आद्येऽपीष्टप्राप्त्यर्था अनिष्टपरिहारार्था वा । नाद्यः अना- प्तसकलकामस्य तदनुपपत्ते अत एव न द्वितीय ॥ द्वितीये प्रवृत्त्यनुपपत्ति क खलु परार्थ प्रवर्त्तमानं प्रेक्षावानित्याच- क्षीत । अथ करुणया प्रवृत्त्युपपत्तिरित्याचक्षीत कश्चित्तं प्रत्याचक्षीत तर्हि सर्वान् प्राणिन सुखिन एव सृजेदीश्वरः न दु खशबलान् करुणानिरोधात् । स्वार्थमनपेक्ष्य परदु खप्रहर- णेच्छा हि कारुण्यम् । तस्मादीश्वरस्य जगत्सृर्जनं न युज्यते

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