सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २१३ ) द्रव्यत्व सावयवका निर्वचन हो सकता है सामान्यमें समवेतत्व है परन्तु द्रव्यत्व नहीं आकाशम द्रव्यत्व है समवेतत्व नहीं इसलिये उसमें व्यभिचार नही अवान्त- रमहत्त्वसेभी कार्यत्वानुमान हो सकता है अवान्तरमहत्त्व अपकर्षाश्रयमहत्त्व है पर्व- तादिम आकाशकी अपेक्षा अपकर्षभी है अन्यापेक्षा महत्त्वभी है अतः लक्षण- समन्वय होजायगा साध्यविपरीतसे व्याप्त न होनेके कारण हेतु विरुद्धभी नहीं पक्षसे अन्यत्र न रहनेसे अनैकान्तिकभी नहीं बाधकोपलव्धि न होनेमे कालात्ययापदिष्ट ( असिद्ध ) भी नहीं साध्याभावसाधकहेत्वन्तर न होनेसे सत्प्रतिपक्षभी नहीं ॥ २५ ॥ ननु नगादिकमकर्तृकं शरीराजन्यत्वात् गगनवदिति चेन्नैत- त्परीक्षाक्षममीक्ष्यते । न हि कठोरकण्ठीरवस्य कुरङ्गशावः प्रतिभटो भवति अजन्यत्वस्यैव समर्थतया शरीरविशेषणवै- यर्थ्यात् । तर्ह्यजन्यत्वमेव साधनमिति चेन्नासिद्धे । नापि सोपाधिकत्वशङ्काकलङ्कांकुर सम्भवी अनुकूलतर्कसम्भवात् । यद्ययमकर्तृक स्यात् कार्यमपि न स्यादिह जगति नास्त्येव तत्कार्य नाम य कारकचक्रमवधीर्यात्मानमासादयेदित्येत- दनिर्वादम् ॥ २६ ॥ शरीरसे न जन्य होनेके कारण पर्वतादिक अकर्तृक इत्यादि सत्प्रतिपक्षभी परी- क्षायोग्य नहीं है भयङ्कर सिंहका प्रतिभट हरिणका बच्चा नहीं होता है अजन्यत्व रूप हेतुसे काम चलहीगा तो शरीरत्वविशेषणरूपभी व्यर्थ है तर्हि अजन्यत्वही हेतु रहे यहभी नहीं कह सकते क्योंकि स्वरूपासिद्ध है सोपाधिकत्वरूप शंकाक- लङ्कमी नही कहसकते, कार्यत्व नही होता तो सावयवत्वभी नही होता ऐसा अनुकूल तर्क रहता है । यदि सकर्तृक न होते तो कार्यभी नहीं होते ऐसे सकर्तृकानुमानमेंभी अनुकूल तर्क हे यह निर्विवाद है कि ऐसा संसारमें कोई कार्य नहीं जो कारक कलापका तिरस्कार करके आत्मलाभ प्राप्त करता हो ॥ २६ ॥ तच्च सर्वं कर्तृविशेषोपहितमर्यादं कर्तृत्वं चेतरकारकाप्रयो- ज्यत्वे सति सकलकारकप्रयोक्तृत्वलक्षणं ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्ना- धारत्वम् एवञ्च कर्तृव्यावृत्तेस्तदुपहितसमस्तकारकव्यावृत्ता- वकारणककार्योत्पादप्रसङ्ग इति स्थूल प्रमाद ॥ २७ ॥