सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२१२) सर्वदर्शनसंग्रह । [ अक्षपाद- नगसागरादिकं सकर्तृकं कार्य्यत्वात् कुम्भवत् न चायम- सिद्धो हेतु सावयवत्वेन तस्य सुसाधनत्वात् ॥ २४ ॥ प्रत्यक्षादिके मध्यमे ईश्वरसद्भावमे कोनसा प्रमाण हे रूपीद्रव्यका प्रत्यक्ष होता है ईश्वर रूपादि शून्य होनेसे अतीन्द्रिय है अत. उसको प्रत्यक्ष नही कह सकते व्याप्तिज्ञान न होनेसे अनुमानभी नही हो सकता । आगमको मानां तो क्या ईश्वर बोधक वेद नित्य है या अनित्य हे ?, नित्य माने तो सिद्धान्त विरुद्ध होगा क्योंकि नैयायिकलोग वेदको ईश्वरोच्चारित मानते हैं । अनित्यभी नही कह सक्ने वेदसे ईश्वर सिद्धि होगी ईश्वर सिद्ध होनेपर तदुच्चरित वेदसिद्धि होगी इस प्रकार अन्योन्याश्रय होगा । उपमान दृष्ट वस्तुके सदृशमें होता हे अत वहभी नही हो सक्ता इसलिये ईश्वर खरगोशके शृंगके समान तुच्छ है ऐसा कथन चतुरके हृदयमें चम- त्कार पहुँचानेवाला नहीं हे। क्योकि विवादग्रस्त पर्वत मही सागरादिके कर्त्ता कोई है घटके समान कार्य होनेसे इत्यादि अनुमान ईश्वर साधक हे पर्वतादिमे कार्यत्व न होनेसे हेतुकी आश्रयासिद्धिकी आशंका नहीं कर सक्ने सावयवत्वहेतुमे उसमभी कार्यत्व सिद्ध हे ॥ २४ ॥ ननु किमिदं सावयवत्त्वम् अवयवसंयोगित्वम् अवयवसमवा- यित्वं वा । नाद्यं गगनादौ व्यभिचारात् । न द्वितीयं तन्तुत्वा- दावनैकान्त्यात् । तस्मादनुपपन्नमिति चेन्मैवं वादी । समवे- तद्रव्यत्वं सावयवत्वमिति निरुक्तेर्वक्तुं शक्यत्वात् । अवान्तरम- हत्त्वेन वा कार्य्यत्वानुमानस्य सुकरत्वात् नापि विरुद्धो हेतुः साध्यविपर्य्ययव्याप्तेरभावात् । नाप्यनैकान्तिकः पक्षादन्यत्र वृत्तेरदर्शनात् । नापि कालात्ययापदिष्ट बाधकानुपलम्भात् । नापि सत्प्रतिपक्ष प्रतिभटादर्शनात् ॥ २५ ॥ सावयवत्वहेतुसे पर्वतादिम जो कार्यत्व साधन किया उसम सावयवत्वका निर्व- चन क्या है ? अवयव संयोगित्व हे अथवा अवयवसमवेतत्व हे कपालादि अवय- वका आकाशके साथ सयोग होनेसे अवयवसंयोगित्व हेतु आकाशादिमें व्यभिच- रित है तन्तुआदि अवयवम तन्तुत्व द्रव्यत्वादि समवेत होनेसे अवयव समवायित्व- सामान्यादिमें व्यभिचरित होनेके कारण द्वितीयमी नहीं कहसकते अत सावयवत्व अनुपपन्न है ऐसा नहीं कहसक्ते हो क्योकि समवेत (समवाय स वन्धसे वर्तमान)