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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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(२०४) सर्वदर्शनसंग्रहः। [अक्षपाद-

दृष्टान्त १२ अनुत्पत्ति १३ संशय १४ प्रकरण १५ अहेतु १६ अर्थापत्ति १७ विशेषा- पत्ति १८ उपलब्धि १९ अनुपलब्धि २० नित्य २१ अनित्य २२ कार्य २३ और सम २४ इन भेदोंसे २४ प्रकारके हैं ॥ ७ ॥ पराजयनिमित्तं निग्रहस्थानम् । तद्द्वाविंशतिप्रकारं प्रतिज्ञा- हानिप्रतिज्ञान्तरप्रतिज्ञाविरोधप्रतिज्ञासन्न्यासहेत्वन्तरार्थान्तर- निरर्थकाविज्ञातार्थापार्थकाप्राप्तकालन्यूनाधिकपुनरुक्ताननुभाष- णाज्ञानाप्रतिभाविक्षेपमतानुज्ञापर्य्यनुयोज्योपेक्षणनिरनुयोज्या- नुयोगापसिद्धान्तहेत्वाभासभेदात् ॥ अत्र सर्वान्तर्गणिकस्तु विशेषस्तत्र शास्त्रे विस्पष्टोऽपि विस्तरभिया न प्रस्तूयते ॥ ८ ॥ पराजयनिमित्त वाक्य निग्रहस्थान है वह २२ प्रकारके हैं इनके अवान्तर भेद और लक्षणादि सब न्यायदर्शनादिमें स्पष्ट हैं ॥ ८ ॥ ननु प्रमाणादिपदार्थषोडशके प्रतिपाद्यमाने कथमिदं न्याय- शास्त्रमिति व्यपदिश्यते । सत्यं, तथाप्यसाधारण्येन व्यपदेशा भवन्तीति न्यायेन न्यायस्य परार्थानुमानापरपर्यायस्य सक- लविद्यानुग्राहकतया सर्वकर्मानुष्ठानसाधनतया प्रधानत्वेन तथा व्यपदेशो युज्यते ॥ तथाभाणि सर्वज्ञेन, सोऽयं परमो न्याय विप्रतिपन्नपुरुषप्रतिपादकत्वात् तथा प्रवृत्तिहेतुत्वा- च्चेति ॥ पक्षिलस्वामिना च "सेयमान्वीक्षिकी विद्या प्रमाणा- दिभि पदार्थै प्रविभज्यमाना-"प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्म्माणां विद्योद्देशे परी- क्षिते ॥ " इति ॥ ९ ॥ शंका-इस शास्त्रमे प्रमाणादि षोडश पदार्थका प्रतिपादन है तो इसको न्यायशास्त्र क्यों कहा जाता है? उत्तर-यद्यपि पदार्थ प्रतिपादक हे तथापि प्रधान व्यपदेश न्यायसे परार्थानुमानके अपरपर्यायन्याय सकलशास्त्रके उपकार ओर सर्वकर्मानुष्ठानका साधक होनेके कारण न्यायशास्त्र व्यवहार होता है। सूत्रकारनेभी कहा हे विप्रतिपन्न पुरुषकी विप्रतिपत्तिके निराकरण साधन ओर प्रवृत्तिहेतु होनेसे न्यायही प्रधान हे । पक्षिलस्वा- मीनेभी कहा है कि प्रमाणादि पदार्थोंसे विभक्त इस विद्याको आन्वीक्षकी विद्या कहते हैं। संपूर्ण विद्याके प्रकाशकप्रदीप समस्त कर्मका उपाय, ओर समस्त धर्मका आश्रय

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