सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २०५ ) विद्याके उद्देशमे विमृष्ट हे प्रत्यक्ष प्रमाणसे ईक्षित होनेपर आन्वीक्षकी कही जाती है ॥ ९ ॥ ननु तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसं भवतीत्युक्तं तत्र किं तत्त्वज्ञाना- दनन्तरमेव निःश्रेयसं सम्पद्यते नेत्युच्यते किन्तु तत्त्वज्ञाना- द्दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भाव इति ॥ तत्र मिथ्याज्ञानं नामानात्मनि देहादावात्मबुद्धिः तदनुकूलेषु रागः तत्प्रतिकूलेषु द्वेषः वस्तुतस्त्वात्मनः प्रति- कूलमनुकूलं वा न किञ्चित्समस्ति । परस्परानुबन्धत्वाच्च रागादीनां मूढो रज्यति रक्तो मुह्यति मूढ कुप्यति कुपितो मुह्यतीति । ततस्तैर्दोषैः प्रेरितः प्राणी प्रतिषिद्धानि शरीरेण हिंसास्तेयादीन्याचरति वाचा अनृतादीनि मनसा परद्रोहादीनि सेयं पापरूपा प्रवृत्तिरधर्ममावहतीति ॥ १० ॥ तत्त्वज्ञानसे मुक्ति होती है इस प्रकार कहा है सो वह क्या तत्त्वज्ञानसे अव्यव- हित उत्तरकालमें ही होती है उत्तर तत्त्वज्ञानके अनन्तर नहीं तत्त्वज्ञानसे दुःख, जन्म प्रवृत्ति, दोष मिथ्याज्ञानके उत्तर उत्तरके नाश द्वारा पूर्व पूर्वके नाश होनेसे होती है । अनात्मभूत देहेन्द्रियादिमें आत्मबुद्धि मिथ्या ज्ञान है तादृश देहानुकूल वस्तुमें राग और प्रतिकूल वस्तुमें द्वेष होता है वस्तुतः आत्माका न कुछभी प्रतिकूल है न अनुकूल है रागमोहादि परस्पर सम्बन्ध होनेसे होते हैं यथा मूढ अनुरक्त होता है अनुरक्त मुग्ध होता है मूढ क्रुद्ध होता है और क्रुद्ध मुग्ध हो जाता है । अतः उक्तदोषोंसे प्रेरित पुरुष शरीरसे निषिद्ध हिंसादि करते हैं वचनसे मिथ्याभाषणादि करते हैं और मनसे परद्रोहादि करते हैं । ऐसी पापरूप प्रवृत्तिसे अधर्म उत्पन्न होता है ॥ १० ॥ शरीरेण प्रशस्तानि दानपरपरित्राणादीनि वाचा हितसत्या- दीनि मनसा अहिंसादीनि सेयं पुण्यरूप प्रवृत्तिर्धर्मः ॥ सेय- त्तिः तत स्वानुरूपं प्रशस्तं निन्दितं वा जन्म पुनः शरीरादेः प्रादुर्भावः । तस्मिन् सति प्रतिकूलवेदनीय- तया वासनात्मक दुःखं भवति । त इमे मिथ्याज्ञानादयो