भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( २०६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ अक्षपाद- दुःखान्ता अविच्छेदेन प्रवर्त्तमानाः । संसारशब्दार्थो घटीच- क्रवन्निरवधिरनुवर्त्तते ॥ ११ ॥ शरीरसे उत्तम दान ओर प्राणियोकी रक्षा प्रभृति कर्म होते हैं, वचनसे सत्य ओर प्रिय भाषण और मनसे अहिंसादि होते हैं यह सब पुण्यरूप प्रवृत्तिके धर्म हे । यह पुण्य पापरूप दो प्रकारकी प्रवृत्ति हे उनसे पुण्य ओर पापरूप कर्मानुसार प्रशस्त अथवा निन्दित जन्म प्राप्त होते हैं । पश्चात् शरीरेन्द्रियादिका प्रादुर्भाव होता हे शरीर सम्बन्ध- वश प्रतिकूलवेदनीय दुःख होता हे एवम्भूत मिथ्याज्ञानादि दुःखान्त निरन्तर प्रवर्त्तमान होता हुआ ससार घटीय-न्त्रकी समान घूमता रहता हे ॥ ११ ॥ यदा कश्चित् पुरुषधौरेयः पुराकृतसुकृतपरिपाकवशादाचार्यो- पदेशेन सर्वमिदं दुःखायतनं दुःखानुषक्तं च पश्यति तदा तत्सर्वं हेयत्वेन बुध्यते । ततस्तन्निर्वर्त्तकमविद्यादि निवर्त्त- यितुमिच्छति, तन्निवृत्त्युपायश्च तत्त्वज्ञानमिति ॥ १२ ॥ जब कोई महापुरुष पूर्वकृत पुण्योंके फलसे आचार्यके उपदेशद्वारा ससारको दुःखका आलय और दुःखसे मिलेहुए देखते हैं तब उनको समस्त वस्तुओंमें त्याज्यबुद्धि होती है । अत ससारनिर्वर्त्तक ( प्रापक ) अविद्यादिसे छूटनेकी इच्छा करते हैं अविद्यानिवृत्तिका उपाय तत्त्व ज्ञान है ॥ १२ ॥ कस्यचिच्चतसृभिर्विद्याभिर्विभक्तं प्रमेयं भावयतः सम्यग्दर्शन- पदवेदनीयतया तत्त्वज्ञानं जायते, तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानमपैति मिथ्याज्ञानापाये दोषाः अपयान्ति, दोषापाये प्रवृत्तिरपैति प्रवृत्त्यपाये जन्मापैति, जन्मापाये दुःखमत्यन्तं निवर्त्तते, सात्यन्तिकी निवृत्तिरपवर्गः। निवृत्तेरात्यन्तिकत्वं नाम निवर्त्य सजातीयस्य पुनस्तत्रानुत्पाद इति ॥ तथाच पारमर्षं सूत्रम् ‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भावादपवर्ग' इति ॥ १३ ॥ आन्वीक्षकी आदि चार विद्याओंसे विभक्त प्रमेयकी भावना करनेवाले किसीको सम्यग् दर्शन पर्याय तत्त्वज्ञान होता है तत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति होती है उससे दोषोंका नाश, दोषनाशमे प्रवृत्तिनाश, प्रवृत्तिनाशमे जन्मनाश, जन्मनाशसे