सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २०७ ) दुःखका अत्यन्त उच्छेद होता है। दुःख़ात्यन्तनिवृत्तिहीका नाम अपवर्ग (मोक्ष) है निवर्त्तनीय दुःखके समान दुःखान्तरकी अनुत्पत्तिके नाम आत्यन्तिक निवृत्ति है अर्थात् वासनासहितका उच्छेद हो । सूत्रार्थ पहिलेँ लिख चुका हूं ॥ १३ ॥ ननु दुःखात्यन्तोच्छेदोऽपवर्ग इत्येतदद्यापि कफोणिगुडायितं वर्तते तत्कथं सिद्धवत्कृत्य व्यवह्रियत इति चेन्मैवं सर्वेषां मोक्षवा- दिनामपवर्गदशायामात्यन्तिकी दुःख़निवृत्तिरस्तीत्यस्यार्थस्य सर्वतन्त्रसिद्धान्तसिद्धतया घण्टापथत्वात् । नह्यप्रवृत्तस्य दुःखं प्रत्यापद्यते इति कश्चित् प्रपद्यते । तथा हि आत्मोच्छेदो मोक्ष इति माध्यमिकमते दुः खोच्छेदोऽस्तीत्येतावत्तावदवि- वादम् ॥ १४ ॥ शंका-दुःखका अत्यन्त उच्छेद अपवर्ग है यह आजतक कफोणिगुडायितं अर्थात् हाथकी कलाईको गुड़के मीठा माननेके समान है जो असिद्ध है उसको प्रत्यक्ष सिद्धवत् कैसे व्यवहार करते हो। उत्तर-मोक्षदशामें दुःखकी अत्यन्त निवृत्ति है इसमें सब मोक्षवादियोंके सिद्धान्त समान होनेसे यह निष्कण्टक मार्ग हे प्रवृत्ति- शून्यको दुःखकी प्राप्ति होती है ऐसे कोईभी नहीं मानते हैं यथा आत्मोच्छेदको मोक्ष माननेवाले माध्यमिकोंके मतमे दुःखका उच्छेद निर्विवाद है ॥ १४ ॥ अथ मन्येथा शरीरादिवदात्मापि दुःखहेतुत्वादुच्छेद्य इति तन्न सङ्गच्छते विकल्पानुपपत्तेः ॥ किमात्मा ज्ञानसन्तानो विवक्षित तदरिक्तो वा । प्रथमे न विप्रतिपत्ति । कः खल्व- नुकूलमाचरति प्रतिकूलमाचरेत् । द्वितीये तस्य नित्यत्वे निवृत्तिरशक्यविधानेव । प्रवृत्त्यनुपपत्तिश्चाधिकं दूषणं, न खलु कश्चित् प्रेक्षावानात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति सर्वतः प्रियतमस्यात्मन समुच्छेदाय प्रयतते । सर्वो हि प्राणी मुक्त इति व्यवहरति ॥ १५ ॥ यदि कहो शरीरवत् आत्माभी दुःखके हेतु होनेसे उच्छेद्य है वह असंगत है क्योंकि कल्पनामे विरुद्ध है तथाहि आत्मपदसे क्या ज्ञान सन्तान अभिमत है,