सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( २०९ ) नित्यत्वापत्तौ कृतप्रणाशाकृताभ्यागमौ निष्प्रतिबन्धौ प्रसरे- ताम् ॥ अमूर्त्तत्वे गमनमनुपपन्नमेव चलनात्मिकायाः क्रियाया- मूर्त्तप्रतिबन्धात् ॥ १७ ॥ आवरणभंग मुक्ति है ऐसा जैनियोंका मत हे । यहभी निर्दुष्ट नही। क्योकि आवरण किसको कहते हैं ऐसे किसीके पूछनेपर क्या उत्तर कहोगे ? धर्म्माधर्म्मकी भ्रान्ति कहो तो इष्टापत्ति है। यदि देहहीको आवरण कहकर देहनिवृत्ति होनेपर पिंजरासे छूटे पक्षीके समान सतत ऊर्ध्वगमनही मुक्ति मानो तो कहना होगा ! आत्मा क्या मूर्त्त हे या अमूर्त्त है ? मूर्त्त माना तो निरवयव, किंवा सावयव है ? निरवयव मानो तो निरवयव मूर्त्त परमाणु है परमाणुके धर्मरूपादिका प्रत्यक्ष होता नही तद्वत् आत्माभी परमाणुरूप होनेसे आत्माके धर्मकाभी प्रत्यक्ष न होगा। सावयव माने तो सावयव जनित्य होनेसे आत्माभी अनित्य होगा तो कृतका विनाश अकृतकी प्राप्ति दुर्নিবার हो जायगी अर्थात् दूसरेके किया हुआ कर्मका फल दूसरेको मिलने लगेगा। अमूर्त्त माने तो निरन्तर ऊर्ध्वगमनभी असम्भव होगा गमनक्रिया मूर्त्तद्रव्यहीमें होती है ॥ १७ ॥ पारतन्त्र्यं बन्धः स्वातन्त्र्यं मोक्ष इति चार्वाकपक्षेऽपि स्वात- न्त्र्यं दुःखनिवृत्तिश्चेदविवाद ऐश्वर्य्य चेत्सातिशयतया सहक्ष- तया च प्रेक्षावतां नाभिमतम् ॥ १८ ॥ परतन्त्रताको बन्ध और स्वतन्त्रताको मोक्ष कहनेवाले चार्वाकोंके मतमेंभी स्वात- न्त्र्यको दुःखनिवृत्ति मानो तो आपत्ति नही है यदि ऐश्वर्य्य मानो तो एकसे अधिक ऐश्वर्य्य दूसरेको उनसेभी अधिक और किसीको होंगे इस प्रकार सातिशय होनेसे बुद्धिमानोंके मन्तव्य नही है क्योंकि परायेकी उत्कृष्ट सम्पत्तिको देखकर अल्प- सम्पत्तिमान्को दुःख होता है ॥ १८ ॥ प्रकृतिपुरुषान्यत्वख्यातौ प्रकृत्युपरमे पुरुषस्य स्वरूपेणाव- स्थानं मुक्तिरिति साङ्ख्याख्यातेऽपि पक्षे दुःखोच्छेदोऽभ्युपेयते विवेकज्ञानं पुरुषाश्रयं प्रकृत्याश्रयं वेति एतावदवशिष्यते। तत्र पुरुषाश्रयमिति न श्लिष्यते पुरुषस्य कौटस्थ्यात् स्थाननिरोधा- पातान्नापि प्रकृत्याश्रय अचेतनत्वात्तस्या ॥ किञ्च प्रकृतिः प्रवृत्तिस्वभावा वा निवृत्तिस्वभावा वा । आद्ये अनिर्मोक्षः स्वभावस्यानपायात् । द्वितीये सम्प्रति संसारोऽस्तमियात् ॥१९॥ १४