सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ अक्षपाद- प्रकृति और पुरुषके भेदज्ञान द्वारा प्रवृत्तिके नष्ट होनेपर पुरुषका स्वरूपसे अवस्थानको मुक्ति माननेवाले सांख्योंके मतमें भी दुःखोच्छेद होतेही है केवल विवेक- ज्ञान प्रकृतिमे है या पुरुषमें यह विचार अवशिष्ट है । पुरुपाश्रय नहीं कह सकते क्योंकि पुरुष कूटस्थ और निर्विकार है स्थाननिरोध होनेसे प्रकृत्याश्रयभी नहीं कह सकते क्योकि प्रकृति अचेतन भी है किंवा प्रकृति प्रवृत्तिस्वभाव है किंवा निवृत्ति स्वभाव है प्रथम पक्षम स्वभावका नाश न होनेसे अनिर्मोक्ष होगा द्वितीय पक्षमें सं- सारहीका उच्छेद होगा ॥ १९ ॥ नित्यनिरतिशयसुखाभिव्यक्तिर्मुक्तिरिति भट्टसर्वज्ञाद्याभिमतेपि दुःखनिवृत्तिरभिमतैव । परन्तु नित्यसुखं न प्रमाणपद्ध- तिमध्यास्ते ॥ श्रुतिस्तत्र प्रमाणमिति चेन्न योग्यानुपलब्धि- वाधिते तदनवकाशादवकाशे वा ग्रावप्तावेऽपि तथाभावप्र- सङ्गात् ॥ २० ॥ नित्यनिरतिशयसुखप्राप्तिकी मुक्ति माननेवाले भट्ट ओर सर्वज्ञ मुनिके मतमें भी दुःखनिवृत्ति अवश्य हे परन्तु नित्यसुखप्राप्तिमें प्रमाण नहीं ‘सर्वान् कामानवाप्नोति सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ ‘जानात्येवाय पुरुष’ इत्यादि श्रुतिभी योग्यानुपलब्धि- तर्कसे वाधितहैं । अन्यथा ‘ग्रावाणः प्लवन्ते’ इत्यादि पाषाणतरणकाभी प्रामाण्य होने लगेगा ॥ २० ॥ ननु सुखाभिव्यक्तिर्मुक्तिरिति पक्षं परित्यज्य दुःखनिवृत्तिरेव मुक्तिरिति स्वीकारः क्षीरं विहायारोचकग्रस्तस्य सौवीररुचि- मनुभवतीति चेत्तदेतन्नाटकपक्षपतितं त्वद्वच इत्युपेक्ष्यते । सुखस्य सातिशयत्या प्रत्यक्षतया बहुप्रत्यनीकाक्रान्ततया साधनप्रार्थनापरिक्लिष्टतया च दुःखाविनाभूतत्वेन विषानुषक्त- मधुवत् दुःखपक्षनिक्षेपात् ॥ २१ ॥ सुखाभिव्यक्तिरूप मुक्तिको छोडकर दुःखनिवृत्तिमात्रकी मुक्ति मानना अरुचिग्र- स्तको दूधको छोडकर कांजी या बेरकी रुचि करानेका समान है ऐसा कहना केवल नाटकमात्र हे क्योंकि सुख पक्षमे एक अतिशय युक्त प्रत्यक्ष होता है और अनेक विघ्नोंसे बिगड़ता है ओर साधन चिन्ताओंद्वारा परिक्लिष्ट होनेसे विषसंयुक्त मधुके समान दुःखही है ॥ २१ ॥