सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २१९ ) करता है विवादाध्यासित वेदाध्ययन विधिभी भारतका अध्ययनवत् अर्थावबोधक है इत्यादि अनुमानद्वारा सिद्ध होनेसे प्रथम पक्षको कह नहीं सकते 'व्रीहीनवहन्ति' इत्यादि स्थलमें हननविधि जैसा नियम करता है अवहननसे निष्पन्न तण्डुलद्वारा सम्पादित हविष्यसे उत्पन्न अवान्तर अपूर्वद्वारा दर्शपूर्णमासयागमें परम अपूर्व होता है अन्यथा नहीं इत्यादि अपूर्व अवघातके नियमपरत्वमें कारण है। यहापर लिखित पाठजन्य अर्थज्ञानसे किंवा अध्ययनजन्य अर्थज्ञानसे यज्ञका अनुष्ठान सिद्ध है अतः अध्ययनविधिको नियमपरत्वमें कोई हेतु नहीं है अतः अर्थावबोधक विचारशास्त्र विधिसिद्ध नहीं है। श्रूयमाण अध्ययन विधिकी क्या दशा होगी अक्षरराशिमात्रग्रहण- रूप अध्ययनविधिको स्वर्गसाधक मानकर संतोप करो ॥ ५ ॥ विश्वजिन्यायेनाश्रुतस्यापि कल्पयितुं शक्यत्वात् यथा स स्वर्गः सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वादिति विश्वजित्यश्रुतमप्यधि- कारिण सम्पादयता तद्विशेषणं स्वर्गः फलं युक्त्या निरणायि तद्वदध्ययनेऽप्यस्तु ॥ तदुक्तम्- “विनापि विधिना दृष्टलाभान्न हि तदर्थता । कल्पास्तु विधिसामर्थ्यात् स्वर्गो विश्वजिदा- दिवत् ॥” इति ॥ ६ ॥ यदि कहो स्वर्ग अध्ययनविधिमें उद्देश्यरूपसे श्रुत न होनेके कारण फलरूपसे स्वर्गकी कल्पना नहीं कर सकते हैं सो भी नहीं कह सकते जिस प्रकार 'विश्वजि- ता यजेत' इति विश्वजित्यागमें फल अश्रुत होनेपरभी सबके कामनाविषय होनेसे स्वर्गफलकी कल्पना होती है तिसी प्रकार यहापरभी होगा। अध्ययनविधिके विनाभी अर्थज्ञानरूप फल निगमनिरुक्तादिद्वारा सम्भव होनेसे अध्ययनविधि अर्थज्ञानार्थ नहीं हो सकता एवञ्च विधिके सार्थकताके लिये विश्वजिन्यायवत् स्वर्गादि फलकी कल्पना करनी होगी ॥ ६ ॥ एवञ्च सति वेदमधीत्य स्नायादिति स्मृतिरनुगृहीता भवति । अत्र हि वेदाध्ययनसमावर्त्तनयोरव्यवधानमवगम्यते ॥ तावके मते त्वधीतेऽपि वेदेधर्मविचाराय गुरुकुले वस्तव्यं तथा सत्य- व्यवधान वाध्येत । तस्माद्विचारशास्त्रस्य वैधत्वाभावात् पाठमात्रेण स्वर्गसिद्धे समावर्त्तनशास्त्राच्च धर्मविचारशास्त्रमना- रम्भणीयम् इति पूर्वपक्षसंक्षेपः ॥ ७ ॥