सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय- अतएव वेदाध्ययनानन्तर समावर्तन ( गृहस्थाश्रमग्रहण ) विधिभी उपपन्न होता है यह विधि अध्ययन और समावर्तनका अव्यवहित पूर्वापरकाल निर्णय करती है आपके मतमें वेदाध्ययन करके धर्मविचारके लिये गुरुकुलम निवास करना होगा तब तो अव्यवधान बाधित होगा अतः विचारशास्त्र विधिविषय न होनेसे अक्षर- पाठमात्रसेही स्वर्गसिद्धि होनेके कारण और समावर्तन शास्त्रवलसे धर्मविचार ( मी मासा ) शास्त्र अनारम्भणीय हे ॥ ७ ॥ सिद्धान्तस्त्वन्यत प्राप्तत्वादप्राप्तविधित्वं मास्तु नियमविधि- त्वपक्षस्तु वज्रहस्तेनापि नापहस्तयितु पार्यते ॥ तथाहि स्वा- ध्यायोध्येतव्य इति तव्यप्रत्यय प्रेरणापर्यायां पुरुषप्रवृत्तिरू- पार्थभावनाभाव्यामभिधाभावनां प्रत्याययति । सा ह्यर्थभा- वनासहितमनुबद्धं भाव्यमाकाङ्क्षति न तावत्समानपदोपात्त- मध्ययनभाव्यं परिरभते ॥ अध्ययनशब्दार्थस्य स्वाधीनोच्चा- रणक्षमत्वस्य वाङ्मनसव्यापारस्य क्लेशार्थकस्य भाव्यत्वासम्भ- वात् । नापि समानवाक्योपात्त स्वाध्याय स्वाध्यायशब्दा- र्थस्य वर्णराशेर्नित्यत्वेन विभुत्वेन चोत्पत्त्यादीनां चतुर्णां क्रियाफलानामसम्भवात् । तस्मात्सामर्थ्यप्राप्तोऽर्थावबोधो भा- व्यत्वेनावतिष्ठते ॥ ८ ॥ (सिद्धान्त इति ) प्रकारान्तरद्वारा प्राप्त होनेसे अप्राप्तविधि न हो परन्तु नियमविधि- पक्षको वज्रपाणिभी नहीं हटा सकते हैं ( तथाहि इति ) शाब्दी और आर्थी भेदसे दो प्रकारकी भावना होती हे लिङ् लेट् लोट् तव्यप्रत्ययादिवाच्यभावना शाब्दी कही जाती है शब्दभावना निष्पाद्य पुरुषनिष्ठ प्रवृत्तिरूप भावना आर्थी हे प्रत्येक भावनामें साध्यसाधन इतिकर्तव्यतारूप अंशत्रय रहते हैं । एवञ्च अध्येतव्यमें तव्यप्रत्यय प्रेरणापर्याय पुरुषप्रवृत्तिरूप अर्थ भावना भाव्य शब्दभावनाको बोध करता है वही भावना अर्थभावनासहित भाव्यकी अपेक्षा करती है उसमें एकपदोपात्त अध्ययन भाव्य नहीं हो सकता क्योंकि अध्ययनशब्दार्थ स्वाधीनोच्चारणक्षम क्लेशजनक वाङ्मनोव्यापार है अत उसका भाव्यत्व असम्भव है समान वाक्योपात्त स्वाध्यायभी भाव्य नहीं हो सकता । क्योंकि स्वाध्यायशब्दवाच्य अक्षरराशिको नित्य मानो तो उसमें उत्पत्ति वृद्धि अपक्षय और नाशरूप चतुर्विध क्रियाफल असम्भव है अत सामर्थ्यप्राप्त अर्थावबोध भाव्यतयासम्वन्ध हो सकता है ॥ ८ ॥