भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 316 में से

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पृष्ठ 207

( २०० ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ अक्षपाद- अथाक्षपाददर्शनम् ॥ ११ ॥ तत्त्वज्ञानाहु खात्यन्तोच्छेदलक्षणं निःश्रेयसं भवतीति समान- तन्त्रेऽपि प्रतिपादितम् तदाह सूत्रकारः 'प्रमाणप्रमेयेत्यादितत्त्व- ज्ञानान्निःश्रेयसाधिगम' इति। इदं न्यायशास्त्रस्यादिमं सूत्रं न्या- यशास्त्रञ्च पञ्चाध्यायात्मकम्, तत्र प्रत्यध्यायस्याह्निकद्वयम् । तत्र प्रथमाध्यायस्य प्रथमाह्निके भगवता गौतमेन प्रमाणादि- पदार्थनवकलक्षणनिरूपणं विधाय द्वितीये वादादिसप्तपदार्थ- लक्षणनिरूपणं कृतम् । द्वितीयस्य प्रथमे संशयपरीक्षणं प्रमाण- चतुष्टयाप्रामाण्यशङ्कानिराकरणञ्च, द्वितीये अर्थापत्त्यादेरन्त- र्भावनिरूपणम् । तृतीयस्य प्रथमे आत्मशरीरेन्द्रियार्थपरीक्षणं द्वितीये बुद्धिमनःपरीक्षणम् । चतुर्थस्य प्रथमे प्रवृत्तिदोषप्रेत्य- भावफलदुःखापवर्गपरीक्षणम्, द्वितीये दोषनिमित्तत्वानि- रूपणम् अवयव्यादिनिरूपणञ्च । पञ्चमस्य प्रथमे जातिभेदं- निरूपणम् द्वितीये निग्रहस्थानभेदनिरूपणम् ॥ १ ॥ तत्त्वज्ञानसे दुःखकी अत्यन्तनिवृत्तिरूप निःश्रेयस होता है यह समानतन्त्र ( नै यायिकसिद्धान्तमें ) भी प्रतिपादित है। सूत्रकारनेभी प्रमाणादि तत्त्वज्ञानसे निःश्रेयस- की प्राप्ति कही है यह न्यायशास्त्रका प्रथम सूत्र है । न्यायशास्त्र पञ्च अध्यायात्मक है प्रत्येकाध्यायोंमें दो दो आह्निक हैं । प्रथमाध्यायके प्रथमाह्निकमें प्रमाणादि नौ पदार्थोंका लक्षण निरूपण करके द्वितीयाह्निकमें वादादि सात पदार्थोंका लक्षणका निरूपण किया द्वितीयाध्यायका प्रथमाह्निकमें संशयपरीक्षा और प्रमाणचतुष्टयका अप्रामाण्यकी शंकाका निराकरण है । द्वितीयमें अर्थापत्त्यादिप्रमाणान्तरका उक्त प्रमाणमें अन्तर्भाव वर्णन है । तृतीध्यायके प्रथमाह्निकमें आत्मा इन्द्रिय और शरीरका विचार है द्वितीय आह्निकमें बुद्धि और मनका विचार चतुर्थके प्रथमाह्निकमें प्रवृत्तिदोष पुनर्जन्म फल, दुःख और अपवर्गका परीक्षण है । च०द्वि० दोषके निमित्त निरूपण और अवयवीकी निरूपण है । पञ्चमके प्र० जातिभेदनिरूपण है । प०द्वि० आ० निग्रहस्थानका निरूपण है ॥ १ ॥

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