सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( २२३ ) इसी अधिकरणको प्रभाकरके मतसे योजना करते हैं अष्टवर्षके ब्राह्मणको उप- नयन करके उसको अध्यापन करावे इस श्रुतिमें अध्यापनविधिका विषय प्रतीत होता है नियोग नियोज्य सापेक्ष है ( कार्यको स्वकीयत्वेन जाननेवाला नियोज्य होता है ) क्योंकि कहा है ' नियोज्यः स तु कार्य य' स्कीयत्वेन बुध्यते " नियो- ज्य कौन होगा ऐसा विचार उपस्थित होनेपर जो आचार्य कामनावान् है वही नियोज्य हैं ( सम्माननोत्सञ्जनाचार्यकरणज्ञानभृतिविगणनव्ययेषु नियः ) इस सूत्रसे आचार्य करण अर्थमें नी धातुसे आत्मनेपदप्रत्ययका विधान होता है उप- नयनमें जो नियोज्य हो वही अध्यापनमेंभी नियोज्य होगा क्योंकि दोनों एकक- र्तृक हैं ॥ १३ ॥ अत एवोक्तं मनुना मुनिना-"उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्या- पयेद्द्विजः । सांगं च सरहस्यं च तमाचार्य्यं प्रचक्षते ॥” इति ॥ १४ ॥ अतएव मनुजीने कहा है जो ब्राह्मण शिष्यको उपनयन कराकर सांग सरहस्य वेदाध्ययन कराता है वही आचार्य है ॥ १४ ॥ ततश्चाचार्यकर्तृकमध्यापनं माणवककर्तृकेणाध्ययनेन विना न सिद्ध्यतीत्यध्यापनविधिप्रयुक्त्यैवाध्ययनानुष्ठानं सेत्स्यति प्रयोज्यकव्यापारमन्तरेण प्रयोजकव्यापारस्यानिर्वाहात् ॥ तर्ह्यध्येतव्य इत्यस्य विधित्वं न सिध्यतीति चेन्मासैत्सीत् का नो हानि पृथगध्ययनविधेरभ्युपगमे प्रयोजनाभावाद्धिधि- त्वस्य नित्यानुवादत्वेनाप्युपपत्ते । तस्मादध्ययनविधिमुप- जीव्य पूर्वमुपन्यस्तौ पूर्वोत्तरपक्षौ प्रकारान्तरेण प्रदर्शनीयौ विचारशास्त्रमवैधत्वेनानारब्धव्यमिति पूर्वपक्ष । वैधत्वेनार- ब्धव्यमिति राद्धान्तः ॥ १५ ॥ अतः आचार्यकर्तृक अध्यापन वालककर्तृक अध्ययनके बिना असम्भव होनेसे अध्यापनविधिसे अर्थापत्या अध्ययनभी सिद्ध होगा प्रेर्यव्यापारके बिना प्रेरकव्या- पार अनुपपन्न होता है । यदि कहो उक्त क्रम माने तो अध्ययनको विधित्व सिद्ध न होगा न सिद्ध हो हानि क्या है अध्ययनका पृथक् विधानमें प्रयोजन न होनेसे अनुवाद माननेसेभी अध्ययनविधि उपपन्न होती है अतः अध्ययन विधिको लेकर पूर्वोक्त पूर्वोत्तर पक्षको प्रकारान्तरसे योजना करना चाहिये अवैध होनेसे विचारशास्त्र