भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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[Header] ( २२४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय- अनारम्भणीय है ऐसा पूर्वपक्ष है सिद्धान्त वेद्य है अतः अध्ययनविधिका आरम्भ करना चाहिये ॥ १५ ॥ तत्र वैधत्वं वदता वदितव्यं किमध्यापनविधिर्माणवकस्यार्था- वबोधमपि प्रयुङ्क्ते किं वा पाठमात्रम् । नाद्य विनाप्यर्था- वबोधेनाध्यापनासिद्धे । न द्वितीय पाठमात्रे विचारस्य विप- यप्रयोजनयोरसम्भवादापाततः प्रतिभातः सन्दिग्धोऽर्थो विचारशास्त्रविषयो भवति । तथा सति यत्रार्थावगतिरेव नास्ति तत्र सन्देहस्य का कथा विचारफलस्य निर्णयस्य प्रत्याशा दूरत एव ॥ तथा च यदसन्दिग्धं प्रयोजनं तत्प्रेक्षावत्प्रतिपि- त्सागोचरं यथा समनस्केन्द्रियसन्निकृष्ट स्पष्टालोकमध्यम- ध्यासीनो घट इति न्यायेन विषयप्रयोजनयोरसम्भवेन विचार- शास्त्रमनारभ्यमिति पूर्व-पक्षः ॥ १६ ॥ अध्ययनके विधित्ववादीको कहना होगा क्या अध्यापनविधि बालकको अर्थबो- धभा करता है या पाठमात्र ? अर्थबोधके विनाभी अध्यापन सम्भव होनेसे प्रथमपक्ष नहीं कह सकते । पाठमात्रपक्षमें विचारका विषय और प्रयोजन असम्भव है यथाक- थंचित् प्रतीत और संदिग्धअर्थ विचारका विषय होता है जहा अर्थज्ञानही नहीं तहा सन्देहकी बातही क्या है विचारका फल निर्णय तो दूर रहे तथाहि जो असन्दिग्ध प्रयोजन हो वही प्रेक्षावान्‌की प्रतिपत्तिका विषय होता है यथा ' मनोयुक्त इन्द्रिय सन्निकृष्ट विकसितप्रकाशवृत्त्तिघट इस न्यायसे विषय और प्रयोजनके न होनेसे विचारशास्त्र अनारम्भणीय है यह पूर्वपक्ष है ॥ १६ ॥ अध्यापनविधिनाथावबोधो मा प्रयोजि तथापि सांगवेदाध्या- यिनो गृहीतपदपदार्थसंगतिकस्य पुरुषस्य पौरुषयेष्विव प्रब- न्धेषु आम्नायेऽप्यर्थावबोधः प्राप्नोत्येव ॥ ननु यथा विषं भुङ्क्षे- त्यत्र प्रतीयमानोऽप्यर्थो न विवक्ष्यते मास्य गृहे भुङ्क्था इति भोजनप्रतिषेधस्य मातृवाक्यविषयत्वात् तथाऽाम्नायार्थस्यावि- वक्षायां विषयाद्यभावदोषः प्राचीन प्रादु ष्यादिति चेन्मैव वोचः दृष्टान्तदार्षान्तिकयोर्वेषम्यसम्भवात् । विषभोजन-

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