सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ें-(२२६) सर्वदर्शनसंग्रहः। [जैमिनी- यो धर्मशीलो जितमानरोष इत्यादिषु मुक्तकोक्तिषु व्यभिचा- रात् । न द्वितीयः सर्वस्मरणस्य असर्वज्ञदुर्ज्ञानत्वात् पौरुषे- यत्वे प्रमाणसम्भवाच्च वेदवाक्यानि पौरुषेयाणि वाक्यत्वात् कालिदासादिवाक्यवत् । वेदवाक्यान्याप्तप्रणीतानि प्रमाणत्वे सति वाक्यत्वात् मन्वादिवाक्यवदिति ॥ १८ ॥ अपौरुषेयसाधक प्रमाण न होनेसे वेद अपौरुषेय कैसे होंगे ? यदि कहो अवि- च्छिन्न सम्प्रदाय होनेपरभी कर्त्ताका स्मरण नहीं होता है अतः वेद अपौरुषेय हैं इत्यादि अनुमानप्रमाण होगा यहभी अकिञ्चित्कर हे क्योंकि सम्प्रदायाविच्छिन्नरूप विशेपणश असिद्ध है पौरुषेय वादियोंने प्रलयकालमें सम्प्रदायाविच्छेद माने हैं किञ्च क्या अप्रतीयमानकर्तृक अस्मर्य्यमाणकर्तृक है अथवा स्मरणविषयकर्तृक है ? ईश्वरको कर्त्ता माननेवालोके मतमें प्रथमपक्ष अयुक्त है द्वितीय पक्षमेंभी क्या एकके स्मरणका अविषय कहते हो अथवा सबके स्मरणका अविषय कहते हो प्रथम मुक्तोक्तिमें व्यभिचरित हे सर्वस्मरणविषयत्व सर्वज्ञके विना दुर्ज्ञेय होनेसे सर्वस्मर णत्वाभाव होगा वह सर्वस्मरणत्व है प्रत्युत पौरुषेयत्वमें प्रमाण होगा. कालिदासवा क्यवत् वेदवाक्य पौरुषेय हे इत्यादि वेदवाक्य आप्तप्रणीत हे सप्रमाणकवाक्य होनेसे इत्यादि विपरीतानुमानभी विद्यमान है ॥ १८ ॥ ननु-“वेदास्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययन- सामान्यादधुनाध्ययनं यथा ॥ ” इत्यनुमानं प्रति साधनं प्रग- ल्भत इति चेत्तदपि न प्रमाणकोटि प्रवेष्टुमीष्टे । “भारताध्य- यनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । भारताध्ययनत्वेन साम्प्रताध्ययनं यथा ॥ ” इति ॥ १९ ॥ वेदका अध्ययन गुरुके अध्ययनपूर्वक होता है क्योंकि दोनोके अध्ययनमें विशेष न होनेसे जिस प्रकार आजकलके अध्ययन इत्यादि अनुमानभी अभीष्टसाधक नहीं हो सकता क्योंकि भारताध्ययनमेंभी ऐसाही अनुमान कह सक्ते हैं ॥ १९ ॥ आभाससमानयोगक्षेमत्वात् । ननु तत्र व्यासः कर्त्तेति स्मर्य्यते। ‘को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत्’ इत्यादाविति