भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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-दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २२७ ) चेदत्तदसारम् । 'ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत' इति पुरुषसूक्ते वेदस्य सकर्तृक- तात्प्रतिपादनात् । किञ्चानित्यः शब्दः सामान्यवत्त्वे सति अस्मदादिवाह्येन्द्रियग्राह्यत्वाद्धटवत् ॥ नन्विदमनुमानं स एवाय गकार इति प्रत्यभिज्ञाप्रमाणप्रतिहतमिति चेत् तदति- फल्गु लूनपुनर्जातकेशदलितकुन्दादाविव प्रत्यभिज्ञायाः सामा- न्याविषयत्वेन बाधकत्वाभावात् ॥ २० ॥ पुण्डरीकाक्षके सिवाय महाभारतको बनानेवाला कौन होगा इत्यादि वचनोंसे भारतादिके कर्ताको उपलब्धक हो तो ऋक्, यजु, साम और छन्द सब परमात्मा- से उत्पन्न है इत्यादि पुरुषसूक्तप्रमाणसे वेदकाभी कर्ता प्रतीत है और भी शब्द अनित्य है जातिमान् होकर अस्मदादिके बाह्येन्द्रियग्राह्य होनेसे..घटके समान इत्या- दि अनुमानभी है । यदि कहो यह वही गकार है इत्यादि प्रत्यभिज्ञासे उक्तअनुमान बाधित है ऐसा कहना बडी स्थूल बात है मुण्डनके अनन्तर नवीन ॰उत्पन्न केशर नूतन पुष्पोंमे जिस प्रकार प्रत्यभिज्ञा होती है तिसी प्रकार सोऽयं गकारः यहापरभी प्रत्यभिज्ञा जातिनिमित्तक हो सकती है ॥ २० ॥ नन्वशरीरस्य परमेश्वरस्य ताल्वादिस्थानाभावेन वर्णोच्चारणा- सम्भवात् कथं तत्प्रणीतत्वं वेदस्य स्यादिति चेन्न तद्भद्रं स्वभावतोऽशरीरस्यापि तस्य भक्तानुग्रहार्थंलीलाविग्रहग्रहण- सम्भवात् ॥ तस्माद्वेदस्यापौरुषेयत्ववाचो युक्तिर्न युक्तेति चेत् ॥ २१ ॥ अशरीरि परमेश्वरके ताल्वादि न होनेसे वर्णोच्चारण असम्भव है जब वेद ईश्वर कर्तृक कैसे होंगे यहभी अविचार मूलक है ईश्वरके वास्तवमें शरीर न होने- परभी भक्तानुग्रहार्थ लीलाविग्रह सम्भव है अत वेदोंके अपौरुषेयत्वकथन असंगत है ॥ २१ ॥ तत्र समाधानमभिधीयते । किमिदं पौरुषेयत्वं सिसाधयि- षितं पुरुषादुत्पन्नत्वमात्रं, यथा अस्मदादिभिरहरहरुच्चार्यमा- णस्य वेदस्य प्रमाणान्तरेणार्थमुपलभ्य तत्प्रकाशनाय रचि-