भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( २२८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय- तत्वं वा, यथा अस्मदादिभिरेव निवध्यमानस्य प्रबन्धस्य प्रथमे न विप्रतिपत्तिः, चरमे किमनुमानवलात् तत्साधनमा- गमबलाद्वा । नाद्यः मालतीमाधवादियाक्येषु सव्यभिचार- त्वात् ॥ अथ प्रमाणत्वे सतीति विशिष्यत इति चेत्तदपि न विपश्चितो मनसि वैशद्यमापद्यते । प्रमाणान्तरागोचरार्थप्रति- पादकं हि वाक्यं वेदवाक्यं, तत्प्रमाणान्तरगोचरार्थप्रतिपादक- मिति साध्यमाने मम माता वन्ध्येतिवत् व्याघातापातात् ॥२२ ॥ इसका उत्तर कहते हैं साध्य पौरुषेयत्व क्या अस्मदादिक प्रतिदिन उच्चार्यमाण वेदके समान पुरुषसे उत्पन्नत्वमात्र विवक्षित है, अथवा प्रमाणान्तरसे प्राप्त अर्थको प्रकाशनके लिये रचितत्व विवक्षित है ? यथा अस्मदादिकाके कृतग्रन्थ । प्रथमपक्षमें विरोध नहीं है । द्वितीयपक्षको अनुमानबलसे कहते हो, या शास्त्रबलसे ? मालतीमाध- वादिवाक्यमें हेतुव्यभिचारित होनेसे अनुमान नहीं कह सकते यदि प्रमाणत्वविशेषण जोड दे तोभी विद्वानोंके मनको प्रफुल्लित करने योग्य नहीं हो सकता क्योंकि प्रमाणान्तरार्थप्रतिपादक वेदवाक्यको प्रमाणान्तरप्रतिपादक मानना अपनी माताको वन्ध्या कहनेके समान बाधित है ॥ २२ ॥ किञ्च परमेश्वरस्य लीलावियहपरिग्राहभ्युपगमेऽप्यतीन्द्रियार्थ- दर्शनं न सञ्जाघटीति देशकालस्वभावविप्रकृष्टार्थहरणोपाया- भावात् ॥ न च तच्चक्षुरादिकमेव तादृक्प्रतीतिजननक्षममिति मन्तव्यं दृष्टानुसारेणैव कल्पनाया आश्रयणीयत्वात् ॥ तदुक्तं गुरुभिः सर्वज्ञनिराकरणवेलायाम् "यत्राप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्थानतिलङ्घनात् । दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृत्तिता" ॥ इति ॥ २३ ॥ परमेश्वरकी लीलावियहको स्वीकार करनेपरभी सूक्ष्मव्यवहितादि अतीन्द्रियार्थ ग्रहणमें उपाय न होनेसे तादृश ज्ञान असम्भव है । यदि कहा परमेश्वरके चक्षुरादि इन्द्रियेंही तादृश अर्थ मनसा ग्रहण करते हैं । यहभी नहीं कहसक्ते दृष्टानुसारी कल्पना होनी है विपरीत नहीं अतएव सर्वज्ञनिराकरणप्रकरणम प्रभाकरगुरुने कहा है