सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २२९ )
कि रहीभी अतिशय हो वह स्वविषयको अनुलंघन करके होगा यथा चक्षुरादि दूर और सूक्ष्मादि रूपग्रहणमें समर्थ होता है किन्तु रूपग्रहणमें श्रोत्र समर्थ नहीं होगा ॥ २३ ॥ अत एव नागमबलात्तत्साधनं तेन प्रोक्तमिति पाणिन्यनुशा- सने जाग्रत्यपि काठककालापतैत्तिरीयामित्यादिसमाख्या अध्य- यनसम्प्रदायप्रवर्त्तकविषयत्वेनोपपद्यते तद्वदत्रापि सम्प्रदायप्रव- र्त्तकविषयत्वेनाप्युपपद्यते न चानुमानबलाच्छब्दस्यानित्यत्व- सिद्धिः प्रत्यभिज्ञाविरोधात् ॥ न चासत्यप्येकत्वे सामान्यनि- बन्धनं तदिति साम्प्रतं सामान्यनिबन्धनत्वमस्य बलवद्बाध- कोपनिपातादास्थीयते । कचिद्व्यभिचारदर्शनाद्वा तत्र क्वचिद् व्यभिचारदर्शने तदुत्प्रेक्षायामुक्तं स्वतः प्रामाण्यवादिभिः । “उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादज्ञातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा विनश्यति ॥” इति ॥ २४ ॥ आगमबलसेभी पौरुषेयत्व सिद्ध नहीं होगा। यदि कहो शब्दसाधुत्वबोधक व्याकरण है व्याकरणमें पाणिनिऋषिने काठक तैत्तिरीय आदि शब्दोंके साधुत्वके लिये तेन प्रोक्तम् तित्तिरिंवरतन्तु इत्यादि अनुशासन किया है इसमे कृतकप्रतीत होते हैं अत' पाणिनिसूत्रके रहते रहते वेदको पौरुषेय नहीं मान सकते क्योंकि काठक, कालाप, तैत्तिरीयादि शब्द तत्तत् शाखाध्ययन सम्प्रदायप्रवर्त्तक परत्वसे उपपन्न होते हैं । अनुमानबलसे शब्दानित्यत्वसिद्धिभी न होगी क्योंकि प्रत्यभिज्ञाविरोध होता है । प्रत्यभिज्ञाको सामान्यपरत्व नहीं मान सकते सामान्यनिबन्धन प्रत्यभिज्ञा नहीं माना जाता है जहाँ व्यक्तिमें प्रबलबाधक हो कही कहीं व्यक्तिमें व्यभिचार देखनेसे जातिनिमित्त प्रत्यभिज्ञा होती है व्यभिचारदर्शन न होनेपरभी सामान्योत्प्रेक्षा मानने- वालोंके प्रति स्वतः प्रामाण्यवादियोंने इस प्रकार कहा है—बाधज्ञान न होनेपरभी जो अज्ञानसे बाधककी उत्प्रेक्षा करता है वह समस्त व्यवहारोंमें सन्दिग्ध होनेसे विनष्ट होता है ॥ २४ ॥ नन्विदं प्रत्यभिज्ञानं गत्वादिजातिविषयं न गादिव्यक्तिविषयं तासां प्रतिपुरुषं भेदोपलम्भादन्यथा सोमशर्माधीते इति