भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 316 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 246

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ((२३९) कर्त्तरि कर्मणि च षष्ठीविभक्तिर्भवतीति कृद्योगलक्षणा षष्ठी भविष्यति । तथा चेध्मप्रव्रश्चनपलाशशातनादिवत् समासो भविष्यति अथवा शेषलक्षणेयं षष्ठी तत्र किमपि चोद्यं नावतरत्येव ॥ ३ ॥ शंका-पञ्च्च कर्मषष्ठ्यन्तके साथ समासनिषेध होनेसे शब्दानुशासनपदही अप्रामाणिक होगा । उत्तर-जिस कृत्प्रत्ययके परत। कर्त्ता और कर्म दोनोंमें षष्ठी प्राप्त हो वहा कर्महीमें षष्ठी होती है । कर्तामें नहीं होती है ऐसा नियम बहुव्रीहि समासबलसे होता है । आश्चर्य इत्यादि उदाहरण है. कोई २ अविशेषरूपसे कर्त्ता और कर्ममें षष्ठीका विकल्प विधान करते हैं ऐसा काशिकावृत्तिमें लिखा है । शङ्गानामनुशासनमित्यादि उदाहरणभी दिया है ‘ उभयप्राप्तौ कर्मणि ’ यह निषेध कर्त्ता ओर कर्म दोनों जहा प्रयुक्त हों वहा लगता है शब्दानुशासन यहापर शब्द- हीका अनुशासन है अर्थका नही है ऐसा नियम करनेमे तदृशार्थका कर्त्ता आचार्य प्रसिद्ध होनेके कारण आचार्यरूप कर्त्ताका उपादान नहीं है । तथा च ‘ उभयप्राप्तौ’ इसकी प्रवृत्ति न होनेसे 'कर्तृकर्मणोः कृति ' इस सूत्रसे षष्ठी होती है इसमें कृद्योगलक्षण षष्ठीसमासभी होता है यथा इध्मप्रव्रश्चन इत्यादि उदाहरण है यदि शेषषष्ठी करें तो कोई शंकाही नहीं है ॥ ३ ॥ यद्येवं तर्हि शेषलक्षणायाः षष्ठ्याः सर्वत्र सुवचत्वात् षष्ठीस- मासप्रतिषेधसूत्राणामानर्थक्यं प्राप्नुयादिति चेत्-सत्यम्, तेषां स्वरचिन्तायामुपयोगो वाक्यपदीये प्रादर्शि ॥ तदाह महोपा- ध्यायवर्द्धमानः-“लौकिकव्यवहारेषु यथेष्टं चेष्टतां जनः । वैदिकेषु तु मार्गेषु विशेषोक्ति प्रवर्त्तताम् ॥ इति पाणिनि- सूत्राणामर्थमत्राभ्यधाद्यतः । जनिकर्त्तुरिति ब्रूते तत्प्रयो- जक इत्यपि ॥” इति । तथाच शब्दानुशासनापरनामधेयं व्याकरणशास्त्रमारब्धं वेदितव्यमिति वाक्यार्थः सम्पद्यते ॥४॥ यदि कहो शेष लक्षणषष्ठीसे सर्वत्र निर्वाह हो जायगा तो षष्ठीसमासनिषेधक सूत्र सब व्यर्थ हो जायगा सोभी नहीं कह सकते स्वरविशेषासिद्धिके लिये उसका उपयोग है यथा शेषषष्ठीमें “ समासस्य ” करके अन्तोदात्त होता है अन्यत्र कृदुत्तरपद प्रकृतिस्वर होता है यथा वर्द्धमानाचार्यने कहा है कि लौकिकव्यवहारमें लोग