सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( २४१ ) मा प्रसांक्षीदिति तदीयवेदांगत्वप्रतिपादकं प्रयोजनमन्वा- ख्येयमेव ॥ ६ ॥ पूर्वकालमें ब्राह्मणोंको संस्कारके अनन्तर व्याकरणाध्ययनमे स्वरवर्णस्थान ज्ञान होनेसे उनको वैदिक शब्दोंका उपदेश होता था आजकल ऐसा नहीं होता वेद पढकर शीघ्र वक्ता हो जाते हैं और कहदेते हैं कि वैदिकशब्द सब वेदसे जान लिये एव लोकव्यवहारसे लौकिक शब्दभी जान लिये इसलिये अत' व्याकरणका अध्य- यन व्यर्थ है ऐसी विपरीत बुद्धिवाले व्याकरणाध्ययनप्रवृत्तिको छोड देंगे सो न हो इसलिये व्याकरणको वेदाङ्गत्वप्रतिपादक प्रयोजन अवश्य कहना होगा ॥ ६ ॥ यद्यन्वाख्यातेऽपि प्रयोजने न प्रवर्त्तेरन् तर्हि लौकिकशब्दसं- स्कारज्ञानरहितास्ते यज्ञे कर्मणि प्रत्यवायभाजो भवेयुः । धर्माद्धीयेरन् अतएव याज्ञिकाः पठन्ति-'आहिता- ग्रिरपशब्द प्रयुज्य प्रायश्चित्तीयां सारस्वतीमिष्टिं निर्व- पेत्' इति । अतस्तदीयवेदांगत्वप्रतिपादकप्रयोजनान्वाख्या- नार्थमथशब्दानुशासनमित्येव कथ्यते नाथ व्याकरणमिति ॥ ७ ॥ प्रयोजन कहनेपरभी न प्रवृत्त होंगे तो लौकिक शब्द सस्कार ज्ञानरहित होनेसे वे यज्ञकर्ममें प्रायश्चित्तभागी होंगे और धर्मसे च्युतभी होगे क्योकि याज्ञिक लोग कहते हैं कि आहिताग्नि पुरुष अपशब्दका प्रयोग करे तो प्रायश्चित्तार्थ सारस्वतयाग करें अतः वेदाङ्गत्वप्रतिपादनाय यथोक्त पाठही युक्त है ॥ ७ ॥ भवति च व्याकरणशास्त्रस्य प्रयोजनं ( तस्य तदुद्दे- शेन प्रवृत्तेः प्रयोजनम् ) यथा स्वर्गोद्देशेन प्रवृत्तस्य यागस्य स्वर्गः प्रयोजनम्, तस्मात् शब्दानुशिष्टि संस्कारपदवेदनीया शब्दानुशासनस्य प्रयोजनम् ॥ ८ ॥ व्याकरणका शब्दानुशासन प्रयोजन हो सकता है क्योंकि उसी उद्देशसे प्रवृत्ति है जिस उद्देशसे प्रवृत्ति हों वही उसका फल होता है यथा स्वर्गोद्देशसे प्रवृत्त यागका स्वर्ग प्रयोजन है ॥ ८ ॥ नन्वेवमप्यभिमतं प्रयोजनं न लभ्यते तदुपायोभावात् । अथ प्रतिपदपाठ एवाभ्युपाय इति मन्येथा तर्हि स १६