सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४२ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पाणिनि- ह्यनभ्युपायः शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठो भवेत् । शब्दापशब्दभेदेनानन्त्याच्छब्दानाम्, एवं हि समाम्नायते 'बृह- स्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदपाठविहितानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम ॥ बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रोऽध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकाल । न च पारावा- प्तिरभूत् । किमुताद्य यश्चिरं जीवति सोऽब्दशतम्' ॥ ९ ॥ अथापि शब्दसंस्काररूप अभिमत प्रयोजनभी निरुपाय होनेसे असम्भव है क्यों कि प्रतिपदपाठ अर्थात् जितने संसारमें शब्द हों उन सबको एक एक करके पाठ करना यहभी उपाय नहीं है शब्द और अपशब्द कितने हैं इसकी संख्याही नहीं है अतएव कहते हैं बृहस्पति जैसे वक्ताने इन्द्र जैसे विद्यार्थीको देवताओंके वर्षसे हजार वर्षतक प्रतिपदपाठका पारायण कराया तथापि अन्त न हुआ तब आजकलके अल्पायुओंको क्या कहना जो बहुत जीते हैं तो १०० वर्ष जीते हैं ॥ ९ ॥ अधीतिबोधाचरणप्रचारैश्चतुर्भिरुपायैर्विद्याप्रयुक्ता भवति । तत्राध्ययनकालेनैव सर्वमायुरुपयुक्तं स्यात्तस्मादनभ्युपायः शब्दान् प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठ इति प्रयोजनं न सिध्येदिति ॥ इति चेन्मैवं शब्दप्रतिपत्तेः प्रतिपदपाठसाध्यत्वानंगीकारात् । प्रकृत्यादिविभागकल्पनावत्सु लक्ष्येषु सामान्यविशेषरूपाणां लक्षणानां पर्जन्यवत्सकृदेव प्रवृत्तौ बहूनां शब्दानामनुशासनो- पलम्भाच्च ॥ १० ॥ अध्ययन चिन्तन अध्यापन ओर प्रचार आदि चार उपायोसे विद्या उपयुक्त होती है उसमें ( अध्ययनमेंही ) सम्पूर्ण आयु बीत जाती है अत शब्दप्रतिपत्तिके लिये प्रतिपदपाठ उपाय नहीं हो सकता एवञ्च प्रयोजन अनुपपन्न है ऐसे मत कहो क्योंकि शब्दप्रतिपत्तिके लिये प्रतिपदपाठ उपाय मानतेही नहीं हैं किन्तु कल्पितप्रकृतिप्रत्ययविभागवत् लक्ष्यमें सामान्यविशेषरूप लक्षण मेघवत् एकही कालमें प्रवृत्त होनेसे अनेक शब्दोंका अनुशासन हो सकता है ॥ १० ॥ तथाहि कर्मणीत्येकेन सामान्यरूपेण लक्षणेन कर्मोपपदाद्धातु- मात्रादण्प्रत्यये कृते कुम्भकार• काण्डलाव इत्यादीनां बहूनां