भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( २४५ )

ज्ञानपूर्वकानुष्ठानसे फलप्रद ( रोरवीति ) शब्द करता है शब्दपदसे प्रपञ्च विवक्षित है महादेवका अर्थ शब्दहै मनुष्योंमें प्रवेश किया महादेव परब्रह्मके साथ साम्य होनेके लिये अथवा जगत्का कारण स्फोटाख्य नित्यशब्द ब्रह्म है ॥ १४ ॥ हरिणाभाणि ब्रह्मकाण्डे-“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यद- क्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥” इति ॥ १५॥ अनादिनिधन अक्षराख्य शब्दतत्त्व ब्रह्म घटादि अर्थाकार विवर्त होता है जिससे जगत्प्रक्रिया निष्पन्न होती है । तत्त्वतो अन्यथाभाव न होना विवर्त हे यथा रज्जुमें सर्प ॥ १५ ॥ ननु नामाख्यातभेदेन पदद्वैविध्यप्रतीते कथं चातुर्विध्यमुक्त- मिति चेन्नैव प्रकारान्तरस्य प्रसिद्धत्वात् । तदुक्तं प्रकीर्णके । “द्विधा कैश्चित् पदं भिन्नं चतुर्द्धा पञ्चधापि वा । अपोद्धृत्यैव वाक्येभ्य प्रकृतिप्रत्ययादिवत् ॥ ” इति ॥ १६ ॥ नामका अर्थ प्रातिपदिक है उपसर्गनिपातभी प्रातिपदिक होनेसे यद्यपि नामा- ख्यात दो पद है तथापि प्रकारान्तरसे चातुर्विध्य प्रसिद्ध है । वाक्यसे पृथक् करके प्रकृति प्रत्ययविभागके समान पदभी किसी २ ने दो प्रकार किसी २ ने चार प्रकार और किसी २ ने पाँच प्रकार पद माने हैं ॥ १६ ॥ कर्मप्रवचनीयेन वै पञ्चमेन सह पदस्य पञ्चविधत्वमिति हेला- राजो व्याख्यातवान् कर्मप्रवचनीयास्तु क्रियाविशेषोपजनित- सम्बन्धावच्छेदहेतव इति सम्बन्धविशेषद्योतनद्वारेण क्रियावि- शेषद्योतनादुपसर्गेष्वेवान्तर्भवतीत्यभिसन्धाय पदचातुर्विध्यं भाष्यकारेणोक्तं युक्तमिति विवेक्तव्यम् ॥ १७ ॥ कर्मप्रवचनीयसंज्ञा मिलाकर पञ्चमत्व हेलाराजने कहा है कर्मप्रवचनीय क्रिया- विशेषसम्बन्धद्योतक होनेसे परंपरया क्रियाविशेष द्योतन होगया अत उपसर्गहीमें अन्तर्भूत होनेके कारण भाष्यकारने चार प्रकार कहा है ॥ १७ ॥ ननु भवता स्फोटात्मा नित्य. शब्द इति निजागद्यत तन्न मृष्यामहे तत्र प्रमाणाभावादिति केचित् ॥ अत्रोच्यते, प्रत्य- क्षमेवात्र प्रमाणम्, गौरित्येकं पदमिति नानावर्णातिरिक्तकपदा-