भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ५४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- ग्रहण होनेपर समस्त संसार उसका रूप होनेसे समस्त संसारका ज्ञान होनेलगेगा यह विषय प्रमेयकमलमार्तण्डादिमें विस्तृत रूपसे निरूपित होनेसे यहां संक्षेप करके छोड देता हू ॥ ९ ॥ तस्मात् पुरुषार्थाभिलाषुकैः पुरुषैः सौगती गतिर्मानुगन्तव्या अपित्वार्हंत्येवार्हणीया । अर्हत्स्वरूपञ्च चन्द्रसूरिभिराप्तनिश्च- यालङ्कारे निरटङ्कि—“सर्वज्ञो जितरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः। यथास्थितार्थवादी च देवोऽर्हन् परमेश्वरः ”॥ इति । ननु न कश्चित् पुरुषविशेष सर्वज्ञपदवेदनीय प्रमाणपद्धतिम- ध्यास्ते सद्भावग्राहकस्य प्रमाणपञ्चकस्य तत्रानुपलम्भात् । तथा चोक्तं तौतातितैः । “सर्वज्ञो दृश्यते तावन्नेदानीमस्मदादिभिः । दृष्टो न चैकदेशोऽस्ति लिङ्गं वा योऽनुमापयेत् ॥ १० ॥ अर्हन्‌के स्वरूपका वर्णन सर्वज्ञ इत्यादि समस्त वस्तुको साक्षात्कार करनेमें समर्थ रागद्वेषादि शून्य सम्पूर्ण संसारमें पूजित, यथार्थ वक्ता, परमेश्वर जो देव है वही अर्हन् हे ( ननु इति ) सर्वज्ञ इत्यादि जो विशेषण दिया सो असंगत है क्योंकि प्रत्यक्षादि पांच प्रमाणोंमेंसे एक भी प्रमाण तादृश पुरुषविशेषके प्रतिपादक न होनेके कारण सर्वज्ञपदवाच्य पुरुषका मानना प्रमाण विरुद्ध है । ( तोतातीतै ) बौद्धधर्मप्रचारक प्रमाणभावका उपपादन करते हैं तत्र पूर्वार्धसे अस्मदादिके दृष्टि- गोचर न होनेसे प्रत्यक्षप्रमाणोद्भव कहा ( दृष्टो नचेकेति ) उत्तरार्धसे अनुमान- गम्यका भी अभाव कहा पूर्ववत् शेषवत् सामान्य तो दृष्टभेदसे अनुमानके तीन भेद सांख्योंने माने यथा है समुद्रजलकी एक बूंद पानकरके अवशिष्टको क्षारजल्त्वका अनुमान करते हैं यह शेषवत् अनुमान है मेघगर्जना सुनकर वृष्टिका अनुमान होता हे यह पूर्ववत् हे धूमध्वजका एकदेशधूमाको देखकर जो अग्निका अनुमान है वह समान्यतो दृष्ट है सर्वज्ञ विषयम ऐसा कोई दृष्टलिङ्ग नहीं है जिससे अनु- मान होसके ॥ १० ॥ न चागमस्त्विति कश्चिन्नित्यसर्वज्ञबोधक_ । न च तत्रार्थवादाना तात्पर्य्यमपि कल्पते॥न चान्यार्थप्रधानेस्तैस्तदस्तित्वं विधीयते । न चानुवदितुं शक्यं पूर्वमन्यैरबोधित ॥ अनादेरागमस्यार्थो न च सर्वज्ञ आदिमान् । कृत्रिमेण त्वसत्येन स कथं प्रतिपाद्यते ॥