भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

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( ५६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- चाहिये यह भी नही उपदशके सत्यत्वमें कोई प्रमाण नहीं हे अत केवल व्योमोहही से उपदेश किया है ॥ १२ ॥ धायि सद्भावग्राहकस्य प्रमाणपञ्चकस्य तत्रानुपसन्नादिति तद्- युक्तं तत्सद्भावादेकस्यानादे सद्भावात् । तथाहि, कश्चिदात्मा सकलपदार्थसाक्षात्कारी तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रति- बन्धप्रत्ययत्वाद् यद्यद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिबन्ध- प्रत्ययं तत्तत्साक्षात्कारी । यथा अपगततिमिरादिप्रतिबन्धं लोच- नविज्ञानं रूपसाक्षात्कारी । तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्र- तिबन्धप्रत्ययश्च कश्चिदात्मा । तस्मात् सकलपदार्थसाक्षात्का- रीत्ति न तावदशेषार्थग्रहणस्वभावत्वमात्मनोऽसिद्धं चोदनाबाला त्रिसिलार्थज्ञानात् ॥ १३ ॥ सर्वज्ञ सद्भाव समर्थक उत्तर ( अत्र प्रतिविधीयत इत्यादि ) क्षुद्रोपद्रवा विद्राव्या- इत्यन्त । प्रत्यक्षादि प्रमाण पञ्चकमेंसे एक भी सर्वज्ञ सद्भाव प्रयोजक नहीं है यह कहना अयुक्त है क्योंकि अनुमान ओर आगम दोनों सर्वज्ञमें प्रमाण हो सकते हैं प्रथम अनुमान दिखाते हैं ( तथा हीत्यादि ) कश्चिदात्मा ( कोई जीव ) यह पक्ष है सकल पदार्थ साक्षात्कारी ( समस्तवस्तुओंको जाननेवाले ) यह साध्य है । तद्ग- ह्णेत्यादि प्रतिबन्धप्रत्ययत्वात् यह हेतु है । समस्त वस्तु ग्रहण स्वभाव होते हुए प्रतिबन्धक सकल दुरित क्षीण होनेसे, जो जिस वस्तुका साक्षात्कार करनेमें समर्थ होकर प्रतिबन्धकज्ञानशून्य हो तब वह उसको प्रत्यक्ष करते हैं जिस प्रकार तिमिर अन्धकारादि प्रतिबन्धक न रहनेपर नेत्र रूपको प्रत्यक्ष करता है यह दृष्टान्त है एवम्भूत कोई आत्मा है यह उपनय है अतः सकलपदार्थको प्रत्यक्ष करनेवाले ( सर्वज्ञ ) हैं यह निगमन है । हेतुमें तद्ग्रहणस्वभावत्वरूप विशेषणासिद्धिकी आशङ्का करके परिहार करते हैं । ( न तावदित्यादि चोदनेति ) चोदनाविधि तथा च विविधास्रसे आत्माको अशेषार्थ ग्रहणस्वभावत्व सिद्ध है ॥ १३ ॥ नान्यथानुपपत्त्या सर्वमनेकान्तात्मक, सत्त्वादिति व्याप्तिज्ञा- नोत्पत्तेश्च । चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मं व्यवहितं १ बुद्धादयो ह्यवेदाज्ञा स्तेषां वेदायसम्भवात् । उपदेश कृतोऽन्येभ्यो मोहादेव केवलम् ॥