भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । (५७)

विप्रकृष्टमित्येवंजातीयकमर्थमवगमयतीत्येवंजातीयकैरध्वरमी- मांसागुरुभिर्विधिप्रतिषेधविचारणानिबन्धनं सकलार्थविषय- ज्ञानं प्रतिपद्यमानैः सकलार्थग्रहणस्वभावकत्वमात्मनोऽ- भ्युपगतम्। न चाखिलार्थप्रतिबन्धकावरणप्रक्षयानुपपत्तिः स- म्यग्दर्शनादित्रयलक्षणस्यावरणप्रक्षयहेतुभूतस्य सामग्रीविशे- षस्य प्रतीतत्वात् अनया मुद्रयापि क्षुद्रोपद्रवा विद्राव्याः ॥१४॥ यथा 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि विधिवाक्योंसे भूत भविष्यत् वर्तमान, एव सूक्ष्म, व्यवहित, दूर, निकटादि वस्तुज्ञान पूर्वमीमांसकोंने माना हे तैसे आर्हंत सिद्धान्तमें भी विधिप्रतिषेधात्मक आगमबलसे अतीतानागत सूक्ष्म व्यवहितादि निखिलार्थ ग्रहण सम्भव होगा किञ्च अर्हन्मुनिने स्याद्वाद ( अनेकान्तपक्ष ) अर्थात् अनि- श्चित पक्ष माना हे उसमें व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा होती हे अतः व्याप्तिज्ञान वस्तुप्र- त्यक्षके बिना अनुपपन्न है इससे भी सर्वज्ञ सिद्ध हो सकता है । विशेष्यासिद्धि- माशक्य परिहार ( नचाखिलार्थेत्यादि ) समस्तवस्तुसाक्षात्काका प्रतिबन्धक जो दुरित है उसका विनाश अनुपपन्न है यह नहीं कहसकते क्योंकि सम्यकदर्शन ज्ञानचारित्रादिसे प्रतिबन्धक आवरणविनाश सम्भव है ॥ १४ ॥ नन्वावरणप्रक्षयवशादशेषविषयं विज्ञानं विशदं मुख्यप्रत्यक्षं प्रभवतीत्युक्तम्। तदयुक्तम्, तस्य सर्वज्ञस्यानादिमुक्तत्वेनावर- णस्यैवासम्भवादिति चेत्तन्न, अनादिमुक्तत्वस्यैवासिद्धेन सर्वज्ञोऽनादिमुक्त मुक्तत्वादितरमुक्तवत् बद्धापेक्षया च मुक्त- व्यपदेश• तद्रहिते चास्याप्यभावः स्यादाकाशवत् ॥ १५ ॥ ( नन्विति ) आवरणक्षय होनेपर निखिलविषयक स्फुटावभासरूप प्रत्यक्ष होता है, यह कहना अयुक्त है कारण सर्वज्ञ जब अनादि और मुक्त है तब आवरण ही अस- म्भव है । निराकरण ( नेति ) अनादित्व और मुक्तत्व दोनों परस्पर बाधित हैं जैसे घटध्वंस अनादि नहीं होता किन्तु घट फूटनेपर होता हे तैसे ही मोक्ष भी बन्धनि- वृत्ति है न की सामान्यतः बन्धाभावमात्र अत. यदि मुक्त है तो अनादि नहीं हो सकता इसमे अनुमान भी दिखाते हैं सर्वज्ञ यह पक्ष है अनादि मुक्त नहीं यह साध्य है मुक्त होनेसे यह हेतु है अन्यमुक्तवत् दृष्टान्त है । उक्तार्थका उपपादनभी करते हैं बद्धके अपेक्षा मुक्त होता है यदि बद्ध न होता तो आकाशादिवत् कभी भी मुक्त नहीं हो सकता ॥ १५ ॥