भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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( ५८ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ आर्हत- नन्वनादे क्षित्यादिकार्यपरम्परायाः कर्तृत्वेन तत्सिद्धिः । तथाहि क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्य्यत्वाद् घटवदिति, तदप्यस- मीचीनं कार्य्यत्वस्यैवासिद्धे । न च सावयवत्वेन तत्साधनमि- त्यभिधातव्यं यस्मादिदं विकल्पजालमवतरति ॥ १६ ॥ नैयायिकादिकाके अभिमत नित्य सर्वज्ञ ईश्वर साधक अनुमानको पूर्व पक्ष करके दूषित करते हैं (नन्वनादेरित्यादि) यह नियम है कि जो जो कार्य है वह सब सकर्तृक होते हैं तथाच पृथिव्यादि सभी घटादिवत् कार्य होनेसे सकर्तृक होगा. कर्ता वही होसकता है जो स्वकार्यके उपयुक्त उपादान सम्प्रदानादि निखिलवस्तु- ओके साक्षात्कारमें समर्थ हों अतः पृथिव्यादि समस्त कार्यके तादृश कर्ता सर्वज्ञ ही होसक्ते हैं उक्तानुमानको प्रयोजक हेतुको स्वरूपासिद्धि दोषसे दूषित करते हैं (तदप्यसमीचीनमिति) कार्यत्व ही असिद्ध है हेतुको स्वरूपासिद्धत्व परिहारके लिये अनुमानान्तरसे कार्यत्वसाधन शंका करते हैं (नचेति) जहां जहां सावयवत्व है वहा वहा कार्यत्व रहता है ऐसी व्याप्ति है तथा च पृथिव्यादिक पक्ष है, कार्यत्व साध्य है सावयवत्व हेतु है, घटवत् दृष्टान्त है इसको भी स्वरूपासिद्धिसे दूषित करते हैं (यस्मादित्यादि) ॥ १६ ॥ सावयवत्वे किमवयवसंयोगित्वम्, अवयवसमवायित्वम्, अव- यवजन्यत्वम्, समवेतद्रव्यत्वम्, सावयवबुद्धिविषयत्वं वा । न प्रथम आकाशादावनैकान्त्यात् । न द्वितीय सामान्यादौ व्यभिचारात्। न तृतीय साध्याविशिष्टत्वात् । न चतुर्थः विक- ल्पयुगलार्गल्यहगलत्वात्। समवायसम्बन्धमात्रवद्द्रव्यत्वं समवे- तद्रव्यत्वम् अन्यत्र समवेतद्रव्यत्वं वा विवक्षितं हेतु क्रियते । आद्ये गगनादौ व्यभिचार , तस्यापि गुणादिसमवायत्वद्रव्य- त्वयो संभवात् । द्वितीये साध्याविशिष्टता अन्यशब्दाथेषु सम- वायकारणभूतेष्ववयवेषु समवायस्य साधनीयत्वात् । अभ्युपग- म्येतदभाणि वस्तुतस्तु समवाय एव न समस्ति प्रमाणाभावात्। नापि पञ्चमः आत्मादिनानैकान्त्यात् तस्य सावयवबुद्धिविषय-