भारतकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ५९ ) त्वेऽपि कार्य्यत्वाभावात् । न च निरवयवत्वेऽप्यस्य सावयवार्थ सम्बन्धेन, सावयवत्वबुद्धिविषयत्वमौपचारिकमित्यप्यन्य निरव- यवत्वे व्यापत्वाविरोधात् परमाणुवत् ॥ १७ ॥ विकल्पोंको दिखाते हैं ( सावयवत्वेति ) सावयवत्वंसं आपको क्या विवक्षित है अवयवोंका जिसमें संयोग हो वह विवक्षित है १ या अवयवका जिसमें समवाय हो वह विवक्षित है २ अथवा अवयवसे उत्पन्नत्व विवक्षित है ३ किंवा समवेत द्रव्यत्व विवक्षित है ४ यद्वा सावयवबुद्धि विषयत्व विवक्षित है ५ ? एक- एकको क्रमशः दूषित करते हैं ( न प्रथमेत्यादि ) आकाशको जितने अवयव हैं वह सब आकाशहीमे संयुक्त है परन्तु नैयायिकोंके मतमें आकाशमें कार्यत्व न होनेसे सावयवत्वरूप हेतु साध्याभावमें वर्तमान होनेके कारण अनैकान्त्य अर्थात् व्यभि- चारी होगया आकाशमें सावयवत्व नहीं है ऐसा तो नहीं कहसकते क्योंकि यदि सावयव नहीं होता तो परमाणुवत् व्यापक भी नहीं होसकता अथवा घटाकाशका जिस प्रकार संयोग है उस प्रकार घटावयव कपालादिकेसाथ भी संयोग होनेसे अव- यवसंयोगित्वरूप सावयवत्व आकाशमें गया कार्यत्व नहीं गया ( नाद्वितीयेोति ) पूर्ववत् घटत्वद्रव्यत्वादि सामान्य जिस प्रकार घटमें समवेत हैं तिस प्रकार घटावय- वमें भी समवेत है क्योंकि घटत्वादिक घटादिके सब अवयवोंमें व्याप्त है अत. अव- यवसमवायित्व सामान्यादिमें गया किन्तु कार्यत्व नहीं गया अतः यहभीसामान्यमें व्यभिचारी होगया ( न तृतीयेोति ) साध्यसे अविशिष्ट है । तात्पर्य-अवयव समुदाय ही घटादि कार्य है वस्त्वन्तर नहीं ऐसे कहनेवालोके मतमे कार्यत्ववत् अवयवजन्य- त्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्योपेक्षा कुछ भी विशेष नहीं हुआ । ( नचतुर्थोति ) विकल्पद्वयसे निरुत्तरित है तथाहि समवेत द्रव्यत्वसे क्या समवाय- सम्बन्धवान् होकर द्रव्यत्ववान् हो यही विवक्षित है, या अन्यत्र समवेत होकर द्रव्यत्ववान् हो यह विवक्षित है । प्रथम पक्ष आकाशमें व्यभिचारित है क्योकि आकाशमे भी गुणादिका समवायत्व और द्रव्यत्व दोनों हैं। यदि अन्यत्र समवेत- त्वादि द्वितीय पक्ष कहो सो भी ठीक नही कारण पटसे अन्यत्वेन अभिमत पटावयव-, तन्तुमें समवेत ( समवायसम्बन्धसे विद्यमान ) होनेके कारण पटादिको अन्यत्र समवेतत्व कहोगे परन्तु पटके कारणीभूत पटावयवत्वसे विवक्षित तन्तु पटसे अन्य है इसमें प्रमाण न होनेके कारण यह भी अनुमानान्तरसे साधन करना होगा, अतः कार्यत्ववत् अन्यत्र समवेतत्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्यसे विशेष कुछभी नहीं हुआ अर्थात् हेतुका स्वरूप ही असिद्ध है । " तुष्यतु दुर्जन "