सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ आर्हत- इस न्यायसे अनभिमतको भी मानकर इतना प्रपञ्च बढाया वस्तुत समवायसत्तामें कोई प्रमाण ही नही । पञ्चमका खण्डन करते हैं ( आत्मादिनेति ) सावयवबुद्धि- विषयत्व आत्मा सावयव है ऐसा ज्ञानवेद्यत्व आत्मामें है परन्तु कार्यत्व नहीं इस लिये हेतु व्यभिचारी होगा । आत्माके निरवयवत्वका खण्डन करते है ( नचेत्यादि ) आत्मा वस्तुत' निरवयव है तथापि सावयव घटादि अर्थके साथ सम्बन्ध होनेसे सावयवबुद्धिबोध्यत्व आरोपित है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि निरवयवपदार्थ व्यापक नहीं होसकता अन्यथा परमाणु भी व्यापक होनेलगेगा ॥ १७ ॥ किञ्च किमेक कर्त्ता साध्यते कि वा स्वतन्त्र । प्रथमे प्रासा- दादौ व्यभिचार स्थपत्यादीनां बहूनां पुरुषाणां तत्र कर्तृत्वो- पलम्भात् । न द्वितीय लाघवादेनेनैव सकलजगज्जनननोत्प- त्तावितरवैयर्थ्यापातात् ॥ १८ ॥ उक्तानुमानको प्रकारान्तरसे भी दूषित करते हैं ( किञ्चेत्यादि ) क्या कार्यत्व हेतुसे एक कर्ता सिद्ध करते हो १ या स्वतन्त्र कर्ता २ विशाल गृह प्रासादादि कार्य एकसे किया हुआ कहीं दृष्ट नहीं आता किन्तु तक्षकादि अनेक शिल्पियोंसे निर्मित ही दृष्ट हे अत एककर्तृकत्वरूप साध्य गृहादिकमें व्यभिचरित है यदि स्वतन्त्र कर्ता मानो तो घटपटादि समस्त कार्य उसीसे उत्पन्न हो जाते पुन' कुलालादि कर्ताकी आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिये ॥ १८ ॥ तदुक्त वीतरागस्तुतौ-“कर्त्तास्ति नित्यो जगत स चैक स सर्वग सन् स्ववश स सत्य । इमा कुहेवा कुविडम्बना स्यु- स्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम् ॥ " इति ॥ अन्यत्रापि-कर्त्ता न तावदिह कोऽपि यथेच्छया वा दृष्टोऽन्यथा कटकृतामपि तत्प्रसङ्ग । कार्ये किमत्र भवतापि च तक्षकाद्यैराहत्य च त्रिभुवन पुरुष करोति ॥ " इति । तस्मात् प्रागुक्तकारणत्रि- तयमलादावरणक्षये सार्बज्ञ्यं युक्तम् ॥ १९ ॥ इसमें प्राचीन सम्मति भी कहते हैं ( तदुक्तमिति ) समस्त संसारका एक कर्ता है वह व्यापक सत् और स्वतन्त्र है । इत्यादि दुराग्रह और विडम्बना उन्हीं लोगोंकी है जिनके शिक्षक अर्हत न थे ( अन्यत्रापीति ) स्वेच्छासे इस संसारको बनानेवाला कोई नहीं दृष्टि आता है यदि सम्पूर्ण संसारका कर्ता अन्य किसीको मानो तो