सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघटपटादि कार्य भी उन्हीसे होजाता । बढई लोहार कुम्हार तन्तुवाय प्रभृतिसे आपको प्रयोजन ही क्या है यह ईश्वरकारणवादी ऊपर उपालम्भ है। उपसंहार (तस्मादिति ) पूर्वोक्त सम्यक्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यक्चरित्ररूप कारणत्रयसे आवरण ( अविद्या ) निवृत्ति होनेसे सर्वज्ञत्व उपपन्न होता है यह सिद्ध हुआ ॥ १९ ॥ न चास्योपदेष्ट्रन्तराभावात् सम्यग्दर्शनादित्रितयानुपपत्ति- रिति भणनीयम् पूर्वसर्वज्ञप्रणीतागमप्रभवत्वादमुष्या शेषार्थ- ज्ञानस्य । न चान्योन्याश्रयतादिदोष आगमसर्वज्ञपरम्पराया बीजाङ्कुरवदनादित्वाङ्गीकारादित्यलम् ॥ २० ॥ यदि कहो अर्हन्को उपदेष्टा न होनेसे सम्यग्दर्शनादिका सम्भव नहीं सो भी नहीं पूर्वपूर्व सर्वज्ञप्रणीत आगमसे इनको भी सर्वज्ञत्व होसकता है यदि कहो आगमसे सर्वज्ञत्व होगा सर्वज्ञ होनेपर आगमप्रणयन और उसका प्रामाण्य पूर्वकारिकोक्त प्रकार अन्यो- न्याश्रयग्रहग्रस्त है सो भी नहीं जिस प्रकार बीजके बिना अङ्कुर और अङ्कुरके बिना बीज न होसकनेपर भी बीजाङ्कुर दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय नहीं माने जाते हैं तिसी प्रकार सर्वज्ञ और तत्प्रणीत आगमपरम्परा दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय दोष नहीं होता हे ॥ २० ॥ रत्नत्रयपदवेदनीयतया प्रसिद्धं सम्यग्दर्शनादित्रितयमर्हत्प्रवचन- संग्रहपरे परमागमसारे प्ररूपितं ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग 'इति। विवृतञ्च योगदेवेन येन रूपेण जीवाद्यर्थो व्यव- स्थितस्तेन रूपेणार्हता प्रतिपादिते तत्त्वार्थे विपरीताभिनिवेश- रहितत्वाद्यपरपर्यायं श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् । तथा च तत्त्वार्थ- सूत्रं “तत्त्वार्थे श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्” इति ॥ २१ ॥ सम्यग्दर्शनादि त्रितय मोक्षमार्गत्वेनाभिमत रत्नत्रयवाच्यं प्राचीनसम्मति कहते हैं ( परमागमसारे निरूपितमिति-विवृतचेति ) जो वस्तु जिस रूपसे वर्तमान हो उसी प्रकार जिनदेवप्रतिपादित तत्त्वार्थमें विपरीत अभिनिवेश छोडकर श्रद्धा सम्पादन करनेका नाम सम्यग्दर्शन हे सूत्रकारने भी कहा है “तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शनम्” इति । तत्त्वसे निश्चित किया जाय वह तत्त्वार्थ है अथवा तत्त्वरूप अर्थ तत्त्वार्थ हे तच्च “जीवाजीवास्त्रवसंवरवन्धनिर्जरामोक्षास्तत्वम् ” इत्यादि सूत्रोक्त हे । यदि अर्थश्र- द्धा इतनाही कहते तो यावत् घटादि अर्थ श्रद्धाको भी मोक्षमार्गत्वप्रसङ्ग होगा इस के १ ध्वानस्त्यादिदोष । इति वा ।