सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ आर्हत- वारण करनक लिए तत्त्वपद कहा। यदि तत्त्वश्रद्धा इतनाही कहदत तो किसीके मतमे द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादिसत्ता तत्त्व है "पुरुष एवेदम्" इत्यादिवचनोंसे किसी के मतमें एक पुरुषही तत्त्व है अत. व्यभिचारवारणार्थ तत्त्व अर्थ दोनोंका उपादान किया यद्यपि दर्शनका अर्थ चाक्षुषज्ञान है तथापि मोक्षमकरण होनेसे प्रसिद्धार्थ छोडकर श्रद्धारूपी अर्थ लियागया आत्मपरिणामरूप तत्त्वार्थ श्रद्धा मोक्षका साधन होसकता है प्रत्यक्षरूप दर्शन आलोक चक्षुगदि निमित्त होनेसे मोक्षका साधन नहीं होसकता ॥ २१ ॥ अन्यदपि-“रुचिर्जिनोक्ततत्त्वेषु सम्यक् श्रद्धानमुच्यते । जा- यते तन्निसर्गेण गुरोरधिगमेन वा ॥” इति । परोपदेशनिरपेक्षमा- त्मस्वरूपं निसर्गः । व्याख्यानादिरूपपरोपदेशजनितं ज्ञानम- धिगम । येन स्वभावेन जीवाद्य पदार्थाः व्यवस्थिता तेन स्वभावेन मोहसंशयरहितत्वेनावगम सम्यग्ज्ञानम् ॥ यथो- क्तम्- “यथावस्थिततत्त्वानां संक्षेपाद्विस्तरेण वा। योऽवबो- धस्तमत्राहु सम्यग्ज्ञानं मनीषिणः ॥” इति । तज्ज्ञानं पञ्चविध मतिश्रुतावधिमनःपर्य्यायकेवलभेदेन । तदुक्तम्- “मतिश्रुतावधिमन पर्य्यायकेवलानि ज्ञानम् ” इति । अस्यार्थ.-ज्ञानावरणक्षयोपशमे सति इन्द्रियमनसी पुरस्कृत्य व्यापृत सन् यथार्थं मनुते मतिः । ज्ञानावरणक्षयोपशमे सति मतिजनितं स्पष्टं ज्ञानं श्रुतम् । असम्यग्दर्शनादिगणज- नितक्षयोपशमनिमित्तम् अनच्छिन्नविषय ज्ञानमवधि. ॥ २२ ॥ ( अन्यदपीति ) जिनदेवके कहे हुए तत्त्वोंमें सम्यक्प्रीतिको नाम श्रद्धान है वह निसर्गसे अथवा गुरूपदेशसे होता है "तन्निसर्गादधिगमाद्वा” इति दर्शन मोहन क्षय ओग क्षयोपशमादि रहनेपर वाह्योपदेशनिरपेक्ष जो आत्मस्वरूपज्ञान है वह नि- सर्ग है परोपदेशसे ज्ञायमान जीवादिज्ञान अधिगम है । “प्रमाणनयैरधिगम” इति सम्यग्ज्ञानका निरूपण करते हैं ( येनस्वभावेनेति ) मोहमंशयरहित होकर यथावस्थित जीवादिज्ञान सम्यक्ज्ञान है वह भी मति आदिभेदसे पांच प्रकार है ज्ञान शब्दका प्रत्येकम सम्बन्ध है अर्थात् मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान इत्यादि ज्ञानकी आवरण अविद्याका नाश होनेपर इन्द्रिय ओर मनद्वारा वस्तुका यथावस्थित