सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( ६३ ) स्वरूप ज्ञान जिससे हो वह मति है एव ज्ञानावरण क्षय होनेपर मननसे जायमान स्फुटतर ज्ञान श्रुत हे । (असम्यग्दर्शनादीति ) असम्यक्दर्शनादिसे जनित जो क्षय है उसके उपशम होनेपर नियत विषय ज्ञानका नाम अवधि है ॥ २२ ॥ ईर्ष्यान्तरायज्ञानावरणक्षयोपशमे सति परमनोगतस्यार्थस्य स्फुटं परिच्छेदकं ज्ञानं मनःपर्य्याय. । तपःक्रियाविशेषान् यदर्थं सेवन्ते तपस्विनस्तज्ज्ञानासंस्पृष्टं केवलम् । तत्राद्ये परोक्षं प्रत्यक्षमम्यत् । तदुक्तम्- "विज्ञानं स्वपराभासि प्रमाणं बाधवर्जितम् । प्रत्यक्षञ्च परोक्षञ्च द्विधा मेयविनिश्चयात् ॥ " इति । अन्तर्गतिकभेदस्तु सविस्तरस्तत्रैवागमेऽवगन्तव्यः॥२३॥ ( ईर्ष्यान्तरायादि ) ज्ञानका आवरण अविद्या शान्त होनेपर दूसरेके मनके अभि- प्रायका स्पष्ट प्रतिभास होना मनःपर्य्याय हे अर्थात् मन.शब्द लक्षणासे मनोवृत्तिको कहनेवाला है उस मनकी वृत्तिको जो पर्ययण अर्थात् प्राप्त करे वह मन पर्य्याय कहाता है । वाह्याभ्यन्तर क्रियाविशेषको तपस्वी लोग जिस लिये सेवन करते हों वह ज्ञानसे अस्पृष्ट अर्थात् असहाय केवल है । प्रत्यक्ष परोक्ष दो प्रमाण हैं तत्र मति और श्रुत दोनों परोक्ष हैं, अन्य तीन प्रत्यक्ष हैं. इस अभिप्रायसे कहते हैं. ( जाये परोक्षमिति ) भ्रमरहित स्वपरप्रतिभासक विज्ञान प्रमाण हे वह प्रत्यक्ष परोक्षभेदसे दो प्रकार है उपमानार्थापत्त्यादि व्यावृत्तिके लिये कहते हैं मेयविनिश्चयादि उक्त दो ही प्रमाणद्वारा पदार्थ निश्चय होनेसे अधिक कल्पना व्यर्थ हे इसका अवान्तरभेद सर्वार्थसिद्धिग्रन्यमें प्रपञ्चित है ॥ २३ ॥ संसरणकर्मोच्छित्तावुद्यतस्य श्रद्दधानस्य ज्ञानवतः पापगमन- कारणक्रियानिवृत्तिः सम्यक्चारित्रम् । तदेतत् सप्रपञ्चमुक्त- मर्हता ॥ "सर्वथावद्ययोगानां त्यागश्चारित्रमुच्यते । कीर्तितं तदहिंसादिव्रतभेदेन पञ्चधा । अहिंसासूनृतातयब्रह्मचर्याप- रिग्रहा ॥ न यत् प्रमादयोगेन जीवितव्यपरोपणम् । चराणां १ अवायन्ति व्रजन्तीति अवाया पुद्गला तान् दधाति जानाति इति अवधि अवग्धान वा। पुद्गल परिज्ञानसे अथवा द्रव्य क्षेत्र काल भावोंसे जो परिच्छिन्न किया जाय वह अवधि है । यह व्याख्या सर्वार्थसिद्धिस्य है