भारतकोश
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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । (५७)

विप्रकृष्टमित्येवंजातीयकमर्थमवगमयतीत्येवंजातीयकैरध्वरमी- मांसागुरुभिर्विधिप्रतिषेधविचारणानिबन्धनं सकलार्थविषय- ज्ञानं प्रतिपद्यमानैः सकलार्थग्रहणस्वभावकत्वमात्मनोऽ- भ्युपगतम्। न चाखिलार्थप्रतिबन्धकावरणप्रक्षयानुपपत्तिः स- म्यग्दर्शनादित्रयलक्षणस्यावरणप्रक्षयहेतुभूतस्य सामग्रीविशे- षस्य प्रतीतत्वात् अनया मुद्रयापि क्षुद्रोपद्रवा विद्राव्याः ॥१४॥ यथा 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि विधिवाक्योंसे भूत भविष्यत् वर्तमान, एव सूक्ष्म, व्यवहित, दूर, निकटादि वस्तुज्ञान पूर्वमीमांसकोंने माना हे तैसे आर्हंत सिद्धान्तमें भी विधिप्रतिषेधात्मक आगमबलसे अतीतानागत सूक्ष्म व्यवहितादि निखिलार्थ ग्रहण सम्भव होगा किञ्च अर्हन्मुनिने स्याद्वाद ( अनेकान्तपक्ष ) अर्थात् अनि- श्चित पक्ष माना हे उसमें व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा होती हे अतः व्याप्तिज्ञान वस्तुप्र- त्यक्षके बिना अनुपपन्न है इससे भी सर्वज्ञ सिद्ध हो सकता है । विशेष्यासिद्धि- माशक्य परिहार ( नचाखिलार्थेत्यादि ) समस्तवस्तुसाक्षात्काका प्रतिबन्धक जो दुरित है उसका विनाश अनुपपन्न है यह नहीं कहसकते क्योंकि सम्यकदर्शन ज्ञानचारित्रादिसे प्रतिबन्धक आवरणविनाश सम्भव है ॥ १४ ॥ नन्वावरणप्रक्षयवशादशेषविषयं विज्ञानं विशदं मुख्यप्रत्यक्षं प्रभवतीत्युक्तम्। तदयुक्तम्, तस्य सर्वज्ञस्यानादिमुक्तत्वेनावर- णस्यैवासम्भवादिति चेत्तन्न, अनादिमुक्तत्वस्यैवासिद्धेन सर्वज्ञोऽनादिमुक्त मुक्तत्वादितरमुक्तवत् बद्धापेक्षया च मुक्त- व्यपदेश• तद्रहिते चास्याप्यभावः स्यादाकाशवत् ॥ १५ ॥ ( नन्विति ) आवरणक्षय होनेपर निखिलविषयक स्फुटावभासरूप प्रत्यक्ष होता है, यह कहना अयुक्त है कारण सर्वज्ञ जब अनादि और मुक्त है तब आवरण ही अस- म्भव है । निराकरण ( नेति ) अनादित्व और मुक्तत्व दोनों परस्पर बाधित हैं जैसे घटध्वंस अनादि नहीं होता किन्तु घट फूटनेपर होता हे तैसे ही मोक्ष भी बन्धनि- वृत्ति है न की सामान्यतः बन्धाभावमात्र अत. यदि मुक्त है तो अनादि नहीं हो सकता इसमे अनुमान भी दिखाते हैं सर्वज्ञ यह पक्ष है अनादि मुक्त नहीं यह साध्य है मुक्त होनेसे यह हेतु है अन्यमुक्तवत् दृष्टान्त है । उक्तार्थका उपपादनभी करते हैं बद्धके अपेक्षा मुक्त होता है यदि बद्ध न होता तो आकाशादिवत् कभी भी मुक्त नहीं हो सकता ॥ १५ ॥

( ५८ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ आर्हत- नन्वनादे क्षित्यादिकार्यपरम्परायाः कर्तृत्वेन तत्सिद्धिः । तथाहि क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्य्यत्वाद् घटवदिति, तदप्यस- मीचीनं कार्य्यत्वस्यैवासिद्धे । न च सावयवत्वेन तत्साधनमि- त्यभिधातव्यं यस्मादिदं विकल्पजालमवतरति ॥ १६ ॥ नैयायिकादिकाके अभिमत नित्य सर्वज्ञ ईश्वर साधक अनुमानको पूर्व पक्ष करके दूषित करते हैं (नन्वनादेरित्यादि) यह नियम है कि जो जो कार्य है वह सब सकर्तृक होते हैं तथाच पृथिव्यादि सभी घटादिवत् कार्य होनेसे सकर्तृक होगा. कर्ता वही होसकता है जो स्वकार्यके उपयुक्त उपादान सम्प्रदानादि निखिलवस्तु- ओके साक्षात्कारमें समर्थ हों अतः पृथिव्यादि समस्त कार्यके तादृश कर्ता सर्वज्ञ ही होसक्ते हैं उक्तानुमानको प्रयोजक हेतुको स्वरूपासिद्धि दोषसे दूषित करते हैं (तदप्यसमीचीनमिति) कार्यत्व ही असिद्ध है हेतुको स्वरूपासिद्धत्व परिहारके लिये अनुमानान्तरसे कार्यत्वसाधन शंका करते हैं (नचेति) जहां जहां सावयवत्व है वहा वहा कार्यत्व रहता है ऐसी व्याप्ति है तथा च पृथिव्यादिक पक्ष है, कार्यत्व साध्य है सावयवत्व हेतु है, घटवत् दृष्टान्त है इसको भी स्वरूपासिद्धिसे दूषित करते हैं (यस्मादित्यादि) ॥ १६ ॥ सावयवत्वे किमवयवसंयोगित्वम्, अवयवसमवायित्वम्, अव- यवजन्यत्वम्, समवेतद्रव्यत्वम्, सावयवबुद्धिविषयत्वं वा । न प्रथम आकाशादावनैकान्त्यात् । न द्वितीय सामान्यादौ व्यभिचारात्। न तृतीय साध्याविशिष्टत्वात् । न चतुर्थः विक- ल्पयुगलार्गल्यहगलत्वात्। समवायसम्बन्धमात्रवद्द्रव्यत्वं समवे- तद्रव्यत्वम् अन्यत्र समवेतद्रव्यत्वं वा विवक्षितं हेतु क्रियते । आद्ये गगनादौ व्यभिचार , तस्यापि गुणादिसमवायत्वद्रव्य- त्वयो संभवात् । द्वितीये साध्याविशिष्टता अन्यशब्दाथेषु सम- वायकारणभूतेष्ववयवेषु समवायस्य साधनीयत्वात् । अभ्युपग- म्येतदभाणि वस्तुतस्तु समवाय एव न समस्ति प्रमाणाभावात्। नापि पञ्चमः आत्मादिनानैकान्त्यात् तस्य सावयवबुद्धिविषय-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ५९ ) त्वेऽपि कार्य्यत्वाभावात् । न च निरवयवत्वेऽप्यस्य सावयवार्थ सम्बन्धेन, सावयवत्वबुद्धिविषयत्वमौपचारिकमित्यप्यन्य निरव- यवत्वे व्यापत्वाविरोधात् परमाणुवत् ॥ १७ ॥ विकल्पोंको दिखाते हैं ( सावयवत्वेति ) सावयवत्वंसं आपको क्या विवक्षित है अवयवोंका जिसमें संयोग हो वह विवक्षित है १ या अवयवका जिसमें समवाय हो वह विवक्षित है २ अथवा अवयवसे उत्पन्नत्व विवक्षित है ३ किंवा समवेत द्रव्यत्व विवक्षित है ४ यद्वा सावयवबुद्धि विषयत्व विवक्षित है ५ ? एक- एकको क्रमशः दूषित करते हैं ( न प्रथमेत्यादि ) आकाशको जितने अवयव हैं वह सब आकाशहीमे संयुक्त है परन्तु नैयायिकोंके मतमें आकाशमें कार्यत्व न होनेसे सावयवत्वरूप हेतु साध्याभावमें वर्तमान होनेके कारण अनैकान्त्य अर्थात् व्यभि- चारी होगया आकाशमें सावयवत्व नहीं है ऐसा तो नहीं कहसकते क्योंकि यदि सावयव नहीं होता तो परमाणुवत् व्यापक भी नहीं होसकता अथवा घटाकाशका जिस प्रकार संयोग है उस प्रकार घटावयव कपालादिकेसाथ भी संयोग होनेसे अव- यवसंयोगित्वरूप सावयवत्व आकाशमें गया कार्यत्व नहीं गया ( नाद्वितीयेोति ) पूर्ववत् घटत्वद्रव्यत्वादि सामान्य जिस प्रकार घटमें समवेत हैं तिस प्रकार घटावय- वमें भी समवेत है क्योंकि घटत्वादिक घटादिके सब अवयवोंमें व्याप्त है अत. अव- यवसमवायित्व सामान्यादिमें गया किन्तु कार्यत्व नहीं गया अतः यहभीसामान्यमें व्यभिचारी होगया ( न तृतीयेोति ) साध्यसे अविशिष्ट है । तात्पर्य-अवयव समुदाय ही घटादि कार्य है वस्त्वन्तर नहीं ऐसे कहनेवालोके मतमे कार्यत्ववत् अवयवजन्य- त्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्योपेक्षा कुछ भी विशेष नहीं हुआ । ( नचतुर्थोति ) विकल्पद्वयसे निरुत्तरित है तथाहि समवेत द्रव्यत्वसे क्या समवाय- सम्बन्धवान् होकर द्रव्यत्ववान् हो यही विवक्षित है, या अन्यत्र समवेत होकर द्रव्यत्ववान् हो यह विवक्षित है । प्रथम पक्ष आकाशमें व्यभिचारित है क्योकि आकाशमे भी गुणादिका समवायत्व और द्रव्यत्व दोनों हैं। यदि अन्यत्र समवेत- त्वादि द्वितीय पक्ष कहो सो भी ठीक नही कारण पटसे अन्यत्वेन अभिमत पटावयव-, तन्तुमें समवेत ( समवायसम्बन्धसे विद्यमान ) होनेके कारण पटादिको अन्यत्र समवेतत्व कहोगे परन्तु पटके कारणीभूत पटावयवत्वसे विवक्षित तन्तु पटसे अन्य है इसमें प्रमाण न होनेके कारण यह भी अनुमानान्तरसे साधन करना होगा, अतः कार्यत्ववत् अन्यत्र समवेतत्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्यसे विशेष कुछभी नहीं हुआ अर्थात् हेतुका स्वरूप ही असिद्ध है । " तुष्यतु दुर्जन "

( ६० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ आर्हत- इस न्यायसे अनभिमतको भी मानकर इतना प्रपञ्च बढाया वस्तुत समवायसत्तामें कोई प्रमाण ही नही । पञ्चमका खण्डन करते हैं ( आत्मादिनेति ) सावयवबुद्धि- विषयत्व आत्मा सावयव है ऐसा ज्ञानवेद्यत्व आत्मामें है परन्तु कार्यत्व नहीं इस लिये हेतु व्यभिचारी होगा । आत्माके निरवयवत्वका खण्डन करते है ( नचेत्यादि ) आत्मा वस्तुत' निरवयव है तथापि सावयव घटादि अर्थके साथ सम्बन्ध होनेसे सावयवबुद्धिबोध्यत्व आरोपित है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि निरवयवपदार्थ व्यापक नहीं होसकता अन्यथा परमाणु भी व्यापक होनेलगेगा ॥ १७ ॥ किञ्च किमेक कर्त्ता साध्यते कि वा स्वतन्त्र । प्रथमे प्रासा- दादौ व्यभिचार स्थपत्यादीनां बहूनां पुरुषाणां तत्र कर्तृत्वो- पलम्भात् । न द्वितीय लाघवादेनेनैव सकलजगज्जनननोत्प- त्तावितरवैयर्थ्यापातात् ॥ १८ ॥ उक्तानुमानको प्रकारान्तरसे भी दूषित करते हैं ( किञ्चेत्यादि ) क्या कार्यत्व हेतुसे एक कर्ता सिद्ध करते हो १ या स्वतन्त्र कर्ता २ विशाल गृह प्रासादादि कार्य एकसे किया हुआ कहीं दृष्ट नहीं आता किन्तु तक्षकादि अनेक शिल्पियोंसे निर्मित ही दृष्ट हे अत एककर्तृकत्वरूप साध्य गृहादिकमें व्यभिचरित है यदि स्वतन्त्र कर्ता मानो तो घटपटादि समस्त कार्य उसीसे उत्पन्न हो जाते पुन' कुलालादि कर्ताकी आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिये ॥ १८ ॥ तदुक्त वीतरागस्तुतौ-“कर्त्तास्ति नित्यो जगत स चैक स सर्वग सन् स्ववश स सत्य । इमा कुहेवा कुविडम्बना स्यु- स्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम् ॥ " इति ॥ अन्यत्रापि-कर्त्ता न तावदिह कोऽपि यथेच्छया वा दृष्टोऽन्यथा कटकृतामपि तत्प्रसङ्ग । कार्ये किमत्र भवतापि च तक्षकाद्यैराहत्य च त्रिभुवन पुरुष करोति ॥ " इति । तस्मात् प्रागुक्तकारणत्रि- तयमलादावरणक्षये सार्बज्ञ्यं युक्तम् ॥ १९ ॥ इसमें प्राचीन सम्मति भी कहते हैं ( तदुक्तमिति ) समस्त संसारका एक कर्ता है वह व्यापक सत् और स्वतन्त्र है । इत्यादि दुराग्रह और विडम्बना उन्हीं लोगोंकी है जिनके शिक्षक अर्हत न थे ( अन्यत्रापीति ) स्वेच्छासे इस संसारको बनानेवाला कोई नहीं दृष्टि आता है यदि सम्पूर्ण संसारका कर्ता अन्य किसीको मानो तो

घटपटादि कार्य भी उन्हीसे होजाता । बढई लोहार कुम्हार तन्तुवाय प्रभृतिसे आपको प्रयोजन ही क्या है यह ईश्वरकारणवादी ऊपर उपालम्भ है। उपसंहार (तस्मादिति ) पूर्वोक्त सम्यक्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यक्चरित्ररूप कारणत्रयसे आवरण ( अविद्या ) निवृत्ति होनेसे सर्वज्ञत्व उपपन्न होता है यह सिद्ध हुआ ॥ १९ ॥ न चास्योपदेष्ट्रन्तराभावात् सम्यग्दर्शनादित्रितयानुपपत्ति- रिति भणनीयम् पूर्वसर्वज्ञप्रणीतागमप्रभवत्वादमुष्या शेषार्थ- ज्ञानस्य । न चान्योन्याश्रयतादिदोष आगमसर्वज्ञपरम्पराया बीजाङ्कुरवदनादित्वाङ्गीकारादित्यलम् ॥ २० ॥ यदि कहो अर्हन्को उपदेष्टा न होनेसे सम्यग्दर्शनादिका सम्भव नहीं सो भी नहीं पूर्वपूर्व सर्वज्ञप्रणीत आगमसे इनको भी सर्वज्ञत्व होसकता है यदि कहो आगमसे सर्वज्ञत्व होगा सर्वज्ञ होनेपर आगमप्रणयन और उसका प्रामाण्य पूर्वकारिकोक्त प्रकार अन्यो- न्याश्रयग्रहग्रस्त है सो भी नहीं जिस प्रकार बीजके बिना अङ्कुर और अङ्कुरके बिना बीज न होसकनेपर भी बीजाङ्कुर दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय नहीं माने जाते हैं तिसी प्रकार सर्वज्ञ और तत्प्रणीत आगमपरम्परा दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय दोष नहीं होता हे ॥ २० ॥ रत्नत्रयपदवेदनीयतया प्रसिद्धं सम्यग्दर्शनादित्रितयमर्हत्प्रवचन- संग्रहपरे परमागमसारे प्ररूपितं ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग 'इति। विवृतञ्च योगदेवेन येन रूपेण जीवाद्यर्थो व्यव- स्थितस्तेन रूपेणार्हता प्रतिपादिते तत्त्वार्थे विपरीताभिनिवेश- रहितत्वाद्यपरपर्यायं श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् । तथा च तत्त्वार्थ- सूत्रं “तत्त्वार्थे श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्” इति ॥ २१ ॥ सम्यग्दर्शनादि त्रितय मोक्षमार्गत्वेनाभिमत रत्नत्रयवाच्यं प्राचीनसम्मति कहते हैं ( परमागमसारे निरूपितमिति-विवृतचेति ) जो वस्तु जिस रूपसे वर्तमान हो उसी प्रकार जिनदेवप्रतिपादित तत्त्वार्थमें विपरीत अभिनिवेश छोडकर श्रद्धा सम्पादन करनेका नाम सम्यग्दर्शन हे सूत्रकारने भी कहा है “तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शनम्” इति । तत्त्वसे निश्चित किया जाय वह तत्त्वार्थ है अथवा तत्त्वरूप अर्थ तत्त्वार्थ हे तच्च “जीवाजीवास्त्रवसंवरवन्धनिर्जरामोक्षास्तत्वम् ” इत्यादि सूत्रोक्त हे । यदि अर्थश्र- द्धा इतनाही कहते तो यावत् घटादि अर्थ श्रद्धाको भी मोक्षमार्गत्वप्रसङ्ग होगा इस के १ ध्वानस्त्यादिदोष । इति वा ।

( ६२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ आर्हत- वारण करनक लिए तत्त्वपद कहा। यदि तत्त्वश्रद्धा इतनाही कहदत तो किसीके मतमे द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादिसत्ता तत्त्व है "पुरुष एवेदम्" इत्यादिवचनोंसे किसी के मतमें एक पुरुषही तत्त्व है अत. व्यभिचारवारणार्थ तत्त्व अर्थ दोनोंका उपादान किया यद्यपि दर्शनका अर्थ चाक्षुषज्ञान है तथापि मोक्षमकरण होनेसे प्रसिद्धार्थ छोडकर श्रद्धारूपी अर्थ लियागया आत्मपरिणामरूप तत्त्वार्थ श्रद्धा मोक्षका साधन होसकता है प्रत्यक्षरूप दर्शन आलोक चक्षुगदि निमित्त होनेसे मोक्षका साधन नहीं होसकता ॥ २१ ॥ अन्यदपि-“रुचिर्जिनोक्ततत्त्वेषु सम्यक् श्रद्धानमुच्यते । जा- यते तन्निसर्गेण गुरोरधिगमेन वा ॥” इति । परोपदेशनिरपेक्षमा- त्मस्वरूपं निसर्गः । व्याख्यानादिरूपपरोपदेशजनितं ज्ञानम- धिगम । येन स्वभावेन जीवाद्य पदार्थाः व्यवस्थिता तेन स्वभावेन मोहसंशयरहितत्वेनावगम सम्यग्ज्ञानम् ॥ यथो- क्तम्- “यथावस्थिततत्त्वानां संक्षेपाद्विस्तरेण वा। योऽवबो- धस्तमत्राहु सम्यग्ज्ञानं मनीषिणः ॥” इति । तज्ज्ञानं पञ्चविध मतिश्रुतावधिमनःपर्य्यायकेवलभेदेन । तदुक्तम्- “मतिश्रुतावधिमन पर्य्यायकेवलानि ज्ञानम् ” इति । अस्यार्थ.-ज्ञानावरणक्षयोपशमे सति इन्द्रियमनसी पुरस्कृत्य व्यापृत सन् यथार्थं मनुते मतिः । ज्ञानावरणक्षयोपशमे सति मतिजनितं स्पष्टं ज्ञानं श्रुतम् । असम्यग्दर्शनादिगणज- नितक्षयोपशमनिमित्तम् अनच्छिन्नविषय ज्ञानमवधि. ॥ २२ ॥ ( अन्यदपीति ) जिनदेवके कहे हुए तत्त्वोंमें सम्यक्प्रीतिको नाम श्रद्धान है वह निसर्गसे अथवा गुरूपदेशसे होता है "तन्निसर्गादधिगमाद्वा” इति दर्शन मोहन क्षय ओग क्षयोपशमादि रहनेपर वाह्योपदेशनिरपेक्ष जो आत्मस्वरूपज्ञान है वह नि- सर्ग है परोपदेशसे ज्ञायमान जीवादिज्ञान अधिगम है । “प्रमाणनयैरधिगम” इति सम्यग्ज्ञानका निरूपण करते हैं ( येनस्वभावेनेति ) मोहमंशयरहित होकर यथावस्थित जीवादिज्ञान सम्यक्ज्ञान है वह भी मति आदिभेदसे पांच प्रकार है ज्ञान शब्दका प्रत्येकम सम्बन्ध है अर्थात् मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान इत्यादि ज्ञानकी आवरण अविद्याका नाश होनेपर इन्द्रिय ओर मनद्वारा वस्तुका यथावस्थित

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( ६३ ) स्वरूप ज्ञान जिससे हो वह मति है एव ज्ञानावरण क्षय होनेपर मननसे जायमान स्फुटतर ज्ञान श्रुत हे । (असम्यग्दर्शनादीति ) असम्यक्दर्शनादिसे जनित जो क्षय है उसके उपशम होनेपर नियत विषय ज्ञानका नाम अवधि है ॥ २२ ॥ ईर्ष्यान्तरायज्ञानावरणक्षयोपशमे सति परमनोगतस्यार्थस्य स्फुटं परिच्छेदकं ज्ञानं मनःपर्य्याय. । तपःक्रियाविशेषान् यदर्थं सेवन्ते तपस्विनस्तज्ज्ञानासंस्पृष्टं केवलम् । तत्राद्ये परोक्षं प्रत्यक्षमम्यत् । तदुक्तम्- "विज्ञानं स्वपराभासि प्रमाणं बाधवर्जितम् । प्रत्यक्षञ्च परोक्षञ्च द्विधा मेयविनिश्चयात् ॥ " इति । अन्तर्गतिकभेदस्तु सविस्तरस्तत्रैवागमेऽवगन्तव्यः॥२३॥ ( ईर्ष्यान्तरायादि ) ज्ञानका आवरण अविद्या शान्त होनेपर दूसरेके मनके अभि- प्रायका स्पष्ट प्रतिभास होना मनःपर्य्याय हे अर्थात् मन.शब्द लक्षणासे मनोवृत्तिको कहनेवाला है उस मनकी वृत्तिको जो पर्ययण अर्थात् प्राप्त करे वह मन पर्य्याय कहाता है । वाह्याभ्यन्तर क्रियाविशेषको तपस्वी लोग जिस लिये सेवन करते हों वह ज्ञानसे अस्पृष्ट अर्थात् असहाय केवल है । प्रत्यक्ष परोक्ष दो प्रमाण हैं तत्र मति और श्रुत दोनों परोक्ष हैं, अन्य तीन प्रत्यक्ष हैं. इस अभिप्रायसे कहते हैं. ( जाये परोक्षमिति ) भ्रमरहित स्वपरप्रतिभासक विज्ञान प्रमाण हे वह प्रत्यक्ष परोक्षभेदसे दो प्रकार है उपमानार्थापत्त्यादि व्यावृत्तिके लिये कहते हैं मेयविनिश्चयादि उक्त दो ही प्रमाणद्वारा पदार्थ निश्चय होनेसे अधिक कल्पना व्यर्थ हे इसका अवान्तरभेद सर्वार्थसिद्धिग्रन्यमें प्रपञ्चित है ॥ २३ ॥ संसरणकर्मोच्छित्तावुद्यतस्य श्रद्दधानस्य ज्ञानवतः पापगमन- कारणक्रियानिवृत्तिः सम्यक्चारित्रम् । तदेतत् सप्रपञ्चमुक्त- मर्हता ॥ "सर्वथावद्ययोगानां त्यागश्चारित्रमुच्यते । कीर्तितं तदहिंसादिव्रतभेदेन पञ्चधा । अहिंसासूनृतातयब्रह्मचर्याप- रिग्रहा ॥ न यत् प्रमादयोगेन जीवितव्यपरोपणम् । चराणां १ अवायन्ति व्रजन्तीति अवाया पुद्गला तान् दधाति जानाति इति अवधि अवग्धान वा। पुद्गल परिज्ञानसे अथवा द्रव्य क्षेत्र काल भावोंसे जो परिच्छिन्न किया जाय वह अवधि है । यह व्याख्या सर्वार्थसिद्धिस्य है

( ६४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [- आर्हत- स्थावराणां च तदहिंसाव्रतं मतम् ॥ प्रियं पथ्यं वचस्तथ्यं सूनृतं व्रतमुच्यते । तत्तथ्यमपि नो तथ्यमप्रियं चाहितं च यत् ॥ अनादानमदत्तस्यास्तेयव्रतमुदीरितम् । वाह्या प्राणा नृणामर्थो हरता तं हता हि ते ॥ दिव्यौदार्यिककामानां कृतानुमतका- रितै ॥ मनोवाक्कायतस्त्यागो ब्रह्माष्टादशधा मतम् ॥ २४ ॥ संसार हेतु कर्मकी निवृत्ति सम्यक् चारित्र है यह सब अर्हत्ग्रन्थमे प्रपंचित है (सर्वयेत्यादि) निन्दित कर्मका सर्वथा त्याग चारित्र है वह अहिंसादि व्रतभेदसे पाँच प्रकार है. अहिंसा १ अपरिग्रह २ अस्तेय ३ ब्रह्मचर्य ४ सूनृत ५ यह पाँच हैं चर, वा स्थावररूप प्राणियोंको प्रमाद् अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभरूप चतु- र्विध कषायमे जीवित (दश इन्द्रियोंका) वियोग न करना अहिंसाव्रत है । अतएव तत्त्वार्थसूत्र “प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इति ॥ प्रिय, हित, और सत्य- वचन सूनृत व्रत है तथ्य भी हो परन्तु अप्रिय ओर अहित हो तो उसको अस- त्यके समान जानना चाहिये । तथा च मनुः 'सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान ब्रूयात्सत्य- मप्रियम् । प्रियञ्च नानृतं ब्रूयादेष धर्म सनातन ॥” इति । तत्वार्थसूत्र “असदभिधानमनृतम्” इति । जो नहीं दिये हुए वस्तुको ग्रहण करना स्तेय (चोरी) है उससे भिन्न अस्तेय है क्योंकि धन प्राणियोंके बाह्य प्राण है अतः उस प्राणको हरनेसे प्राणी हत होता है । तथा च सूत्रम् 'अदत्तादानं स्तेयम्” इति । दिव्य और औदार्यिक कामको मन कर्म बचनसे त्यागना ब्रह्मचर्य है वह अठारह प्रकार है ॥ २४ ॥ सर्वभावेषु मूर्छायास्त्याग स्यादपरिग्रह । यदसत्स्वपि जायेत मूर्छया चित्तविप्लव ॥ भावनाभिर्भावितानि पञ्चभि पञ्चधा क्रमात् । महाव्रतानि लोकस्य साधयन्त्यव्ययं पदम् ॥” इति। भावनापञ्चकप्रपञ्चनं च प्ररूपितम् - "हास्यलोभभयक्रो- धप्रत्याख्यानैर्निरन्तरम् । आलोच्य भाषणेनापि भावयेत् सूनृतं व्रतम् ॥” इत्यादिना । एतानि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मिलितानि । मोक्षकारणं न प्रत्येकं यथा रसायनसाधनानि सम्भूय रसायनफलं साधयन्ति न प्रत्येकम् ॥ २५ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ६५ ) समस्त वस्तुओंमें मोहविशेषका त्याग अपरिग्रह है । क्योंकि मूर्च्छासे निन्दित वस्तुओंमेंभी मनकी आसक्ति होजाती है । उक्त पाँचों व्रत वक्ष्यमाण पाँच प्रकारकी भावनाओंमे अनुष्ठित होनेपर प्राणियोंका अव्यय पद प्राप्त कराते हैं। पाँच भावनाओंके कहते हैं। हास्य, लोभ, त्याग, भय और क्रोध इनका त्याग तथा सदा विचारपूर्वक भाष- णरूपी पाच भावनाओंसे सूनृत व्रतको सम्पादन करे एवं अन्य चारों व्रतोंमें भी प्रत्येक पाँच पाँच प्रकारकी भावना करे । जिस प्रकार रसायनादि औषधियोंके लिये जितनी सामग्री अपेक्षित हे वह सब मिलकर रसायनका फल उत्पन्न करती हैं न की केवल एक एकवस्तु तादृश फल देसकती है उसी प्रकार सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र मिलकर मोक्षकाकारण है ॥ २५ ॥ अत्र सङ्क्षेपतस्तावज्जीवाजीवाख्ये द्वे तत्त्वे स्तः। तत्र बोधात्मको जीवः, अबोधात्मकस्त्वजीवः। तदुक्तं पद्मनन्दिना "चिदचिद्वे परे तत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनम्। उपादेयमुपादेयं हेयं हेयं च कुर्वतः ॥ हेयं हि कर्तृरागादि तत् कार्यमविवेकिनः। उपादेयं परं ज्योति- रुपयोगैकलक्षणम् ॥" इति। सहजचिद्रूपपरिणति स्वीकुर्वाण- ज्ञानदर्शने उपयोग । स परस्परप्रदेशानु प्रदेशन्बधात्कर्मणै- कीभूतस्यात्मनोऽन्यत्वप्रतिपत्तिकारणं भवति ॥ २६ ॥ सक्षेपत तत्त्वविचार-जीव और अजीव दो तत्त्व हैं बोधरूप अर्थात् चेतनालक्षण जीव है इससे विपरीत अचेतन अजीव है । ( चिदाचिद्वेति ) उक्तार्थ कर्तृत्व रागादि हेय है वह अविवेकका कार्य है । परज्योति उपादेय है वह मतिज्ञान श्रुतज्ञान मत्य- ज्ञान श्रुताज्ञानादि भेदयुक्त ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग स्वरूप है । वह उपयोग कर्मवश परस्पर प्रदेश संयोगसे एकीभूत आत्माको अन्यत्वप्रतीतिका कारण है ॥२६॥ १ तथा च तत्त्वार्थसूत्र " तत्स्थैर्यार्थ भावना पच पच " तत्स्थैर्य पूर्वोक्त व्रतपुष्टिके लिये प्रथमव्रतम " वाङ्मनोगुप्तिर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पच " द्वितीयमें- " क्रोध लोभ भीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभापणञ्च पञ्च " इति । तृतीयमें- " शून्यागारे विमोचितावासे परोपरोधाकरणे भैक्ष्यशुद्धि सद्धर्माविसंवादा पञ्च " इति । ब्रह्मचर्यव्रतभावना " स्त्रीरागकथाश्रवण तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण पूर्वतानुस्मरण वृष्येतरस स्वश- रीरसंस्कारत्यागा पच " इति । अपरिग्रहव्रत भावनाः-"मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्ज- नानि पञ्च " इति । इन सूत्रोंका विस्तृत व्याख्यान सर्वार्थसिद्धिमें है यहां केवल नामनिर्देश मात्र किया है ।

( ६६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- सकलजीवसाधारणं चैतन्यमुपशमक्षयक्षयोपशमवशादौपश- मिकक्षायात्मकक्षायोपशामिकभावेन कर्मोदयवशात् कालुष्या- कारेण च परिणतजीवपर्यायजीवविवक्षायां स्वरूपं भवति । यदवोचद्वाचकाचार्य्य - "औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रं च जीवस्य सत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ चेति । अनुदयप्राप्तिरूपे कर्मण उपशमे सति जीवस्योत्पद्यमानो भाव औपशमिकः । यथा पङ्के कलुषतां कुर्वति कतकादिद्रव्यसम्बन्धादधः पतिते जलस्य स्वच्छता । कर्मणः क्षयोपशमे सति जायमानो भाव- क्षायिकः । यथा मोक्षः । उभयात्मा भावो मिश्रः । यथा जलस्या- र्द्धस्वच्छता । कर्मोदये सति भवन् भाव औदयिकः । कर्मोपश- माद्यनपेक्षः सहजो भावश्चेतनत्वादिः पारिणामिकः । तदेतत् स्वतत्त्वं यथासम्भवं भव्यस्याभव्यस्य जीवस्य तत्त्वं स्वरूप- मिति सूत्रार्थः ॥ २७ ॥ समस्त जीव साधारण चैतन्य उपशम, क्षय, क्षयोपशम, निमित्तसे ओपशामिक क्षायिक, क्षयोपशामिक भाव वश कर्मोदय और कालुष्यसे अन्याकारमे परिणत जीवपर्यायका स्वरूप होता है इसमें तत्त्वार्थसूत्र प्रमाण भी देते हैं (यदवोचदित्यादि ) आत्मामें कर्मरूप स्वशक्तिका किसी कारणवश प्रादुर्भाव न होना उपशम है तादृश उपशमके अनन्तर जीवका उत्पद्यमान भाव औपशमिक है । जिस प्रकार जलको कलुषित करनेवाला कर्दम निर्मलीके संयोगसे जब नीचे बैठ जाता है तब जलकी निर्मलता होती है । अत्यन्त निवृत्ति क्षय है तथा च कर्मका क्षय होनेसे उत्पन्न भाव क्षायिक है जिस प्रकार स्फटिकादि पात्रमें रखे हुए जलमें कर्दमका अत्यन्त अभाव होता है वैसी जीवकी मोक्षदशामें कर्मोंका अत्यन्त अभाव है । उभयात्मक भाव मिश्र है जिस प्रकार जलमें आधी स्वच्छता द्रव्यादिनिमित्तसे कर्म फलप्राप्तिका नाम उदय है कर्मोद्यमे जायमान भाव औदयिक है कर्मोपशमनिरपेक्ष सहज होनेवाला चेतन त्वादि अर्थात् द्रव्यात्मलाभ मात्र निमित्तक परिणामिक हे उक्त पाँच भाव यथा- योग्य भव्याभव्यात्मक जीवका स्वरूप है ॥ २७ ॥ तदुक्तं स्वरूपसम्बोधने—“ज्ञानाद् भिन्नो न चाभिन्नो भिन्ना-

दर्शनम् ] . भाषाटीकासमेत. । ( ६७ ) भिन्नः कथञ्चन । ज्ञानं पूर्वापरीभूतं सोऽयमात्मेति कीर्तितः ॥" इति ॥ २८ ॥ ( तदुक्तमिति ) ज्ञानसे अत्यन्त भिन्न या अत्यन्त अभिन्न आत्मा नहीं है किन्तु भिन्नाभिन्न अर्थात् पूर्वापरोभूत ज्ञानको आत्मा कहते हैं ॥ २८ ॥ 'ननु भेदाभेदयोः परस्परपरिहारेणावस्थानादन्यतरस्यैव वास्त- वत्वादुभयात्मकमयुक्तमिति चेत्तदयुक्तम्, बाधे प्रमाणाभावात्। अनुपलम्भो हि बाधकं प्रमाणं न सोऽस्ति समस्तेषु वस्तुष्वने- करसात्मकत्वस्य स्याद्वादिनो मते सुप्रसिद्धत्वादित्यलम् ॥ २९ ॥ भेदाभेदका विरोधाभाव समर्थन-( ननु इत्यादि ) यथा घटसे भिन्न पट है घटमें पटका भेद अर्थात् अभाव है तहा घट नहीं रहसकता अभेद अर्थात् भेदाभाव घटमें पटका भेदाभाव पटरूपता है तथा च भेदाभेद परस्पर विरुद्ध होनेसे एकत्र नहीं रह सकते । नैयायिकोंने भी भेदका प्रतियोगितावच्छेदकके साथ और अभावका प्रतियोगीके साथ विरोध माना है अतः परस्पर विरुद्ध होनेसे एकको सत्यत्व और अन्यको मिथ्यात्व कहनाहोगा । उत्तर(तदयुक्तमिति ) सहानवस्थान लक्षण ही विरोध है विरोध होनेपर बाध्यबाधकभाव होता है बाधमें कोई प्रमाण ही नहीं घट जहापर है वहा घटाभाव उपलब्ध नहीं होता न घटाभाव व्यवहार भी नहीं होता है अत अनुपलब्धरूप ही प्रमाण कहोगे सो भी ठीक नहीं क्योंकि स्याद् वादियोंके मतमें समस्तवस्तुओंमें अनेकान्तात्मक अर्थात् ( स्यादस्ति स्यान्नास्ति ) इत्यादि अनिश्चयात्मक रहता है अतः आर्हत् मतमें कोई विरोध ही नहीं ॥ २९ ॥ अपरे पुन जीवाजीवयोरपरं प्रपञ्चमाचक्षते जीवाकाशधर्माधर्म- पुद्गलास्तिकायभेदात् । एतेषु पञ्चसु तत्त्वेषु कालत्रयसम्ब- न्धितया स्थितिव्यपदेशः, अनेकप्रदेशत्वेन शरीरवत् कायव्य- पदेशः । तत्र जीवा द्विविधाः, संसारिणो मुक्ताश्च । भवाद्भवा- न्तरप्राप्तिमन्त संसारिण । ते च द्विविधा , समनस्का अमन- स्काश्च । तत्र संज्ञिनः समनस्का , शिक्षाक्रियालापग्रहणरूपा संज्ञा, तद्विधुरास्त्वमनस्काः । ते चामनस्का द्विविधा , त्रस- स्थावरभेदात् । तत्र द्वीन्द्रियादय शङ्खगण्डोलकप्रभृतयश्चतु- र्विधास्त्रसाः ॥ ३० ॥

( ६८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

तत्त्वपञ्चक वादिका मत-(अपरेषु नास्त्यादि) जीव, आकाश, धर्म, अधर्म, पुद्गल अस्तिकायशब्दका प्रत्येकमे सम्बन्ध है अर्थात् जीवास्तिकाय आकाशास्तिकाय इत्यादि इन पांच तत्त्वोंमे कालत्रयसम्बन्धसे स्थिति व्यवहार और अनेक प्रदेश होनेसे शरीरवत् काय व्यवहार योग्य होनेसे अस्तिकाय कहा जाता है। संसारी और मुक्त भेदसे जीव दो प्रकार है ससरण अर्थात् परिवर्तनशील संसारी है वह भी मनो युक्त और मनोरहित भेदमे दो प्रकार है । शिक्षा क्रिया आलापादिरूप संज्ञायुक्त समनस्क है इससे शून्य अमनस्क है अमनस्क । भी त्रस, स्थावर भेदसे दो प्रकार है (द्वीन्द्रियादय इत्यादि) तथा च तत्त्वार्थसूत्र 'द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः' इति । दो तीन चार पांच इन्द्रिय जिसको हो वह त्रस है "कृमि पिपीलिका भ्रमर, मनुष्यादीनामे कैकवृद्धानि" इति । अर्थ पूर्वसूत्र "वनस्पत्यन्तानामेकम्" में वनस्पतियोंको एक मात्र स्पर्शनेन्द्रिय कहा है उसमेंसे स्पर्शका अधिकार इस सूत्रमे आता है उसके साथ क्रमशः एक एक बढानेसे (द्वीन्द्रियादि) कृमि शंख प्रभृतिको स्पर्श और रसना दो इन्द्रिय होतीहे पिपीलिका प्रभृतिको स्पर्श, रसना, घ्राण तीन इन्द्रिये हे भ्रमरादिको स्पर्श, रसना, घ्राण और चक्षु चार इन्द्रिये हे मनुष्यादिको श्रोत्र सहित पूर्वोक्त मिल कर पाच इन्द्रिय होती है ॥ ३० ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतय स्थावरा । तत्र मार्गगतधूलि पृ- थिवी, इष्टकादि पृथिवीकाय, पृथिवीकायत्वेन येन गृहीता स पृथिवीकायिक, पृथिवी कायत्वेन यो ग्रहीष्यति स पृथिवी- जीव । एवमब्वादिष्वपि भेदचतुष्टयं योज्यम् । तत्र पृथिव्यादि कायत्वेन गृहीतवन्तो ग्रहीष्यन्तश्च स्थावरा गृह्यन्ते न पृथि- व्यादिपृथिवीकायादय तेषा जीवत्वात् । ते च स्थावरा स्पर्श- नैकैन्द्रियाश्च भवान्तरप्राप्तिनिष्ठुरा मुक्ता• धर्मा धर्माधर्माका- शास्तिकायास्ते एकत्वशालिनो निष्क्रियाश्च द्रव्यस्य देशा- -न्तरप्राप्तिहेतु ॥ ३१ ॥ स्थावर निरूपण-पृथिवी, जल, तेज, वायु और वनस्पति ये स्थावर हे (मार्ग गतेति) अचेतन कठिन गुणयुक्त पृथिवी हे पृथिव्यादिके चार चार भेद आगममे कहे हैं पृथिवी पृथिवीकाय पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव यही चार प्रकार हैं इस प्रकार जलादिमे भी चार भेद है काय शरीर है पृथिवीकाय इष्टकादि है पृथिवी

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ६३ ) कायिक मृतशरीरादि पृथिवीको शरीररूपसे जो ग्रहण करता है वह पृथिवी जीव है पृथिव्यादिको कायरूपसे ग्रहण करनेवाला स्थावर है पृथिवी वा पृथिवीकाय नहीं क्योंकि वह जीव है "वनस्पत्यन्तानामेकम्" इति सूत्रोक्त प्रकार पृथिव्यादि एक मात्र स्पर्शन इन्द्रिय है यह सब पुनः संसार प्राप्ति रहित होनेसे मुक्त कहा जाते हैं धर्म्म अधर्म और आकाशास्तिकायादिक एक और निष्क्रिय है द्रव्यको प्रदेशान्तर प्राप्तिमें हेतुभी है ॥ ३१ ॥ तत्र धर्माधर्मौ प्रसिद्धौ आलोकेनाविच्छिन्ने नभसि लोकाकाश- पदवेदनीये सर्वत्रावस्थितिगतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुप- कार, अत एव धर्मास्तिकाय प्रवृत्त्यनुमेयः अधर्मास्तिकायः स्थित्यनुमेयः । अन्यवस्तुप्रदेशमध्येऽन्यस्य वस्तुन प्रवेशोऽ- वगाहः तदाकाशकृत्यम् । स्पर्शरसवर्णवन्त पुद्गला । ते च द्विविधा, । अणव स्कन्धाश्च । भोक्तुमशक्या अणव । द्व्यणु- कादयः स्कन्धाः । तत्र द्व्यणुकादिस्कन्धभेदादण्वादिरुत्पद्यते, अण्वादिसङ्घातात् द्व्यणुकादिरुत्पद्यते । क्वचिद्भेदसंघाताभ्यां स्कन्धोत्पत्ति, अतएव पूर्य्यन्त गलन्तीति पुद्गलाः । कालस्या- नेकप्रदेशत्वाभावेनाऽस्तिकायत्वाभावेऽपि द्रव्यत्वमस्ति तल्ल- क्षणयोगात् ॥ ३२ ॥ विहितकर्मानुष्ठानादि धर्म और निन्दित कर्मानुष्ठानादि अधर्मरूपसे प्रसिद्ध है आलोकविशिष्ट आकाश अर्थात् जिसको लोकाकाश कहते हैं उसमें सर्वत्र गति ओर स्थितिका उपकारक धर्माधर्म है । धर्माधर्म प्रवृत्ति और निवृत्तिके उपकारक होनेसे ही प्रवृत्ति स्थितिरूप कार्यसे धर्माधर्मका अनुमान होता है । आकाश अवकाशका हेतु है जैसे गृहमें घटादिका प्रवेश होता है । स्पर्श, रस, रूपगुणवाला पुद्गल है । वह अणु स्कन्ध भेदसे दो प्रकार है । उपभोगका अशक्य प्रदेशशून्य सूक्ष्म अणु है द्व्यणुक आदि स्कन्ध है स्कन्धका भेद न होनेसे अणु उत्पन्न होता है । अणुसमु- दायमें स्कन्ध उत्पन्न होता है कहीं कहीं अणु और संघात दोनों मिलकर स्कन्ध उत्पन्न होता है जैसे अणु द्व्यणुक मिलकर एक स्कन्ध उत्पन्न हुआ उसी स्कन्धमें पुन एक अणुका संयोग होनेमें पुनः स्कन्धान्तर उत्पन्न होता है एवं दो दो संघा- तसे भी संघातान्तर उत्पन्न होता है यथा द्व्यणुक त्रसरेणु प्रभृतिकी उत्पत्ति होती है

(७०) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ आर्हत अतएव पूरयन्ति गलन्ति इस प्रकार पुद्गलकी व्युत्पत्ति होती हे अर्थात् स्कन्धों अलग होजानेसे गलन ( विशीर्ण ) होता हे अणुसंयोगद्वारा स्कन्ध होनेसे पूर होता है ॥ ३२ ॥ तदुक्तं गुणपर्यायवद्द्रव्यमिति । द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा । यथा जीवस्य ज्ञानत्वादिसामान्यरूपा पुद्गलस्य रूपत्वादिसामान्य- स्वभावा धर्माधर्माकाशकायानां यथासम्भव गतिस्थित्यवगाह- हेतुत्वादिसामान्यानि गुणा । तस्य द्रव्यस्योक्तरूपेण भवनमु- त्पाद तद्भाव परिणाम पर्याय इति पर्याया । यथा जीवस्य घटादि ज्ञानसुखक्लेशादय पुद्गलस्य मृत्पिण्डघटादय धर्मादीनां गत्यादिविशेषा , अतएव षट् द्रव्याणीति प्रसिद्धिः ॥ ३३ ॥ ( गुणपर्यायवदिति ) गुण एक द्रव्य द्रव्यान्तरसे जिसके द्वारा व्यावृत्त हो वह गुण है यथा नील घट इत्यादिमे नीलादि विशेषण नीलगुण घटान्तरसे व्यावृत्ति करता है यदि तादृश गुण न होता तो समस्त द्रव्य एकरूपहोनेसे सांकर्य होता जीव भी ज्ञानादि गुणद्वारा पुद्गलादिसे व्यावृत्त होता हे और पुद्गलादि भी रूपादिगुणसे व्यावृत्त रहता है अत अन्वयी गुण है उसके विकार अर्थात् विशेषरूपसे व्यावृत्त होनेवाले पर्याय हैं। क्रोध मान गन्धादि जो द्रव्यमे रहनेवाले हो और जिनपर गुण नहीं रहता हो वही गुण हे।धर्माधर्म आकाशकायके यथाक्रम गतिस्थिति अवकाशादि गुण हैं। द्रव्योंकी उक्तरूपसे उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं जिस द्रव्यका जो वास्तविक स्वभाव हो उस स्वरूपप्राप्तिरूप परिणामको पर्याय कहते हैं । अत एव जीवाजीव, धर्माधर्म, आकाश पुद्गल भेदसे किसीके मतमें द्रव्य हैं किसीके मतमें छह अजीवके स्थानपर काल मिलाकर छह हैं ॥ ३३ ॥ केचन सप्त तत्त्वानीति वर्णयन्ति । तदाह जीवाजीवास्रवबन्ध- संवरनिर्जरमोक्षास्तत्त्वानीति । तत्र जीवाजीवौ निरूपितौ । आ- स्रवो निरूप्यते । औदारिकादिकाय्यादिचलनद्वारेणात्मनश्चलनं योगपदवेदनीयमास्रव । यथा सलिलावगाहिद्वारं नद्यां स्रवणं कारणत्वादास्रव इति निगद्यते तथा योगप्रणाडिकया कर्मास्रव- तीति स योग आस्रवः ॥ ३४ ॥

नम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) सप्ततत्त्ववादीका मतनिरूपण-(केच नेत्यादि)बोधात्मक जीव अबोधात्मक अजीव यह कहचुके हैं । आस्रवनिरूपण-( औदारिकेत्यादि ) तात्पर्य, योगका नाम आस्रव है “ कायवाङ्मनःकर्म योगः” इति सूत्रोक्तप्रकार आत्मप्रदेशका चलन योग है वह शरी- रयोग वाग्योग और मनोयोगभेदसे तीन प्रकार है “ तत्र औदारिकवैक्रियिका- हारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ” इस सूत्रोक्त प्रकार उदार अर्थात् स्थूलमे जो हो वह औदारिक और अणिमादि ऐश्वर्यसे अनेक शरीर धारण विक्रिया है विक्रि- याके निमित्त वैक्रियिक इत्यादि सूत्रार्थ है तथा च औदारिकादि सात प्रकारके शरीर चलनसे आत्माका चलन योग है वही आस्रव है जिस प्रकार जलमे प्रवेश होनेके लिये जो मार्ग है वह नदीमे प्राप्त होनेका द्वार होनेसे आस्रव कहाता है तिसी प्रकार योगप्रणालीसे आत्माके कर्मकी गति होनेसे आस्रव भी योग कहाता है ॥ ३४ ॥ यथा आर्द्रं वस्त्रं समन्ताद्वातानीतं रेणुजातमुपादत्ते तथा कषा- यजलार्द्र आत्मा योगानीतं कर्म सर्वप्रदेशैर्गृह्णाति । यथा वा निष्टप्तायःपिण्डे जले क्षिप्ते अम्भः समन्ताद्गृह्णाति तथा कषा- योष्णो जीवो योगानीतं कर्म समन्तादादत्ते । कषति हिनस्त्या- त्मानं कुगतिप्रापणादिति कषायः क्रोधो मानो माया लोभश्च । स द्विविधः शुभाशुभभेदात् । तत्राहिंसादिः शुभः काययोगः सत्यमितहितभाषणादिः शुभो वाग्योग । तदेतदास्रवभेदप्र- भेदजातं कायवाङ्मनः कर्मयोग । स आस्रव शुभ पुण्यस्य अशुभ पापस्येत्यादिना सूत्रसन्दर्भेण ससंरम्भमभाणि। अपरे त्वेवं मेनिरे आस्रवयति पुरुषं विषयेष्विन्द्रियवृत्तिरास्रवः । इन्द्रियद्वारा हि पौरुषं ज्योतिर्विषयानस्पृशद्रूपादिज्ञानरूपेण परिणमित इति ॥ ३५ ॥ बन्धनिरूपण-जिस प्रकार आर्द्र वस्त्रमे हवामे उडी हुई धूली चिपक जातीहै तिसी प्रकार क्रोध मान माया और लोभ रूप कषाय जलसे आर्द्र जो आत्मा वह योगसे प्राप्त क्रियाको चारों ओरसे ग्रहण करता है यथावा तप्त लोहमें निक्षिप्त जलको लोहपिण्ड सर्वात्मना ग्रहण करता है तिसी प्रकार कषायसे तप्त आत्मा योगसे प्राप्त कर्मको सर्वत ग्रहण करता है । कष धातु हिसार्थक होनेसे कषाय जीव- स्वरूपविनाशक अर्थात् बन्धहेतु है । वह कर्म शुभाशुभ भेदसे दो प्रकार है. अहिंसादि

शुभ काययोग हे सत्यभाषण मितभाषण हितभाषणाद शुभ वाग्योग हे उक्त आस्रव भेद प्रभेदरूप योगको शुभ. पापस्येत्यादि सूत्रसंदर्भमे सविस्तर सूत्रवृत्तिकारने निरू- पण किया है । आस्रवशब्दके व्याख्यानम मतान्तर कहते हैं ( अपगेत्यादि ) पुरुषको चञ्चल करनेवाली विषयेन्द्रियवृत्ति आस्रव हे पुरुषज्योति सम्बन्धी इन्द्रियद्वारा नि कलकर विषयाकारसे जो परिणत होती है वही आस्रव हे ॥ ३५ ॥ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषायवशाद्योगवशाच्चात्मा सूक्ष्मैक- क्षेत्रावगाहिनामनन्तानन्तप्रदेशानां पुद्गलानां कर्मबन्धयोग्याना- मादानमुपश्लेषण यत् करोति स बन्ध । तदुक्तं, सकषायत्वा ज्जीव कर्मभावयोग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्ध इति तत्र कषाय ग्रहणं सर्वबन्धहेतूपलक्षणार्थम् । बन्धहेतून पपाठ वाचका- चार्य्य. । मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाया बन्धहेतव इति । मिथ्यादर्शनं द्विविधं मिथ्याकर्मोदयात् परोपदेशानपेक्षं तत्त्वा- श्रद्धानं नैसर्गिकमेकम् अपरं परोपदेशजम् पृथिव्यादिषड्घा- पादकं षडिन्द्रियासंयमनं च अविरति । पञ्चसमितिगुप्ति- ष्वनुत्साह प्रमा द । कषायःक्रोधादि । तत्र कषायान्ता- स्थित्यनुभावबन्धहेतव प्रकृतिप्रदेशबन्धहेतुर्योग इति विभाग ॥ ३६ ॥ वन्धनिरूपणम्-मिथ्यादर्शनादिवश आत्मांका सूक्ष्मक्षेत्रमें प्रवेश करनेवाले ही अनन्तानन्त प्रदेशयुक्त कर्मबन्धयोग्य पुद्गलके साथमें जो है वही बन्ध है इसमें तत्त्वार्थसूत्र भी प्रमाण देते है( सकषायेति ) कषायग्रहण “मिथ्यादर्शनेत्यादि”सूत्रोक्त बन्धकारणीभूत मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग पांचोंका उपलक्षण है । ग्रन्थकार सूत्रार्थ भी स्वयं कहते हैं ( द्विविधमिति ) मिथ्यादर्शन दो प्रकारके हैं १ नैसर्गिक २ परोपदेशन• परोपदेशके विना मिथ्याक्रमादयसे स्वभाववश जो तत्त्वा र्थमें अश्रद्धा होती है वह नैसगिक हे परोपदेश उत्पन्न तत्त्वार्थमें अश्रद्धा परोपदेशज हे पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, वनस्पतिरूप षड्तत्त्वोंका आपादक छहों इन्द्रियोंका असंयम अविरति हे । ईर्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेप उत्सर्गरूप पञ्चसमिति गुप्तिसमिति आदिमें अनुत्साहका नाम प्रमाद है । कषायक्रोधादि पूर्वोक्त हैं कषाय-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ७३ ) पर्यन्त स्थित्यनुभाव बन्धहेतु है । प्रकृतिप्रदेशका बन्धहेतु योग है प्रकृति बन्ध स्थिति, अनुभाव, प्रदेशभेदसे बन्ध चार प्रकार है ॥ ३६ ॥ बन्धश्चतुर्विध इत्युक्तम्, प्रकृतिस्थित्यनुभावप्रदेशास्तु तद्विधय इति । यथा निम्बगुडादेस्तिक्तत्वमधुरत्वादिश्वभावः एवमावरणी- यस्य ज्ञानदर्शनावरणत्वमादित्यप्रभोच्छेदकाम्भोधरवत् प्रदीप- प्रभातिरोधायककुम्भवच्च सदसद्वेदनीयस्य सुखदुःखोत्पाद- कत्वमसिधारामधुलेहनवद्दर्शनमोहनीयस्य तत्त्वार्थाश्रद्धानका- रित्वं दुर्जनसङ्गवच्चारित्रे मोहनीयस्यासंयमहेतुत्वं मद्यमदवदा- युषो देहबन्धकर्तृत्वं जलवत् नाम्नो विचित्रनामकारित्वं चित्र- कवद्गोत्रस्योच्चनीचकारित्व कुम्भकारवद्दानादीनां विघ्ननिदान- त्त्वमन्तरायस्य स्वभावः कोशाध्यक्षवत् । सोऽयं प्रकृतिबन्धोऽ- ष्टविधः, द्रव्यकर्मावान्तरभेदमूलप्रकृतिवेदनीय । तथाचोदुमा- स्वातिवाचकाचार्य्य 'आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीया- युर्नामगोत्रान्तराया 'इति । तद्भेदश्च समगृह्णात् पञ्चनवद्व्यष्टाविंश- तिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चदशभेदा यथाक्रममिति । एतच्च सर्व विद्यानन्दादिभिर्विवृतमिति विस्तरभयान्न प्रस्तूयते ॥ ३७ ॥ बन्धके चार भेद हैं-प्रकृति स्थिति, अनुभव और प्रदेश, प्रकृतिका, अर्थ स्वभाव है जिस : प्रकार निम्ब ओर गुडका तिक्त और मधुर स्वभाव है उसी प्रकार अर्थका तिरोधान : करना ज्ञानावरणका स्वभाव है जैसे मेघ सूर्यकी प्रभाको आच्छादन करता है वैसे ही : ज्ञानावरण अर्थका तिरोधान करता हे जिस भाँति घटादि दीपप्रभाको तिरोधान : करता है उसी भाँति दर्शनावरण वस्तुको अप्रकाशित करता है मधुलिप्त तलवारकी : धार जिस प्रकार सुख और दुःख दोनोंको उत्पन्न करती है उसी प्रकार सदसद्रूपवेद्य : सुख ओर दुःख दोनोंको उत्पन्न करता है दुर्जनोंका संग जिस प्रकार सदाचारसे : श्रद्धाको हटादेताहै उसी प्रकार दर्शन मोहन तत्त्वार्थमे अश्रद्धा उत्पन्न करदेते हैं । : यह आठ प्रकारका बन्ध द्रव्य कर्मके अवान्तर मूल प्रकृति वेदनीय है प्रसंगवश : बन्ध और उसके भेदमे प्रमाण कहते है ( जाद्यो ज्ञानदर्शनेत्यादि ) मूलप्रकृति- : बन्धके आठों भेदोंके अनन्तर उत्तर प्रकृतिबन्धके भेद कहते हैं-( पञ्चनवेत्यादि ) : पाँच प्रकार ज्ञानावरणीय, नौ प्रकार दर्शनावरणीय, दो प्रकार वेदनीय २८ प्रकार

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( ७४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- मोहनीय ४ प्रकार आयुः, ४२ प्रकार नामबन्ध दो प्रकार गोत्रबन्ध और ५ प्रकार अन्तराय बन्ध है । यह सब सर्वार्थसिद्धिमै प्रपञ्चित है ॥ ३७ ॥ यथा अजागोमहिष्यादिक्षीराणामेतावन्तमनेहसं माधुर्य्यस्वभा- वादप्रच्युतिस्थितिः तथा ज्ञानावरणादीनां मूलप्रकृतीनामादित- स्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटिकोट्यः परास्थिति- रित्याद्युक्तं कालदुद्दुर्द्दानवत् स्वीयस्वभावादप्रच्युतिस्थितिः॥३८॥ एव अष्टमाध्यायके चारसे तेरहवे सूत्रतक प्रकृति बन्धके भेदप्रभेद निरूपण करके आगे स्थितिवन्ध प्रदर्शन करते हैं-(यथा अजागोमहिष्येत्यादि) जिसका जो स्वभाव हो उससे च्युत न होना स्थिति हे जिस प्रकार गौ महिषी प्रभृतिका दुग्ध अनादि- कालसे आजतक माधुर्य्यस्वभावसे च्युति नहि हुआ है तिसी प्रकार ज्ञानावरणादि “आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटिकोट्य परास्थिति”इति सूत्रोक्त ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय अन्तरायरूप अनेककोटिकोटिप्रकृतिको स्वस्वभावमे च्युत न रहना स्थिति बन्ध है इसका भी अवान्तर भेद “शेषाणामन्तर्मुहूर्त्ता” इत्यन्त आठवे अध्यायके बीसवें सूत्रतक वर्णन किया है ॥ ३८ ॥ यथा अजागोमहिष्यादिक्षीराणां तीव्रमन्दादिभावेन स्वकार्य्य- कारणे सामर्थ्यविशेषोऽनुभाव तथा कर्मपुद्गलानां स्वकार्य्य- कारणे सामर्थ्यविशेषोऽनुभावः ॥ ३९ ॥ अनुभववन्धनिरूपण करते ह-(यथेति)“तद्रसविशेषोऽनुभव ” इति वृत्ति । जिस प्रकार गो महिषी आदिके दूधको तीव्र मन्दादि स्वभावसे स्वकार्यकारणमे जो सामर्थ्य- विशेष है अर्थात् रसविशेष प्रकटन सामर्थ्यानुभव हे उसी प्रकार कर्म पुद्गलको भी स्वकार्यविशेषमें सामर्थ्यविशेष अनुभव हे ॥ ३९ ॥ कर्मभावपरिणतपुद्गलस्कन्धानामनन्तानन्तप्रदेशानामा त्मप्रदे- शानुप्रवेश प्रदेशबन्ध , आस्रवनिरोध संवर , येनात्मनि प्रवि- शत् कर्म प्रतिषिध्यते स गुप्तित्समित्यादि- संवर । ससारका- रणयोगादात्मनो गोपनं गुप्ति । सा त्रिविधा कायवाङ्मनो निग्रहभेदात् । प्राणिपीडापरिहारेण सम्यगयनं समिति सा ईर्य्याभाषादिभेदात् पञ्चधा ॥ ४० ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । (७५) प्रदेशबन्धका निरूपण करते हैं-(एतावदेव) इस प्रकार निश्चयका नाम प्रदेश हे कर्मभावसे परिणत अनन्तानन्त प्रदेशवाले पुद्गल और स्कन्ध हैं उनको आत्मप्रदेशमें अनुप्रवेश अर्थात् परमाणुरूपसे अवस्थानका नाम प्रदेशबन्ध है। चतुर्विधबन्धनिरू- पणानन्तर उद्देशक्रमप्राप्त संवरनिरूपण करते हैं (आस्रवनिरोधः संवर इति) अभिनवकर्म- हेतुभूत जो आस्रव कहे हैं उनका निरोध अर्थात् जिनसे आत्मामें प्रवेश करनेवाले कर्मका प्रतिबंध हो वह संवर हे । गुप्ति, समिति, धर्मानुप्रेक्षा, परीषहजय, चारित्र संवरका भेद हे । संसारके कारणोंसे आत्माका गोपन करना गुप्ति है। वह कायगुप्ति, वाग्गुप्ति और मनोनिरोधभेदसे तीन प्रकार है प्राणियोंकी पीडापरिहारार्थ सम्यक यत्नका नाम समिति है। वह ईर्ष्या, भाषा, एषणा, आदान, निक्षेपोत्सर्ग भेदसे पांच प्रकार है ॥ ४० ॥ प्रपञ्चितं च हेमचन्द्राचार्य्यैः—“लोकातिवाहिते मार्गे चुम्बिते भास्वदंशुभिः । जन्तुरक्षार्थमालोक्य गतिरीर्ष्या मता सताम् ॥ आपद्यनागतं सर्वजनीनं मितभाषणम् । प्रिया वाच्यमानां सा भाषासमितिरुच्यते ॥ द्विचत्वारिंशता भिक्षादोषैर्नित्यमदूषि- तम् । मुनिर्यदन्नमादत्ते सैषणासमितिर्मता ॥ आसनादीनि सं- वीक्ष्य प्रतिलङ्घ्य च यत्नतः । गृह्णीयान्निक्षिपेद् ध्यायेत् सादा- नसमिति स्मृता ॥ कफमूत्रमलप्रायैर्निर्जन्तुजगतीतले । यत्ना- द्युत्सृजेत् साधु सोत्सर्गसमितिर्भवेत्॥” अत एवास्त्रव स्रोतसो द्वारं संवृणोतीति संवर इति निराहु ॥ ४१ ॥ (लोकातिवाहितेत्यादि) आकाश दो प्रकार है एक लोकाकाश दूसरा आलोकाकाश । धर्माधर्म पुद्गलादि लोक है तादृश लोक जिसमें अधिष्ठित हो वह लोकाकाश हे । तथा च लोकाधाग्भूत भास्वत् सूर्य किरणोंसे चुम्बित युक्त आकाशमें प्राणियोंकी रक्षाके लिये जो गति है उसका नाम ईर्ष्या है । सर्वावस्थामें सर्व प्रकार सर्व जनके हितार्थ प्रिय ओर परिमित भाषणनाम समिति है । ४२ प्रकारकी भिक्षाजाके दोषोंसे अदूषित जिस अन्नको मुनिजन ग्रहण करते हैं वह एषणा है । सम्यक् प्रकार देखकर आसनादिको रखना उठाना एव ध्यानादिक करनेका नाम आदानस- मिति है। कफ मूत्र ओर मलादिसे उत्पन्न जीवरहित भूमिपर मलमूत्रादिके त्यागका नाम उत्सर्ग है अतएव आस्रवकर्म प्रवाहद्वारको संवरण आच्छादन करनेसे संवर कहाता है ॥ ४१ ॥

( ७६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

तदुक्तमभियुक्तैः- "आस्रवो भवहेतुः स्यात् संवरो मोक्षकारणम् । इतीयमार्हती सृष्टि रन्यदस्याः प्रपञ्चनम् ॥" अर्जितस्य कर्मण- स्तपः प्रभृतिभिर्निर्जरणं निर्जराख्यं तत्त्वं चिरकालप्रवृत्तकषा- यकलापं पुण्यं सुखदुःखे च देहेन जरयति नाशयति केशोल्लु- ञ्चनादिकं तप उच्यते ॥ सा निर्जरा द्विविधा यथा कालौपक्रमि- कभेदात् । तत्र प्रथमा यस्मिन् काले यत् कर्म फलप्रदत्वेना- भिमतं तस्मिन्नेव काले फलदानाद्भवन्ती निर्जरा कामादिपाक- जेति च जेगीयते । यत् कर्म तपोबलात् स्वकामनयोदयावलिं प्रवेश्य प्रपद्यत तत् कर्मनिर्जरा ॥ यदाह- "संसारबीजभूतानां कर्मणां जरणादिह । निर्जरा संस्मृता द्वेधा सकामाकामनिर्जरा । स्मृता सकामा यमिनामकामा त्वन्यदेहिनाम् ॥" इति ॥४२॥ सारांश कहते हैं- आस्रव संसारका कारण है संवर मोक्षका कारण है यही आर्हत मतमें सृष्टि, अन्य सब इसीका प्रपञ्च है । कृतकर्मको तप समाधिप्रभृतिसे निर्जरण अर्थात् अनन्तकालसे प्राप्त क्रोधादि कषाय, पुण्य, पाप, सुख और दुःखको देहके साथ ही नाश करदेनेका नाम निर्जराख्य तत्त्व है केशलुञ्चनादिका नाम तप है उक्त निर्जरा काल और औपक्रमिक भेदसे दो प्रकार है जिस कालमें फलप्रदत्व नियम है उसी कालमें फल उत्पन्न करनेसे कालनिर्जरा कहाता है । वह कामादि और पाकज कहाताहै जो कर्म स्वकामनावश फलजनक होता है वह सकाम निर्जरा है (यदाहेति) , संसारकारणभूत कर्मका नाश करनेसे निर्जरा कहाता है वह सकाम अकाम भेदसे दो प्रकार है योगियोंका सकाम और अन्य संसारियोंका अकाम है ॥ ४२ ॥ (मिथ्यादर्शनादीनां बन्धहेतूनां निरोध अभिनवकर्मभावात्, निर्जराहेतुसन्निधानेनार्जितस्य कर्मणो निरसनादात्यन्तिककर्म- मोक्षणं मोक्षः, बन्धहेतुभ्रन्निहेतुनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षणं मोक्ष इति तदनन्तरमूर्द्धं गच्छत्यालोकान्तात् यथा हस्तदण्डा- दिभ्रमिप्रेरितं कुलालचक्रमूषरतेऽपि तस्मिन् तद्बलादेवासंस्का- रक्ष्यं भ्रमति तथा भवस्थेनात्मना अपवर्गप्राप्तये बहुशो