सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ सात्वतसंहिता अब वर्ण संख्या पूर्ति का प्रकार कहते हैं—पूर्वोक्त मन्त्रों के पद के मध्य में जिस-जिस पद में (जैसे प्रथम मन्त्र के ‘अनन्तगत’ पद में) वर्णाधिक्य कहा गया है, (षडक्षरं तृतीय त्विति यहाँ भी अक्षराधिक्य कहा गया है) वहाँ उस पद में आदि पद के ऊपर विद्यमान अकार को हटा कर ‘अनन्तगतये’, इस पद के आदि में जोड़ देवे । ऐसा करने से ‘अनन्तगतये’ यह छह अक्षर का पद सम्पन्न हो जायेगा । इसी प्रकार चतुर्थ मन्त्र में ‘अविकृतायानन्ताय’ यहाँ पर भी समझ लेना चाहिये ॥ ५८ ॥ विमर्श—यहाँ पर विचार करना चाहिये कि सात्त्वत संहिता के द्वितीय परिच्छेद में तूर्यव्यूह का एक ही मन्त्र उद्धृत किया गया है जबकि सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत इन तीन व्यूहों में चार-चार मन्त्र उद्धृत किये गये हैं उसके अनुरोध से तूर्यव्यूह में भी चार मन्त्र का उद्धार अपेक्षित है । जबकि न केवल भाष्य में अपितु संहिता में भी चातुरात्म्य चतुष्ट्य का प्रतिपादन किया गया है । जब तूर्यव्यूह में भी चातुरात्म्य भासित हो रहा है तब वहाँ भी चार मन्त्र होना चाहिए यह स्वाभाविकी शङ्का उत्पन्न होती है । तब इसका परिहार इस प्रकार करना चाहिये—द्वितीय परिच्छेद में पर स्वरूप का विवरण मात्र है । किन्तु तृतीय, चतुर्थ एवं पञ्चम परिच्छेद में सुषुप्ति, स्वप्न एवं जाग्रत्पद में स्थित व्यूह स्वरूपों का वर्णन है । इस व्यूह्रन्य ब्रह्म को चातुरात्म्य पद से भी कहा जाता है । यह चातुरात्म्य परस्वरूप में अव्यक्तदशा में रहता है । इसलिये वहाँ भी चातुरात्म्य प्रयोग होता है । उसे तुर्यव्यूह नाम से भी कहा जाता है—यहाँ नित्योदित दशा तथा शान्तोदित दशा दो प्रकार की दशा स्वीकार की जाती है । नित्योदित दशा परात्पर वासुदेव दशा तथा शान्तोदित दशा पर वासुदेव दशा कही जाती है । किन्तु दोनों दशा में वासुदेव का प्राधान्य रहता है । उस अवस्था में सङ्कर्षणादि तीनों का तथा अच्युतादि तीन का अव्यक्त रूप से अवस्थान रहता है । प्रकृति में आदिमूर्ति वासुदेव का ही प्राधान्य प्रदर्शित करने के कारण तूर्यव्यूहापर नामक परस्वरूप के आराधन के लिये यहाँ एक ही मन्त्र का निर्देश किया गया है । ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के सुषुप्तिव्यूहसमाराधन नामक तृतीय परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ३ ॥ — ᪥ —