सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ सात्वतसंहिता ब्रह्मयूपस्वरूपेण त्वाक्रम्य स्वं महामते। आदौ वासुदेवादिनां चतुर्णामपि मूलभूतस्य विशाखयूपसंज्ञस्य भगवतो लक्षण- माह—अभित्रेति सार्धैश्चतुर्भिः। अभिन्नपूर्णषाड्गुण्यविभवेनोपबृंहितम्। सङ्कर्षणादि- वद् गुणद्वयभेदं विना वासुदेववद् अन्यूनानतिरिक्तषाड्गुण्यपरिपूर्र्णमित्यर्थः। अभिन्नाभिः सितादिभिर्भाभिर्दीप्तं = वासुदेवादिवत् पार्थक्येन सितादिवर्णभेदं विना श्वेतरक्तपीतकृष्णैश्चतुर्भिरपि तेजोभिर्भास्वरमित्यर्थः। स्वेन तेजसा उदितम् = केवल- तेजोरूपमित्यर्थः। देवं = विशाखयूपाख्यम् अवलोक्य = पूर्वमेव तेजोरूपं दृष्ट्वे- त्यर्थः। पुनः कर्णिकाग्रं समाश्रित्य मन्त्रतनुं पश्येत्, मूर्तीभूतं पश्येदित्यर्थः। पुनस्तद्रूपं संहरन्तं च पश्येदित्यन्वयः। एवं मन्त्रमयं देहमुपसंहृत्य आमूलात् कर्णिकाग्रं स्वतेजसा सम्पूय ब्रह्मयूपस्वरूपेणास्ते, मूर्तिवर्जितः केवलतेजोरूपमाश्रित्य हृत्कमलकर्णिका- रूपेण शाखाभूतानां वासुदेवादीनां मध्ययूपस्थानीयत्वं प्राप्नोतीत्यर्थः। एवमेवोपबृंहितं लक्ष्मीतन्त्रेऽपि—व्यूहाद् व्यूहसमुत्पत्तौ पदाद् यावत् पदान्तरम्। अन्तरं सकलं देशं सम्पूरयति तेजसा॥ पूजितस्तेजसां राशिरव्यक्तो मूर्तिवर्जितः। विशाखयूप इत्युक्तस्तत्तज्ज्ञानादिबृंहितः॥ तस्मिन् तस्मिन् पदे तस्मान्मूर्तिशाखाचतुष्टयम्। वासुदेवादि कं शक्र प्रादुर्भवति वै क्रमात्॥ (११।११-१३) इति। विशाखयूपशब्दनिर्वचनं च तत्रैवोक्तम्— ‘शाखास्तु वासुदेवाद्या विभोर्देवस्य कीर्तिताः। विशाखयूपो भगवान् वितता हि करोति तत्॥’ (लक्ष्मी० ११।२९) इति ॥ ३-६॥ सर्वप्रथम वासुदेवादि चार व्यूहों के मूलभूत विशाखयूप संज्ञक भगवान् का लक्षण कहते हैं—षाड्गुण्य विभव से अभिन्न एवं सितादि वर्ण भेद के विना चारों प्रकार के तेजों से भास्कर (श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण इन चारों प्रकारों के तेजों से देदीप्यमान) केवल तेजःस्वरूप विशाखयूप भगवान् को प्रथम देख कर, कर्णिका के अग्रभाग का अवलम्बन कर, मन्त्र शरीर को मूर्ति रूप में दर्शन करे। फिर उस रूप का उपसंहार करते हुए देखे। फिर मन्त्रमय उस शरीर का उपसंहार कर कर्णिका के मूल से कर्णिका के अग्रभाग तक अपने तेज से पूर्ण कर जो विशाख- यूप भगवान् ब्रह्मयूपशरीर से विद्यमान हो जाते हैं वह मूर्ति रहित होकर केवल तेजःस्वरूप का आश्रय लेकर शाखाभूत वासुदेवादि में मध्य यूप के स्थान में विराजमान हो जाते हैं ॥ ६-७ ॥ विमर्श—वही विशाखयूप भगवान् अपने तेज से ब्रह्मरूप में परिणत हो जाते हैं। यतः उन सर्वव्यापक विभु के वासुदेवादि शाखायें हैं इसलिये उन्हें विशाखयूप कहा जाता है ॥ ६-७ ॥