सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः परिच्छेदः ४७ वासुदेवादीनां लक्षणकथनम् सौम्यमूर्तिचतुष्कं तु सूर्यदिक्प्रसृतं च यत् ॥ ७ ॥ प्राच्यां सितेन वपुषा सूर्यकान्त्यधिकेन तु । व्यक्तिमभ्येति भगवान् वासुदेवात्मना स्वयं ॥ ८ ॥ पद्मरागसमानेन तेजसा तदनन्तरम् । उदेति दक्षिणस्यां वै प्रभुः सङ्कर्षणात्मना ॥ ९ ॥ अथ वासुदेवादीनां लक्षणान्याह—सौम्येत्यारभ्य ज्वालामण्डलमध्यगा इत्यन्तम् ॥ ७-१६ ॥ अब वासुदेवादि का लक्षण कहते हैं—वे भगवान् पूर्व से उत्तर दिशा तक चार प्रकार की सौम्यादि मूर्तियों में प्रकट हैं । पूर्व में सूर्य कान्ति से भी अधिक अपने तेज से वासुदेव के रूप में व्यक्त हो जाते हैं ॥ ८-९ ॥ घर्मांशुरश्मिसन्तप्तशतधामाधिकेन तु । रूपेण पश्चिमस्यां च व्यक्तं प्रद्युम्नसंज्ञया ॥ १० ॥ वही भगवान् सैकड़ों सूर्य से अधिक रश्मियों से भी अधिक तेज से युक्त प्रद्युम्न रूप से पश्चिम दिशा में व्यक्त हो जाते हैं ॥ १० ॥ शरद्गगनसंकाशवर्णेन परमेश्वरः । समास्त उत्तरस्यां चाप्यनिरुद्धात्मना ततः ॥ ११ ॥ वही परमेश्वर शरत्कालीन आकाश के समान अपने स्वच्छ रूप से उत्तर दिशा में अनिरुद्ध रूप से प्रगट हो जाते हैं ॥ ११ ॥ संस्थानमादिमूर्तेर्वे सर्वेषां तु समं स्मृतम् । सूर्यकोटिप्रभाः सर्वे तेजसा कमलेक्षणाः ॥ १२ ॥ आदि मूर्ति के सभी स्वरूपों का संस्थान समान ही कहा गया है । सभी के नेत्र कमल के समान मनोहर हैं । तेज में वे सभी मूर्त्तियाँ करोड़ों सूर्य के समान तेजस्विनी हैं ॥ १२ ॥ दन्तज्योत्स्नावितानैस्तु प्रकटीकृतदिङ्मुखाः । पूर्णचन्द्रायुताकारा मुक्ताहाराद्यलङ्कृताः ॥ १३ ॥ लसत्पीयूषसदृशैः स्वाम्बरैः स्रग्वरैर्युताः । वरायुधोद्यतकराः स्वकैश्चिह्नैरनुज्झिताः ॥ १४ ॥ सभी प्रभु की मूर्तियाँ अपने दाँतों की ज्योत्स्ना से समस्त दिशाओं को देदीप्यमान करती हैं । अयुत संख्यक चन्द्रमा की कान्ति के समान सभी मोतियों