सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ सात्वतसंहिता की माला से अलङ्कृत हैं । सभी स्वच्छ पीयूष के समान अम्बरों तथा मालादि से युक्त हैं । सभी के हाथों में श्रेष्ठ आयुध हैं और सभी अपने-अपने चिह्नों से विराजमान हैं ॥ १३-१४ ॥ रेखोत्थितैस्तु कह्लारैः पादपद्मतलाङ्किताः । विनम्रजनसन्तापशमनव्याप्ताननाः ॥ १५ ॥ रेखा के रूप में विद्यमान सभी के पादपद्म के तलवे अलङ्कृत हैं । किं बहुना सभी के मुख मण्डल विनम्रजनों के सन्ताप शमन के लिये व्याप्त हैं ॥ १५ ॥ करुणापूर्णहृदया जगदुद्धरणोद्यताः । स्वदेहतेजःसम्भूतज्वालामण्डलमध्यगाः ॥ १६ ॥ सभी का हृदय करुणा से पूर्ण है । सभी जगत् के उद्धार के लिये प्रयत्नशील हैं । सभी अपने शरीर के तेज से उत्पन्न ज्वाला मण्डल के मध्य में विद्यमान है ॥ १६ ॥ एवमेवैष भगवान् सम्पूज्यः प्राक्प्रयोगतः । एकैकेन तु भागेन प्राभवेण क्रमेण तु ॥ १७ ॥ पुनरेवानिरुद्धादीन् प्राङ्मूर्त्यन्तं महामते । क्रमान्निरन्तरैर्भोगैरभ्यर्च्य परमेश्वरम् ॥ १८ ॥ प्रणवद्वितयेनैव बुद्ध्या तु सुविशुद्धया । अप्ययाख्येन विधिना हृद्यागनिरतैर्बुधैः ॥ १९ ॥ एषां वासुदेवादीनां प्रभवव्ययक्रमेण मानसार्चनमाह—एवमेवेति त्रिभिः । क्रमेण सृष्टिक्रमणेत्यर्थः । वासुदेवाद्यनिरुद्धान्तमिति यावत् । प्रणवद्वितयेन द्वितीयपरिच्छेदोक्त- प्रीतिमन्त्रेणेत्यर्थः । किन्तु तत्र 'प्रीयतां मे परः प्रभुः' (सा० २।७६) इत्युक्तम् । अत्र तु परशब्दस्थाने वासुदेवसङ्कर्षणाद्यन्यतमशब्दः प्रकरणानुरोधेन योज्यः ॥ १७-१९ ॥ वासुदेवादिकों का प्रभव सृष्टि एवं प्रलय क्रम से मानस अर्चना का प्रकार— इस प्रकार इन भगवान् के एक भाग की सृष्टि क्रम से पूर्व प्रयोग के अनुसार पूजा करे अर्थात् पहले वासुदेव, फिर सङ्कर्षण, फिर प्रद्युम्न, फिर अनिरुद्ध की पूजा करे । फिर, हे महामते ! अव्यय एवं संहार क्रम से अनिरुद्ध से आरम्भ कर प्राक् मूर्ति श्री वासुदेव पर्यन्त निरन्तर भोगों द्वारा प्रीति मन्त्र से अर्चना करे । विमर्श—द्वितीय परिच्छेद में 'प्रीयतां मे परः प्रभुः' यह प्रीति मन्त्र कहा गया है यहाँ 'पर' के स्थान में दो प्रणव लगा कर वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध का प्रयोग करना चाहिए (यथा—ॐ ॐ वासुदेवः प्रीयताम् इत्यादि) ॥ १९ ॥ अथ भिन्नतनोर्मन्त्रं देवस्यास्य महात्मनः । विशाखयूपसंज्ञस्य वक्ष्ये विद्याविवेकदम् ॥ २० ॥