सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः परिच्छेदः ६३ अब संहार क्रम से व्यूहार्चन में प्रयुक्त होने वाले चार मन्त्र का उद्धार कहते हैं—'अप्ययावसरे ... ... वासुदेवाय वै नमः' पर्यन्त मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—'ॐ पुरुषाय नमः, ॐ सत्याय नमः, ॐ अच्युताय नमः, ॐ भगवते वासुदेवाय नमः' । इस प्रकार संहार क्रम से अनिरुद्धादि से वासुदेवान्त चार मन्त्र कहे गये ॥ ६८-७६ ॥ सप्ताक्षरस्तु प्राङ् मन्त्रो द्वितीयस्तु षडक्षरः । पूर्वतुल्यस्तृतीयस्तु चतुर्थो द्वादशाक्षरः ॥ ७७ ॥ पदभेदविनिर्मुक्तमेतन्मन्त्रचतुष्टयम् । गोपनीयं प्रयत्नेन विधिज्ञैः सिद्धिमीप्सुभिः ॥ ७८ ॥ पहला मन्त्र सात अक्षर का, द्वितीय छः अक्षर का, तृतीय पूर्व की भाँति (सात अक्षर का) और चतुर्थ बारह अक्षरों का है । ये चारों मन्त्र पदभेद से सर्वथा रहित हैं । सिद्धि की इच्छा रखने वाले एवं विधि के जानकार वैष्णवों को इन मन्त्रों को गुप्त रखना चाहिये ॥ ७७-७८ ॥ एवं ज्ञात्वाऽमृतमयैर्भोगैस्तोष्यश्च पूर्ववत् । वैभवीयैर्वृतो देवैश्चतुर्मूर्तिरधोक्षजः ॥ ७९ ॥ इन मन्त्रों को जान कर भक्त साधक को वैभवीय देवताओं से आवृत चतुर्मूर्ति भगवान् अधोक्षज को अमृतमय भोगों से सन्तुष्ट करना चाहिये ॥ ७९ ॥ चतुरङ्गाद्वर्णचक्रात् सर्वमन्त्राणामुद्धारः चतुरङ्गादयं चक्राच्चातुरात्म्यस्य वै विभोः । इति मन्त्रगणः प्रोक्तः सरहस्यः समासतः ॥ ८० ॥ एतावदन्तमुक्तमर्थं निगमयति—चतुरङ्गादिति । चतुरङ्गाद् नाभ्यरनेमिप्रधिसंज्ञा- ङ्गचतुष्टयविशिष्टादित्यर्थः ॥ ८० ॥ नाभि, अर, नेमि एवं प्रधिसंज्ञक चार चतुष्टयों से विशिष्ट चक्र से उत्पन्न उन चातुरात्म्य महा विभु के मन्त्रों का रहस्य के सहित संक्षेप में वर्णन किया गया ॥ ८० ॥ तुर्य-सुषुप्ति-स्वप्न-जाग्रद्व्यूहलक्षणानि अभेदेनादिमूर्तेर्वै संस्थितं वटबीजवत् । सर्वक्रियाविनिर्मुक्तमुत्तमं परमार्थतः ॥ ८१ ॥ चातुरात्म्यं तदाद्यं वै शुद्धसंविन्मयं महत् । तुर्यव्यूहलक्षणमाह—अभेदेनेति सार्धेन ॥ ८१-८२ ॥