सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ सात्वतसंहिता आदिमूर्त्ति के ये सभी मन्त्र अभेद-सम्बन्ध से वट-बीजवत् उन्हीं महाविष्णु में स्थित हैं और परमार्थ दृष्टि से यह चातुरात्म्य सभी क्रियाओं से विनिर्मुक्त तथा उत्तम है । यह तूर्य व्यूह का लक्षण है, जो शुद्ध संविन्मय है ॥ ८१ ॥ वह्न्यर्केन्दुसहस्राभमानन्दास्पदलक्षणम् ॥ ८२ ॥ बीजं सर्वक्रियाणां यद् विकल्पानां यदास्पदम् । चातुरात्म्यं तु तद् विद्धि द्वितीयममलेक्षण ॥ ८३ ॥ सुषुप्तिव्यूहलक्षणमाह—वह्न्यर्केति सार्धेन ॥ ८२-८३ ॥ यह अग्नि, सूर्य एवं चन्द्रमा से भी हजारों गुना देदीप्यमान है और आनन्दास्पन्द लक्षण वाला है । यही सर्वक्रिया का बीज है और सभी विकल्पों का आस्पद है । हे अमलेक्षण ! इस चातुरात्म्य को द्वितीय ‘सुषुप्ति’ व्यूह का लक्षण समझना चाहिए ॥ ८२-८३ ॥ नित्यं नित्याकृतिधरं तेजसा सूर्यवर्चसम् । भिन्नं सितादिभेदेन चोर्ध्वाधः संस्थितेन च ॥ ८४ ॥ कैवल्यभोगफलदं भवबीजक्षयङ्करम् । चातुरात्म्यं तृतीयं तु सुधासन्दोहसुन्दरम् ॥ ८५ ॥ स्वप्नव्यूहलक्षणमाह—नित्यमिति द्वाभ्याम् ॥ ८४-८५ ॥ जो नित्य नित्य-आकृति धारण करने वाला, तेज में सूर्य के समान तेजस्वी, सितादि भेद से भिन्न, नीचे-ऊपर सर्वत्र संस्थित, मोक्ष एवं भोग उभय रूप फल देने वाला, संसार बीज को क्षय करने वाला तथा सुधा सन्दोह के समान सुन्दर है, वह तृतीय चातुरात्म्य ‘स्वप्नव्यूह’ का लक्षण है ॥ ८४-८५ ॥ स्थित्युत्पत्तिप्रलयकृत् सर्वोपकरणान्वितम् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय समुदेत्यस्तमेति च ॥ ८६ ॥ चतुर्थं विद्धि तद् यस्य विश्वं तिष्ठति शासनात् । धत्ते सितादिकं रूपं चतुर्धा यत् कृते युगे ॥ ८७ ॥ रक्ताद्यं सितनिष्ठं च त्रेतायां हि महामते । पीतं कृष्णं सितं रक्तं सम्प्राप्ते द्वापरे युगे ॥ ८८ ॥ कलौ कृष्णं सितं रक्तं पीतं चानुक्रमेण तु । जाग्रद्व्यूहलक्षणं तस्य युगभेदेन वर्णभेदं चाह—स्थित्युत्पत्तीत्यादिभिर्विभागो- ऽत्रावधार्यत इत्यन्तैः । लक्ष्मीतन्त्रेऽप्येवमेवोपबृंहितानि व्यूहलक्षणानि— वह्न्यर्केन्दुसहस्राभमानन्दास्पदलक्षणम् ॥ बीजं सर्वक्रियाणां तद् विकल्पानां तदास्पदम् ।