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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

६४ सात्वतसंहिता आदिमूर्त्ति के ये सभी मन्त्र अभेद-सम्बन्ध से वट-बीजवत् उन्हीं महाविष्णु में स्थित हैं और परमार्थ दृष्टि से यह चातुरात्म्य सभी क्रियाओं से विनिर्मुक्त तथा उत्तम है । यह तूर्य व्यूह का लक्षण है, जो शुद्ध संविन्मय है ॥ ८१ ॥ वह्न्यर्केन्दुसहस्राभमानन्दास्पदलक्षणम् ॥ ८२ ॥ बीजं सर्वक्रियाणां यद् विकल्पानां यदास्पदम् । चातुरात्म्यं तु तद् विद्धि द्वितीयममलेक्षण ॥ ८३ ॥ सुषुप्तिव्यूहलक्षणमाह—वह्न्यर्केति सार्धेन ॥ ८२-८३ ॥ यह अग्नि, सूर्य एवं चन्द्रमा से भी हजारों गुना देदीप्यमान है और आनन्दास्पन्द लक्षण वाला है । यही सर्वक्रिया का बीज है और सभी विकल्पों का आस्पद है । हे अमलेक्षण ! इस चातुरात्म्य को द्वितीय ‘सुषुप्ति’ व्यूह का लक्षण समझना चाहिए ॥ ८२-८३ ॥ नित्यं नित्याकृतिधरं तेजसा सूर्यवर्चसम् । भिन्नं सितादिभेदेन चोर्ध्वाधः संस्थितेन च ॥ ८४ ॥ कैवल्यभोगफलदं भवबीजक्षयङ्करम् । चातुरात्म्यं तृतीयं तु सुधासन्दोहसुन्दरम् ॥ ८५ ॥ स्वप्नव्यूहलक्षणमाह—नित्यमिति द्वाभ्याम् ॥ ८४-८५ ॥ जो नित्य नित्य-आकृति धारण करने वाला, तेज में सूर्य के समान तेजस्वी, सितादि भेद से भिन्न, नीचे-ऊपर सर्वत्र संस्थित, मोक्ष एवं भोग उभय रूप फल देने वाला, संसार बीज को क्षय करने वाला तथा सुधा सन्दोह के समान सुन्दर है, वह तृतीय चातुरात्म्य ‘स्वप्नव्यूह’ का लक्षण है ॥ ८४-८५ ॥ स्थित्युत्पत्तिप्रलयकृत् सर्वोपकरणान्वितम् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय समुदेत्यस्तमेति च ॥ ८६ ॥ चतुर्थं विद्धि तद् यस्य विश्वं तिष्ठति शासनात् । धत्ते सितादिकं रूपं चतुर्धा यत् कृते युगे ॥ ८७ ॥ रक्ताद्यं सितनिष्ठं च त्रेतायां हि महामते । पीतं कृष्णं सितं रक्तं सम्प्राप्ते द्वापरे युगे ॥ ८८ ॥ कलौ कृष्णं सितं रक्तं पीतं चानुक्रमेण तु । जाग्रद्व्यूहलक्षणं तस्य युगभेदेन वर्णभेदं चाह—स्थित्युत्पत्तीत्यादिभिर्विभागो- ऽत्रावधार्यत इत्यन्तैः । लक्ष्मीतन्त्रेऽप्येवमेवोपबृंहितानि व्यूहलक्षणानि— वह्न्यर्केन्दुसहस्राभमानन्दास्पदलक्षणम् ॥ बीजं सर्वक्रियाणां तद् विकल्पानां तदास्पदम् ।

पञ्चमः परिच्छेदः ६५ सौषुप्तं चातुरात्म्यं तत् प्रथमं विद्धि वासव ॥ अथ स्वापपदे ह्येवं विभज्यात्मानमात्मना । देवः प्रागादिभेदेन वासुदेवादिरूपतः ॥ समासव्यासभेदेन गुणानां पुरुषोत्तमः । सितरक्तसुवर्णाभ्रसदृशैः परमाद्भुतैः ॥ आदिमूर्तिसमै रूपैश्चतुर्धा ह्यवतिष्ठते । कैवल्यभोगफलदं भवबीजक्षयङ्करम् ॥ चातुरात्म्यं द्वितीयं तत् सुधासंदोहसुन्दरम् । अथ जाग्रत्पदे देवः सितरक्तादिभेदितैः ॥ चतुर्भुजैरुदाराङ्गैः शङ्खचक्रादिचिह्नितैः । नानाध्वजविचित्राङ्गैर्वासुदेवादिंसंज्ञितैः ॥ व्यूहैः सम्प्रविभज्यास्ते विभुर्नाम स्वलीलया । जाग्रत्पदे स्थितं देवं चातुरात्म्यमनुत्तमम् ॥ स्थित्युत्पत्तिप्रलयकृत् सर्वोपकरणान्वितम् । सर्वं तच्चिन्तयेत्तस्य विश्वं तिष्ठति शासने ॥ त्रिविधं चातुरात्म्यं तु सुषुप्त्यादिपदत्रिके । सुव्यक्तं तत्पदे तुर्ये गुणलक्ष्यं परं स्थितम् ॥ इति ॥ —लक्ष्मी० ८६-९२ (१०।२०-२७, ४०-४२) अब 'जाग्रद्व्यूह' का लक्षण युग भेद से एवं वर्ण भेद से होता है, इस बात को कहते हैं—जो स्थिति, उत्पत्ति तथा प्रलय करने वाला है, सभी सृष्टि के उपकरणों से समन्वित है, अपनी प्रकृति पर स्थित हो कर उत्पन्न होता है और अस्त होता है। सारा विश्व जिसके शासन में रहता है, उसे चतुर्थव्यूह (जाग्रद्व्यूह) समझना चाहिए। जिसके शासन में यह सारा विश्व स्थित है, वह विष्णु कृतयुग में सित, रक्त, पीत तथा नील चारों वर्णों को धारण करते हैं। हे महामते! त्रेता में वह विष्णु रक्त वर्ण वाले और श्वेत पीत वर्ण धारण करते हैं। द्वापर में वही पीत कृष्ण, सित, रक्त वर्ण धारण करते हैं तथा कलि में कृष्ण, सित, रक्त और पीत वर्ण धारण करते हैं ॥ ८६-८९ ॥ युगसन्ध्याचतुष्के तु बिभर्ति परमेश्वरः ॥ ८९ ॥ विभिन्नमूर्तिसामान्यं रूपं यत् तन्निबोध मे । सितरक्तं कृतान्ते तु रक्तपीतमतः परम् ॥ ९० ॥ पीतकृष्णं च तदनु कृष्णशुक्लमन्तरम् । वह परमेश्वर चारों युगों की सन्ध्या में विभिन्न रूप में होकर जिस प्रकार सामान्य रूप धारण करते हैं। हे सङ्कर्षण! अब उसे सुनिए—सत्ययुग के अन्त में वह श्वेत रूप, उसके बाद त्रेता के अन्त में वह रक्त पीत, उसके बाद द्वापर के

६६ सात्वतसंहिता अन्त में वह पीत कृष्ण, इसके बाद कलियुग के अन्त में वह कृष्ण शुक्ल रूप धारण करते हैं ॥ ८९-९० ॥ भेदः प्रागुदितैर्ज्ञेय आयुधाम्बरलाञ्छनैः ॥ ९१ ॥ समत्वादन्यथा केन विभागोऽत्रावधार्यते । प्राक् उदीयमान आयुध एवं अम्बर (=वस्त्र) के लाञ्छनों (= चिन्हों) से कलि भेद समझना चाहिये अन्यथा काल के समान होने से कौन उसके भेद का निश्चय कर सकता है ॥ ९१-९२ ॥ वर्णकालस्थानभेदेन वासुदेवादिनां ध्यानकथनम् युगाब्ददिनरात्र्यर्थप्रहराणां क्रमेण तु ॥ ९२ ॥ विभागकल्पनं कृत्वा नित्यमालक्ष्य वै प्रभुम् । देहेऽस्मिन् मूर्ध्नि हृदये नाभौ तु तदधः पुनः ॥ ९३ ॥ तस्मादामूर्धपादान्तं भूतये मुक्तयेऽन्यथा । ग्रीवांसजानुगुल्फेषु स्मरेत् सन्ध्युक्तलक्षणम् ॥ ९४ ॥ वासुदेवादिनां स्मरणस्य कालभेदान् साधकशरीरे स्थानभेदांश्चाह—युगाब्देति त्रिभिः । आलक्ष्य ध्यात्वेत्यर्थः । भूतये ऐश्वर्याय । मुक्तये मोक्षाय । एवं च धाम- चतुष्टयं मूर्धादिचतुःस्थानेषु क्रमेण वासुदेवादि(नां?न्) स्मरतामैहिकं लौकिकं फलम्, पुनः प्रातिलोम्येन नाभेरधस्तादारभ्य मूर्द्धान्तं स्थानचतुष्टयेऽनिरुद्धादिवासुदेवान्तान् स्मरतां मूर्तिरूपं फलं च सिध्यतीति भावः । सन्ध्युक्तलक्षणं युगसन्धिभेदेन गृहीत- सितरक्तादिशबलरूपं वासुदेवादिचतुष्टयमित्यर्थः ॥ ९२-९५ ॥ अब वासुदेव के स्मरण का स्थान साधक के शरीर में कब और कहाँ होता है इस बात को कहते हैं—युग, वर्ष, दिन-रात, दोपहर आदि के क्रम से विभाग की कल्पना कर वहाँ प्रभु को स्मरण करे । इसी प्रकार इस देह में भी शिर, हृदय, नाभि तथा उसके नीचे के भाग में वासुदेव का स्मरण करने से ऐहिक पारलौकिक दोनों प्रकार का फल प्राप्त होता है । इसलिये मुक्ति तथा मूर्ति के लिये शिर से लेकर पादान्त भगवत्स्मरण करे । ग्रीवा, अंस, जानु तथा गुल्फ में तथा युगादि सन्धियों में उक्त लक्षण का स्मरण करे ॥ ९२-९४ ॥ सृष्टिंसंहारयोगेन यः स याति परां गतिम् । इत्येकमूर्तेर्व्यूहानां विभवस्याखिलस्य च ॥ ९५ ॥ जो इस प्रकार सृष्टि क्रम से तथा संहार क्रम से भगवान् का स्मरण करता है, वह वैष्णव परमगति को प्राप्त करता है ॥ ९५ ॥ अवतारस्तथा ध्यानमर्चनं मन्त्रपूर्वकम् । स्वपदस्थानभेदेन प्रोक्तमेकसमाधिना ॥ ९६ ॥

पञ्चमः परिच्छेदः ६७ उक्तमर्थं निगमयति—इतीति सार्धेन । एकमूर्तेः परात्परवासुदेवस्य व्यूहानां विभवस्य वासुदेवादीनां तुर्याद्यवस्थाभेदस्येत्यर्थः ॥ ९५-९६ ॥ इस प्रकार एक मूर्ति, परात्पर भगवान् वासुदेव के व्यूहों का तथा उनके विभवों का और तुर्यावस्था भेद का अवतार, मन्त्रपूर्वक ध्यान एवं अर्चन स्वपदस्थान के भेद से यहाँ एक समाधि के द्वारा कहा गया है ॥ ९५-९६ ॥ चातुरात्म्यसमाराधनोपसंहारः विशेषोऽप्यथ भेदाख्यस्त्ववतारपुरस्सरः । भावस्थितिविधौ चैव सर्वेषामधुनोच्यते ॥ ९७ ॥ एतेषां विशेष उच्यत इत्याह—विशेष इति ॥ ९७ ॥ अब सब के कल्याण के लिये भावस्थिति की विधि में अवतार पुरःसर विशेषताओं को बतलाया जा रहा है ॥ ९७ ॥ षाड्गुण्यमादिदेवाद्यं चातुरात्म्यमलाञ्छनम् । सृष्टये त्रितयं ह्येतत् सामर्थ्यं पारमेश्वरम् ॥ ९८ ॥ लोलीभूतमभेदेन स्मरेत् तुर्यात्मना पुरा । नित्योदितं च सुपदे स्थितमस्पन्दलक्षणम् ॥ ९९ ॥ विशेषमाह—षाड्गुण्यमिति द्वाभ्याम् । पारमेश्वरं सामर्थ्यं सामर्थ्यशक्तिरूपम्, एतत्तितयं सुषुप्त्यादिव्यूहत्रयम्, सृष्टये सृष्ट्यर्थं लोलभूतं स्मरेत् । अस्पन्दलक्षणम् अलोलभूतम्, नित्योदितं परात् परं भगवन्तमेव तुर्यात्मना तुर्यव्यूहरूपेण, अभिन्नं स्मरेदित्यर्थः ॥ ९८-९९ ॥ आदिदेव में रहने वाला, पहला षाड्गुण्य, दूसरा चातुराम्य लक्षण तथा तीसरा परमेश्वर की सामर्थ्य—ये तीन (सुषुप्त्यादिव्यूहमय) सृष्टि के लिये स्पन्दन करने वाले हैं । इनका स्मरण करे, इसके अतिरिक्त अस्पन्द लक्षण (अलोली- भूत स्थिर) एवं नित्योदित परात्पर भगवान् को तुर्यव्यूह रूप से अभिन्न विग्रह का भी स्मरण करे ॥ ९८-९९ ॥ भगवदवतारक्रमः अथार्चितुं यमिच्छेत्तु विशेषव्यक्तिलक्षणम् । सङ्कल्प्य तं स्वबुद्ध्या तु तत्कालसमनन्तरम् ॥ १०० ॥ ध्रुवा सामर्थ्यशक्तिर्वै स्पन्दतामेति च स्वयम् । सूतेऽग्निकणवन्मन्त्रं यत्र मन्त्री कृतास्पदः ॥ १०१ ॥ तमागतमिवाकाशात् तारकं कर्णिकान्तरे । भावयेदथ तन्मध्यादाराध्यमुदितं स्मरेत् ॥ १०२ ॥

६८ सात्वतसंहिता आदिमूर्तिस्वरूपेण चतुर्मूर्तिमयेन वा। पृथक्त्वेन चतुर्मूर्तेरेकैकाकृतिनाऽप्यथ ॥ १०३ ॥ अथवा वैभवीयेन नानाकृत्यात्मना तु वै। अङ्गसङ्घं तदीयं च न्यसेत् पद्मदलाश्रितम् ॥ १०४ ॥ परिवारं बहिः पद्मात् स्वकं यो यस्य विद्यते । अर्चनार्थं भगवदवतरणक्रममाह—अथेति सार्धैः पञ्चभिः । यः साधको विशेष- व्यक्तिलक्षणं परव्यूहविभवाख्यंतत्तन्मूर्तिविशिष्टं भगवन्तमर्चितुमिच्छेत्, तं साधकं स्वबुद्ध्या संकल्प्य स्वाभिमुखं ज्ञात्वा तत्कालसमनन्तरं तदिच्छानन्तरमेव सामर्थ्यशक्तिः स्वयमेव स्पन्दतामेति । मन्त्री साधकः, यत्र कृतास्पदः, यन्मन्त्रमिच्छति तन्मन्त्रमग्नि- कणवत् सूते च । तत्स्पन्दनमात्रेणाऽग्नेः, स्फुलिङ्गवन्मन्त्रः समुद्भूतो भवतीति भावः । तन्मन्त्रमाकाशात् तारकमिव कर्णिकान्तरे हृत्कमलकर्णिकामध्ये आगतं भावयेत् । तन्मध्यात् मन्त्रमध्यात्, आराध्यं मन्त्रनाथम्, आदिमूर्तिस्वरूपेण परवासुदेवरूपेण । यद्वा चतुर्मूर्तेर्व्यूहस्य पृथक्त्वेन, एकैकाकृतिना केवलमेकैकमूर्तिरूपेण, आहोस्वित्नानाकृ- त्यात्मना वैभवीयेन रूपेण पद्मनाभादिभेदेन, उदितम् उत्पन्नं स्मरेत् ॥ १००-१०५ ॥ अब अर्चन के लिए भगवान् के अवतार का क्रम कहते हैं—जो वैष्णव साधक विशेष व्यक्तिलक्षण परव्यूहविभव नामक उन-उन मूर्तिविशिष्ट भगवान् के विग्रह की अर्चना करना चाहते हैं, उस साधक को अपनी बुद्धि से उन विभवावतारों की कल्पना मन में करके उन्हें अपने सन्मुख हुआ समझकर उसी समय अर्चना की इच्छा मन में होते ही सामर्थ्यशक्ति स्वयमेव मन में स्पन्दित हो जाती है । वैष्णव मन्त्रज्ञ साधक जहाँ कहीं भी उन विभवावतार का सान्निध्य (= आस्पद) चाहता है वहीं पर, मन्त्र रूप अग्नि कण के समान उन्हें उत्पन्न कर लेता है अर्थात् जैसे अग्नि की छोटी सी चिनगारी प्रज्वलित अग्नि बना देती है वैसे ही साधक मन्त्र रूप चिनगारी से उन्हें प्रकट कर देता है । उस मन्त्र रूप आकाश के मध्य तारों के समान हृत् कमल रूप कर्णिका के मध्य में साधक उनकी भावना करे । वह यह भावना करे कि आराध्य मन्त्र के देवता आदि मूर्ति पर वासुदेव रूप से हृत्कमल की कर्णिका में उसी प्रकार प्रगट हो गए हैं जैसे आकाश में तारे प्रगट हो जाते हैं । साधक यदि इच्छा करे तो चतुर्व्यूह में से एक-एक आकृति का एक-एक मूर्ति रूप से स्मरण करे अथवा पद्मनाभादि विभवावतारों में से जिनको चाहे उन्हें स्मरण कर उत्पन्न कर लेवे । इस प्रकार उन स्मृत देवता के अङ्ग-समूह का पद्मदल में न्यास करे । उन स्मृत देवता के जो परिवार हों उन्हें पद्म के बाहर न्यास करे ॥ १००-१०५ ॥ सशक्तिकस्य मन्त्रस्य दिक्क्रमेण हृदादि यत् ॥ १०५ ॥ न्यसेत् केसरजालस्थं पत्रमध्ये तु शक्तयः ।

पञ्चमः परिच्छेदः ६९ (निः? स) शक्तिकस्य मन्त्रस्य प्रागादिदलेषु हृदयाद्यङ्गमन्त्रन्यासं कमलाद् बहिस्तत्तत्परिवारन्यासं चाह—सशक्तिकस्येति । एवं दलेषु लक्ष्यादिशक्तिन्यास- नियमस्य प्रायिकत्वं बोध्यम् । यतोऽत्रैव त्रयोदशे परिच्छेदे— षट्कं केसरजालस्थं तत्र प्राक् पश्चिमे द्वयम् ॥ द्वयं द्वयं सौम्ययाम्ये तासां वामकरेषु च । —(सात्वत० १३।५२-५३) इति केसरस्थानेऽपि शक्त्यवस्थानमुक्तम् । सप्तदशपरिच्छेदेऽपि— नेमिभागे श्रियं देवीं पुष्टिमुत्तरतो न्यसेत् । पृष्ठदेशे स्थितां निद्रामग्रभागे सरस्वतीम् ॥—(सात्वत० १७।७०) इति कमलाद् बहिरपि शक्तिन्यास उक्तः । किञ्च, सात्वतोपबृंहणे ईश्वरे पारमेश्वरे च— 'देवस्य कर्णिकायां तु श्रियं पुष्टिं ततोऽपरे' (ई०सं० ४।७९; पा०सं० ६।२४९) इति कर्णिकायामपि देवस्य पार्श्वद्वये शक्त्यर्चनमुक्तम् ॥ १०५-१०६ ॥ अब पहले पद्म के आदि दलों में शक्ति के सहित हृदयाद्यङ्गमन्त्रों का न्यास एवं कमल के बाहर उनके परिवार का न्यास कहते हैं—केशर स्थान में शक्ति का अवस्थान कहा गया है । अतः पूर्व से आरम्भ करके दो-दो शक्तियों का पत्र के मध्य में न्यास करे ॥ १०५-१०६ ॥ निःशक्तिको निरङ्गो यो मन्त्रनाथस्तु केवलः ॥ १०६ ॥ शब्दमात्रेण तं भूयो दलजालगतं यजेत् । निःशक्तिकत्वनिरङ्गकत्वोभयविशिष्टस्य भगवतस्तु केवलमन्त्रमात्रेण भाग- स्थानेऽप्यर्चनमाह—निःशक्तिक इति ॥ १०६-१०७ ॥ शक्ति रहित एवं निराकार उभय विशिष्ट भगवान् का अर्चन केवल मन्त्र मात्र से कमल निर्देशित भागस्थान पर करना चाहिए ॥ १०६-१०७ ॥ इत्येवमन्तर्यागस्तु देवस्य परमात्मनः ॥ १०७ ॥ समासेनोदितः सम्यगथ मूर्तेर्यजेद् बहिः । उक्तमर्थं निगमयति—इतीति ॥ १०७-१०८ ॥ इस प्रकार परमात्मा विष्णु देव के अन्तर्याग का विधान संक्षेप से किया गया है । अब मूर्ति का पूजन बाहर करना चाहिए इसे कहते हैं ॥ १०७-१०८ ॥ बहिर्यागोपक्रमः वेद्यां पुराहृतैर्भोगैर्बिम्बे वा चक्रपङ्कजे ॥ १०८ ॥ हेमादिद्रव्यजनिते चक्रे वा केवलाम्बुजे ।

७० सात्वतसंहिता भद्रपीठभुवो मध्ये सुशलक्षणे केवल तु वा ॥ १०९ ॥ ध्यात्वा ध्यात्वा स्वमन्त्रेण ह्यपवर्गफलाप्तये । समर्चनीयं विधिवच्छ्रद्धाभक्तिपुरस्सरम् ॥ ११० ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां जाग्रत्यूहसमाराधनं नाम पञ्चमः परिच्छेदः ॥ ५ ॥ — ❦ ꕤ ❧ — बहिर्यागस्थानान्याह—वेदामित्यादिभिः ॥ १०८-११० ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये पञ्चमः परिच्छेदः ॥ ५ ॥ — ❦ ꕤ ❧ — बहिर्याग का उपक्रम करते हैं—पहले से आहत भोगों द्वारा वेदी पर अथवा बिम्ब में या चक्रपङ्कज में पूजन करे । अथवा स्वर्ण निर्मित चक्र में या केवल कमल दल पर ही अर्चन करे । सुन्दर लक्षण वाले भद्रपीठ पर भी यजन किया जाता है । इस प्रकार अपवर्ग रूप फल की प्राप्ति के लिए वैष्णव साधक अपने इष्ट देव की पूजा भक्तिपूर्वक अपने मन्त्र से करे ॥ १०८-११० ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के जाग्रत्यूहसमाराधन नामक पाँचवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ ५ ॥ — ❦ ꕤ ❧ —

षष्ठः परिच्छेदः चातुरात्म्यबाह्याराधनम् नारद उवाच वक्ष्ये विप्रवराः सम्यग् य रक्तश्चक्रपाणिना । प्रसङ्गाद् बलदेवस्य द्रव्ययागोऽप्यनन्तरम् ॥ १ ॥ अथ षष्ठो व्याख्यास्यते । बहिर्यागं वक्ष्य इत्याह—वक्ष्य इति । द्रव्ययागः द्रव्यैरर्घ्यादिभिः क्रियमाणो यागः । बाह्याराधनमित्यर्थः ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—भगवान् चक्रपाणि ने प्रसङ्ग उपस्थित होने पर बलदेव से इसके बाद बाह्यसाधनभूत द्रव्ययाग (= बहिर्याग) इस प्रकार कहा ॥ १ ॥ भद्रपीठशोधनविधानम् श्रीभगवानुवाच यत्किञ्चित् पत्रपुष्पाद्यं परिदृश्येत पीठगम् । पाणिना तत्समाहृत्य शुचिस्थाने निधाय वै ॥ २ ॥ गव्यैर्वा चामरैर्वालैः शिखिपक्षैः कुशैरथ । संमार्ज्य भद्रपीठं तु वाससा सुसितेन वा ॥ ३ ॥ बहुना वस्त्रपूतेन वारिणा तदनन्तरम् । प्रक्षाल्य द्वादशार्णेन प्रणवाद्यन्तकेन तु ॥ ४ ॥ आदौ भद्रपीठशोधनप्रकारमाह—यत्किञ्चिदिति त्रिभिः । पत्रपुष्पाद्यं = पूर्वदिने भगवद्भुक्ततुलसीपत्रादिकमित्यर्थः । प्रणवाद्यन्तकेन = प्रणवसम्पुटितेनेत्यर्थः । द्वाद- शार्णेन = वासुदेवद्वादशाक्षरेणेत्यर्थः । एवं भद्रपीठशोधनादिकस्य कालान्तरकर्तव्य- त्वमप्युक्तमीश्वरपारमेश्वर्योः— यद्वा प्राग्यागभवनप्रवेशानन्तरं द्विजाः ॥ न्यस्य भद्रासनाद्यन्तमन्यदन्यत् समाचरेत् । यद्वा तदातने काले न्यस्य भद्रासनं ततः ॥ आद्यं मार्गत्रयं कृत्वा यथोक्तविधिना ततः । योगपीठार्चनारम्भे बिम्बोक्तं सर्वमाचरेत् ॥ इति ॥ २-४ ॥ —(ई०सं० ३।१६-१८; पा० सं० ६।३२-३४)

७२ सात्वतसंहिता श्रीभगवान् ने कहा—पूर्व दिन में भद्रपीठ पर भगवान् की आराधना के लिये निवेदित तुलसीपत्रादि को साधक हाथ से उठाकर किसी पवित्र स्थान पर स्थापित कर देवें, अथवा गोपुच्छ, चामर, बाल, मयूरपुच्छ अथवा कुशा से सम्मार्जित कर देवे, अथवा अत्यन्त सुन्दर स्वच्छ वस्त्र से झाड़, पोंछकर भद्र पीठ को शुद्ध कर लेवे । फिर वस्त्र से छाने हुए जल द्वारा प्रणव सम्पुटित द्वादशाक्षर मन्त्र से उस भद्रपीठ का प्रक्षालन करे ॥ २-४ ॥ चक्रराजार्चनविधानम् सर्वलोकमयं तत्र सर्वदेवसमाश्रयम् । सर्वाधारमयं ध्यायेदन्तर्लीनं तु चक्रराट् ॥ ५ ॥ प्रणवेन स्वनाम्नाऽथ नमोऽन्तेनार्चयेच्च तम् । अर्घ्यालिभनधूपैस्तु माल्यैर्नानास्रगुद्भवैः ॥ ६ ॥ भद्रपीठान्तर्लीनचक्रराजार्चनमाह—सर्वलोकमयमिति द्वाभ्याम् । चक्रराट् = चक्रराजमित्यर्थः । विभक्तिविनिमयश्छान्दसः । आलभनम् = आलभ्यते आलिप्यते- ऽऽनेनाङ्गमित्यालभनं गन्धः । नानास्रगुद्भवैः नानाविधाः स्रजामुद्भवा रचनाविशेषा येषां तैः, द्विसरत्रिसरादिभेदेन नानारूपस्वररचनाविशिष्टैरिति यावत् । अथवा नाना- विधपुष्पजनितैरित्यर्थः । स्रक्शब्दस्य केवलपुष्पमात्रपरत्वं ज्ञेयम् । यत एवमुत्तर- त्राप्यग्निकार्यप्रकरणे 'स्रग् धूपं मधुपर्कं च' (सात्वत० ६।९८, १४८) इत्यत्र स्रक्शब्दस्य पुष्पमात्रपरत्वमङ्गीक्रियते । ननु तत्रापि स्रक्शब्दस्य मालिकापरत्वे कः प्रत्यवाय इति चेदुच्यते, किमा- वयौर्विवादेन, लक्ष्मीतन्त्रे—'ततः पुष्पमयीं दद्याद् धूपद्रव्यमयीं तथा' (ल० ४०।६८) इति स्रक्शब्दस्य पुष्पपरत्वेन महालक्ष्म्यैव व्याख्यातत्वात्, ततो माल्यमयीं दद्यादित्य- नुक्तेः । किञ्च, सात्वतोपबृंहणे ईश्वरे पारमेश्वरे च होमद्रव्यविवरणप्रकरणे— 'सुगन्धैः स्थलपद्माद्यैः पुष्पैश्चैव सितादिकैः' । इति । —(ई० सं० ५।२०६; पा० सं० ७।१६९) तर्पितः स्थलपद्माद्यैः पुष्पैश्चान्यैः सितादिकैः ॥ सौभाग्यमतुलं विप्रा अचिरादेव यच्छति । —(ई० सं० ५।२१६-२१७; पा० सं० ७।१८०) इति च केवलपुष्पमात्रोक्तेः । किञ्च, पाद्मेऽपि आहुतिप्रमाणनिरूपणप्रकरणे— 'फलैः पुष्पैरखण्डितैः' इति पुष्पाणामखण्डितत्वमात्रलक्षणोक्तेः, केवलपुष्पैरेव होम- सम्प्रदायाच्च स्रक्शब्दः पुष्पमात्रपरो बोध्यः । किञ्च, 'स्रग्दामसूत्रसम्बद्धमाकर्णा- च्चरणावधि' (६।५५) इत्यलङ्कारासनप्रकरणे वक्ष्यमाणं वाक्यमप्यत्रानुकूलं ज्ञेयम्, एषामेव श्लोकानां पारमेश्वरेऽपि प्रतिपादितत्वात् । तद्व्याख्याने तु—'नानास्रगुद्ध- वैर्माल्यैः, नानाविधस्रजामुद्भवहेतुभूतैः पुष्पैः', 'माल्यं पुष्पे च दामनि' (६।३।२५) इति वैजयन्ती' इति लिखितम् । तदस्वरसम्, विशेषणस्य वैयर्थ्यात्; मालिकादिभिः

षष्ठः परिच्छेदः ७३ पीठार्चने प्रत्यवायाऽभावाच्च । अस्मिन्नवसरे नृसिंहकल्पवक्ष्यमाणरीत्याऽनन्तादिपीठ- देवानाम्प्यर्चनं कार्यम् ॥ ५-६ ॥ फिर सर्वलोकमय एवं समस्त देवों के आश्रयभूत, सर्वाधारमय, अन्तर्लीन चक्रराज का ध्यान करे । 'चक्रराट्' द्वितीया के स्थान में प्रथमा का प्रयोग आर्ष समझना चाहिये ॥ ५ ॥ फिर प्रणव के साथ चक्रराज को चतुर्थ्यन्त कर अन्त में नमः लगा कर (ॐ चक्रराजाय नमः) इस मन्त्र से उन चक्रराज का अर्घ्य, गन्ध, धूप एवं नाना प्रकार के पुष्प माल्य द्वारा अर्चन करे ॥ ६ ॥ ततः कुम्भचतुष्कं तु हेमादिद्रव्यनिर्मितम् । गालितेनाम्भसा पूर्णं स्रगाद्यैरप्यलङ्कृतम् ॥ ७ ॥ गन्धसर्वोषधीरत्नफलबीजकुशोदकम् । बहिःकोणचतुष्के तु न्यसेदाधारपृष्ठगम् ॥ ८ ॥ ॐ अर्घ्यं कल्पयामीति ह्युक्त्वा वायुपदे न्यसेत् । कलशं तद्वदैशान्यां न्यसेदाचमनार्थतः ॥ ९ ॥ स्नानार्थमग्निकोणे तु पाद्यार्थं नैर्ऋते तथा । अथ पात्रपरिकल्पनमाह—तत इति सार्धैस्त्रिभिः । अत्र गन्धसर्वोषधीरत्नफल- बीजकुशादिकमित्यर्थ्यादीनां चतुर्णामित्यविभागेन द्रव्याण्युक्तानि । एषां विभागस्त्व- ष्टादशपरिच्छेदे (६४-६८ श्लो०) वक्ष्यमाणो ज्ञेयः । तथा चेश्वरपारमेश्वरयोः— आधारोपरि पात्राणि स्वपूर्वनियमेन तु । वायव्यादिषु विन्यस्य तत्तत्कल्पनमन्त्रतः ॥ इति ॥ —(ई० सं० ३।२६-२७; पा० सं० ६।३७) किञ्च, अत्रार्घ्यादीनां चतुर्णामेवोक्तत्वेऽप्यष्टादशपरिच्छेदे (७०-७६ श्लो०) वक्ष्यमाणं द्वितीयार्घ्यमपि ग्राह्यम्, तस्य पीठार्चनाद्युपयुक्तत्वात् । अत्र पात्रपरिकल्पनात् पूर्वमेव पीठान्तर्लीनचक्रराजार्चनोक्तावपि पाठक्रमादर्थक्रमस्य बलीयस्त्वेन तत् तद- नन्तरमेव ग्राह्यम् । तथा वक्ष्यति सप्तदशे परिच्छेदे— पुष्पैस्थार्घ्यपात्रं तु मन्त्रैः सम्पूज्य निष्कलैः । पात्रे परस्मिंस्तस्माद्वै स्तोकमुद्धृत्य चोदकम् ॥ योगपीठार्चनं कुर्यादनुसंधानपूर्वकम् । —(सात्वत० १७।५२-५३) इति ॥ ७-१० ॥ इसके बाद सुवर्णादि द्रव्यों द्वारा निर्मित, वस्त्र से छाने हुए जल से परिपूर्ण, माला आदि से अलङ्कृत, गन्ध, सर्वौषधि, रत्न, फल, बीज, कुशा और अर्घ्य जल से युक्त कर आधार पृष्ठ पर स्थापित उन कलशों के बाहर के चारों कोणों पर उन्हें स्थापित करे ॥ ७-८ ॥ सा० सं० - 9

७४ सात्वतसंहिता

'ॐ अर्घ्यं कल्पयामि' यह मन्त्र पढ़कर प्रथम कलश को वायव्यकोण में स्थापित करें। इसी प्रकार 'ॐ आचमनार्थं कल्पयामि' इस मन्त्र को पढ़कर ईशान कोण में दूसरा कलश स्थापित करे। इसी प्रकार 'ॐ स्नानार्थं कल्पयामि' इस मन्त्र को पढ़कर तीसरा कलश अग्निकोण में स्थापित करे। फिर पाद्यार्थं कल्पयामि इस मन्त्र को पढ़कर नैर्ऋत्य कोण में चौथा कलश स्थापित करे ॥ ९-१० ॥ अथ मङ्गलकुम्भानामुपकुम्भसमन्वितम् ॥ १० ॥ चतुष्कं विन्यसेद् बाह्ये दिक्क्रमेण सुपूजितम् । अथ परितः कलशाष्टकस्थापनमाह—अथेति । उपकुम्भसमन्वितम्, विदिक्षु स्थापनीयैश्चतुर्भिः कलशैः सहितमित्यर्थः । अथवा नृसिंहकल्पपरिच्छेदे शान्तिकादि- प्रकरणेषु वक्ष्यमाणरीत्योपस्थापनीयैश्चतुर्भिरुपकुम्भैः समन्वितमित्यर्थः । मङ्गल- कुम्भानां चतुष्कं प्रागुदीरितं (सात्वत० ६।७) चतुर्दिक्षु स्थापनीयकलशचतुष्टय- मित्यर्थः ॥ १०-११ ॥ इसी प्रकार मङ्गल कुम्भ के समीप बाहर के चारों दिशाओं में क्रमशः पूर्व की भाँति सुपूजित चार उपकुम्भ भी स्थापित करे ॥ १०-११ ॥ भगवद्विम्बपूर्वं तु यागाङ्गं प्रागुदीरितम् ॥ ११ ॥ एकं सुलक्षणं तत्र ततो मध्येऽवतार्य च । तत्कलशाष्टकमध्ये भगवद्विम्बाद्यन्यतमस्थापनमाह—भगवदिति । प्रागुदीरितं (षष्ठा? पञ्चमा) ध्यायान्ते उक्तमित्यर्थः । भद्रपीठोपरि केवलचरबिम्बाद्यर्चनप्रकरणे । एवं परितः कलशाष्टकस्थापनं कार्यम् । स्थिरबिम्बार्चनविषये तु तदप्रकृतम् । अत एव ईश्वरपारमेश्वरयोर्नोक्तं च ॥ ११-१२ ॥ इस प्रकार ८ कलशों की स्थापना बहिर्याग में कही गई । बहिर्याग के अङ्गभूत भगवद् बिम्ब के विषय में पहले कह दिया गया है (द्र. पञ्चमाध्याय के अन्त में) । उन आठ कलशों के मध्य में सुलक्षण भगवद् बिम्ब की स्थापना करनी चाहिए ॥ ११-१२ ॥ बिम्बशोधनकथनम् भुक्तमर्घ्यादिकं तस्मादपनीयाभिवन्द्य च ॥ १२ ॥ उशीरवंशकूर्चेन क्षालयेदम्भसा ततः । बिम्बशोधनमाह—भुक्तिमिति । भुक्तमर्घ्यादिकं पूर्वदिने, यद्वाऽभिगमणार्चन- काले भगवद्भुक्तार्घ्यपुष्पादिकमित्यर्थः । उशीरवंशकूर्चेन लाम(ञ्छ?ज्जक)- पिञ्जुलेन ॥ १२-१३ ॥ बिम्बशोधन का प्रकार कहते हैं—पूर्व दिन में बिम्ब पर निवेदित भुक्त अर्घ्यादि पदार्थों को उशीर अथवा बाँस के कूँचे (झाडू) से हटा कर उसका अभिनन्दन करें। फिर स्वच्छ जल से सुलक्षण अर्घ्य पात्र का प्रक्षालन करे ॥ १२-१३ ॥

षष्ठः परिच्छेदः ७५ पुराङ्कितं तु चक्राद्यैर्यथाबद्धं तु वा शुभम् ॥ १३ ॥ सलिलेनार्घ्यपात्रं तु सम्पूर्याग्रे निधाय वै । तिलान् सुमनसस्तस्मिन् दूर्वाः सिद्धार्थकान् क्षिपेत् ॥ १४ ॥ चतुरावर्तयेन्मन्त्रं कृत्वा पाणितले स्थितम् । ततः सर्वगतं देवं मन्त्रमूर्तित्वमागतम् ॥ १५ ॥ समाहूय स्वमन्त्रेण त्वागच्छान्तपदेन तु । यथा सर्वगतो वायुर्व्यजनेन महामते ॥ १६ ॥ व्यक्तिमभ्येति भगवानाहूतस्तद्वदेव हि । भावदर्पणसङ्क्रान्तं कृत्वा हृत्कमलात्तु वै ॥ १७ ॥ सन्निरुध्य बहिर्वेद्यां मन्त्रोच्चारावसानतः । अथावाहनक्रममाह—पुराङ्कितमिति पञ्चभिः । चक्राद्यैरङ्कितमित्यनेन सुवर्णा- दिकं द्रव्यमयं पात्रमुच्यते । यथाबद्धं तु वेत्यनेन पलाशादिपत्रमयमुच्यते । तथा च जयाख्ये— अर्घ्यपात्रं समादाय सुवर्णरजतादिजम् ॥ शैलं मृद्दारुजं वाऽथ पलाशाम्बुजपर्णजम् । —(१३।६३-६४) इति । सलिलेन = प्रधानार्घ्यसलिलेनेत्यर्थः । यतः— आवाहने सन्निधाने सन्निरोधे तथार्चने ॥ विसर्जनेऽर्घ्यदानं तु प्राक्पात्रान्नित्यमाचरेत् । —(१८।७०-७१) इति वक्ष्यति । अर्घ्यपात्रम् आवाहनार्थं कृतं पृथक् पात्रमित्यर्थः । तथा च पाद्मे— आवाहितपदं पात्रं प्रक्षालितमथाम्बुभिः । पूरयेन्मूलमन्त्रेण हस्ताभ्यां च समुद्धरेत् ॥ ललाटसममेतस्मिन् अन्तरावाह्य केशवम् । इति ॥ सिद्धार्थकान् = श्वेतसर्षपानित्यर्थः । मन्त्रम् आगच्छपदसंयुक्तं तत्तन्मूर्तिमन्त्रमि- त्यर्थः । ‘समाहूय स्वमन्त्रेण त्वागच्छान्तपदेन तु' (सा० ६।१६) इत्युक्तत्वात् । तथा च पाद्मेऽपि—'चतुरुच्चारयेन्मन्त्रमागच्छपदसंयुतम्' इति । एवमावाहनकाले मन्त्रस्य चतुरुच्चारणं लक्ष्मीतन्त्रेऽप्युक्तम्—'तारकं चतुरुच्चार्य तारिकां तु त्रिरुच्चरेत् (३८।४) इति । ततः सर्वगतं देवमिति श्लोकेनोक्तस्यार्थस्यानुवादः कृतः । मन्दमतीनां भगव- दावाहने विस्रम्भजननार्थं यथा सर्वगतो वायुरिति दृष्टान्तकथनम् । एवमेव वक्ष्यति प्रतिष्ठाध्यायेऽपि— सर्वत्रगोऽसि भगवन् किल यद्यपि त्वा- मावाहयामि हि यथा व्यजनेन वायुम् ।

७६ सात्वतसंहिता गूढो यथैव दहनो मथनादुपैति आवाहतोऽपि हि तथा त्वमुपैषि चार्चाम् ॥ —(सा० २५।१२१) इति । भावदर्पणसंक्रान्तं कृत्वेत्यनेन— तमागतमिवाकाशात् तारकं कर्णिकान्तरे । भावयेदथ तन्मध्यादाराध्यमुदितं स्मरेत् ॥—(सा० ५।१०२) इत्युक्तार्थः स्मारितो भवति । वेद्यामिति पदं बिम्बाद्युपलक्षकम् । सन्निरुध्य पूजावसानिकां स्थितिं प्रार्थ्येत्यर्थः । अत्र सन्निधिसाम्मुख्यकरणमप्यपेक्षितमीश्वरादिषु ग्राह्यम् । मन्त्रोच्चारावसानतः तत्तन्मूलमन्त्रावसान इत्यर्थः । किञ्च— आवाहयामि लक्ष्मीशं परमात्मानमव्ययम् ॥ आतिष्ठतामिमां मूर्तिं मदनुग्रहकाम्यया । श्रिया सार्धं जगन्नाथो देवो नारायणः पुमान् ॥ —(ल० ३६।९४-९५) इति लक्ष्मीतन्त्रोक्तो मन्त्रश्चात्र प्रकृतः । नन्वेतच्छ्लोकपञ्चकस्याप्यावाहनपरत्वे पुराङ्कितमित्यादिश्लोकद्वयं सात्वतोपबृंहणेश्वरेपारमेश्वर्योः कुतो नोक्तमिति चेत्सत्यम्, तत्र— गन्धार्घ्यपुष्पैः सम्पूर्य मूलमन्त्रं समुच्चरन् । पीठोपरि हरेरग्रे मूर्ध्नि पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् ॥ —(ई०सं० ४।५९; पा०सं० ६।२२९) इत्यनेनैव तच्छ्लोकद्वयार्थः संगृहीतो भवतीति बोध्यम्, तदावाहनपात्रस्थार्घ्य- जलस्याञ्जलिद्वारेणैव बिम्बोपरि सेचनीयत्वात् । 'तिलान् सुमनसस्तस्मिन् दूर्वाः सिद्धार्थकान् क्षिपेत्' (६।१४) इत्युक्तस्य द्रव्यचतुष्टयप्रक्षेपस्य प्रधानार्घ्यजलपूरणेनैव चारितार्थ्याच्च । नन्वेवं तेनैव तद्द्रव्यचतुष्टयप्रक्षेपस्य चरितार्थ्ये सात्वते पुनः किमर्थं तदुपादान- मिति चेत्, सत्यम्— पाद्ये द्रव्यान्तरालाभे दूर्वा चार्घ्येऽथ सर्षपः । शस्तमाचमनीये तु तक्कोलं मार्जनाम्भसि ॥ इति पाद्मोक्तन्यायेनार्घ्यादिषु द्रव्यान्तरालाभेनेकैकद्रव्यप्रक्षेपेऽप्यावाहनार्घ्ये तिला- दीनां चतुर्णामपि प्रक्षेपसिद्ध्यर्थं पुनरुपादानमिति ज्ञेयम् । एवं चैवमावाहनं चरबिम्ब- कुम्भमण्डलाद्यर्चनविषयम्, न तु स्थिरबिम्बविषयम्, स्थितमायतने वाऽथ साकारं परमेश्वरम् । शङ्खचक्रधरं विष्णुं सुरसिद्धावतारितम् ॥ ऋषिभिर्मनुजैर्वाथ भक्तियुक्तैः प्रतिष्ठितम् । तन्मूर्त्तौ च स्वमन्त्रेण यजेदावाहनं विना । —(१३।५८-६०)

षष्ठः परिच्छेदः ७७ इति जयाख्योक्तेः, 'संस्थितेऽभिमुखीभावस्तदेवावाहनं हरेः' इति पाद्मोक्तेः, तथैवेश्वरपारमेश्वरयोः प्रतिपादितत्वाच्च ॥ १३-१८ ॥ तदनन्तर चक्रादि चिह्नों से अलङ्कृत तथा पलाशादि पत्रों से आबद्ध उस स्वर्ण के अर्घ्यपात्र को जल से पूर्ण करे । फिर अपने आगे स्थापित करे । उसमें तिल, पुष्प, दूर्वा एवं सिद्धार्थक (श्वेत सर्षप) डाल देवें ॥ १३-१४ ॥ फिर उस अर्घ्यपात्र को हाथ पर रख कर चार बार मन्त्र से उस जल का अवलोकन करे और ऐसी भावना करे कि सर्वव्यापक वह परमात्मा इस अर्घ्य के जल में मन्त्र मूर्ति के रूप में आ गये हैं ॥ १५ ॥ फिर उनके मन्त्र से आगच्छान्त पद से उनका इस प्रकार आवाहन करे 'जिस प्रकार सर्वगत वायु व्यजन के द्वारा प्रगट किया जाता है, उसी प्रकार सर्वगत हे विष्णो ! मैं आप का आवाहन करता हूँ । इस प्रकार हृदय कमल से निकाल कर उन प्रभु को भावदर्पण में संक्रान्त करे । फिर मन्त्रोच्चारण के अन्त में उन्हें वहाँ से हटा कर बाहर को वेदी में स्थापित करे ॥ १६-१८ ॥ मन्त्रमागच्छमानं तु निर्गतं तु स्वकात् पदात् ॥ १८ ॥ कालं पाद्यार्घ्यदानान्तमुत्थितं भावयेत् सदा । अथोपचर्यमाणं तं भोगैः कालानुकूलतः ॥ १९ ॥ स्नानालभनवस्त्रस्रग्दानेऽलङ्करणे तथा । अन्यत्र भोगपूजायां स्मरेत् पद्मासनादिना ॥ २० ॥ पुनस्तमेवोपविष्टं सानुकम्पं च सम्मुखम् । बिम्बं विनाऽन्यत्राधारे भवत्येवं महामते ॥ २१ ॥ केवलवेदिकुम्भमण्डलादिष्वावाहितस्य देवस्य तत्तदुपचारानुरोधेनावस्थानभेद- भावनमाह—मन्त्रमिति सार्धैस्त्रिभिः ॥ १८-२१ ॥ अपने पदों से निकल कर जब मन्त्र आने लगे तो, उस काल को पाद्य एवं अर्घ्यादि के निवेदन के लिये उचित समझकर, उसके निवेदन की भावना करे । इसी प्रकार पूजोपचार का भी उचित काल समझकर, कालानुकूल उन्हें स्नान, गन्ध, वस्त्र, पुष्प, माला एवं अलङ्कार द्वारा पूजा करे । योग पूजा से अतिरिक्त स्थिति में केवल पद्मासनादि से भगवान् का स्मरण कर लेवें ॥ १८-२० ॥ हे महामते! फिर साधक उन भगवान् को सानुग्रह अपने सम्मुख बैठा हुआ देखें । यह तब करे जब बिम्ब न हो, कोई और आधार हो तब ऐसा समझे ॥ २१ ॥ बिम्बाकृत्यात्मना बिम्बे समागत्यावतिष्ठते । करोत्यमूर्तामखिलां भोगशक्तिं तु चात्मसात् ॥ २२ ॥

७८ सात्वतसंहिता बिम्बे तादृशभावनाश्रम एव नास्ति, ब्रह्मरूपेण साक्षादेव भोगानङ्गीकरोती- त्याह—बिम्बाकृत्येति । तथा चोपबृंहितं लक्ष्मीतन्त्रेऽपि— कॢप्ते तु विग्रहे पूर्वं तथारूपोऽवतिष्ठते । भोगेषु दीयमानेषु शक्तिर्या मन्मयी परा ॥ तत्रस्था तां स्मरेत् साक्षादाददानो हरैर्यथा । —(३८।१६-१७) इति । यद्यपि पाद्मे बिम्बार्चनप्रकरणेऽपि— अर्घ्यवस्त्राम्बराकल्पपुष्पगन्धानुलेपनैः । प्रत्यर्चितं स्थितं ध्यायेत् पाद्याचमनयोः पुनः ॥ (तदानीं ध्यानं चोक्तं पाद्मे—) आसीनं स्नानकाले च पद्मासनसुखासनम् । नैवेद्यधूपदीपादावासीनं स्वस्तिकासने ॥ उपचारेषु चान्यत्र तत्तत्कर्मानुसारतः । स्थितमासीनमथवा देवं ध्यायेत पूजकः ॥ इत्युक्तम्, तथापि तत्कुम्भार्चनादिपरमेव । अथवा बिम्बस्यैव तथा ध्यानपरम्, नहि कुम्भादिष्विव तदन्तःस्थितभगवन्मात्रध्यानपरमिति ध्येयम् । अत्रापेक्षिता मन्त्रन्या- सलयभोगार्चनादयो बहवो विशेषा नृसिंहकल्पे वक्ष्यमाणा ग्राह्याः ॥ २२ ॥ बिम्ब में उस प्रकार की भावना का श्रम नहीं करना पड़ता, वह बिम्ब में साक्षात् ब्रह्म स्वरूप से अमूर्त्त भी सम्पूर्ण भोगशक्ति को स्वयं अङ्गीकार कर लेता है ॥ २२ ॥ विनिवेद्यासऽसनवरं समाहूतस्य वै प्रभोः । पादपीठं तु समान्यं मृद्वास्तरणभूषितम् ॥ २३ ॥ पाद्यार्घ्ये मधुपर्कं च तोयमाचमनीयकम् । अथासनाद्युपचारसमर्पणमाह—विनिवेद्येति सार्धेन । अत्र पाठक्रमं विहाय प्रथममर्घ्यम्, ततः पाद्यम्, तदनन्तरमाचमनीयम्, ततो मधुपर्कं च समर्पणीयम् । तत्रार्घ्यं पुष्पद्वारा भगवतो मूर्ध्नि देयम्, ‘अर्घ्यस्तृतीयाया देयो मूर्ध्न्यपिः कुसुमोद्भवताः’ (३६।१००) इति लक्ष्मीतन्त्रोक्तेः । तदानीं घण्टानादश्च कार्यः, ‘आवाहनार्घ्ये धूपे च दीपे नैवेद्यजोषणे’ (३।८३) इति, ‘घण्टाशब्दसमोपेतं दत्वाऽर्घ्यं मन्त्रमूर्धनि’ (४।१३४) इति चेश्वररादिषूक्तत्वात् । पाद्यं तु द्विवारं देयम्, ‘पाद्यदाने तु विप्रेन्द्र द्विर्दद्यात्तु पदाम्बुजे’ (१७।४६) इत्यनिरुद्धसंहितोक्तेः । इदानीं पाद्यप्रतिग्रहपादसंमा- र्जनवस्त्रपादानुलेपनान्यपि देयानि । आचमनं तु त्रिवारं समर्पणीयम् । तथा चोक्त- मनिरुद्धसंहितायाम्—‘आचामं च त्रिधा दद्याद् विमृश्य च सकृत्स्पृशेत्’ (१७।४८) इति । तदानीं ध्यानं चोक्तं पाद्मे— ध्यायेदाचमनीयस्य दानकाले जगद्गुरुम् ।

षष्ठः परिच्छेदः ७९ आचामन्तमिवाम्भोभिः साक्षादम्भःपरिग्रहे ।। इति । अत्राचमनानन्तरं गन्धपुष्पमालादीपधूपसमर्पणं मधुपर्कानन्तरं ताम्बूलनिवेदनं चेश्वरपारमेश्वरादिषूक्तं ग्राह्यम् । तथा चोक्ताः पाद्मे मन्त्रासनोपचाराः— आवाहननमस्कारौ प्रत्युत्थानमनन्तरम् । पुष्पाञ्जलिः स्वागतोक्तिरासनं भद्रपीठिका ।। अर्घ्यं पाद्यप्रतिग्राहं पाद्यप्रोक्ताभिमर्शनम् । आलेपनं चरणयोश्चन्दनक्षोदवारिभिः ।। अपामाचमनीयं तु प्रतिग्रहणदर्शनम् । उपस्पर्शनमालेपश्चन्दनाद्यम्बुचर्चया ।। पुष्पमाला धूपदानं मधुपर्कनिवेदनम् । घनसारो नागवल्ली ........... .... ॥ इति ॥ २३-२४ ॥ अब आसनादि उपचारों के समर्पण का प्रकार कहते हैं—आवाहन किये गये उन प्रभु को जो पादपीठ सामान्य हो और कोमल आस्तरण से भूषित हो ऐसा श्रेष्ठ आसन और पादपीठ समर्पित करे । इसके बाद पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय जलादि देकर पूजन करे ॥ २३-२४ ॥ सपुत्रदारमात्मानमष्टाङ्गपतनेन तु ॥ २४ ॥ चेतसा भक्तियुक्तेन निवेद्य तदनन्तरम् । आत्मात्मीयनिवेदनमाह—सपुत्रेति । अष्टाङ्गपतनेन (सा० ६।१८७-१८८) वक्ष्यमाणाष्टाङ्गप्रणामेन । इदानीमात्मनिवेदनविज्ञापनं चोक्तं पाद्मे— दासोऽहं ते जगन्नाथ सपुत्रादिपरिग्रहः । प्रेष्यः प्रशाधि कर्तव्ये मां नियुङ्क्ष्व हिते सदा ॥ इति ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकार भक्ति युक्त चित्त से निवेदन करने के बाद साष्टाङ्ग प्रणिपात करके पुत्र दार सहित अपने को निवेदित करे ॥ २४-२५ ॥ भगवानथ विज्ञाप्यः कृत्वा तत्पादगौ करौ ॥ २५ ॥ स्फुटीकृतं मया देव त्विदं स्नानवरं त्वयि । सपादपीठं परमं शुभं स्नानासनं महत् ॥ २६ ॥ आसादयाशु स्नानार्थं मदनुग्रहकाम्यया । अथ स्नानार्थं विज्ञापनमाह—भगवानिति द्वाभ्याम् । कृत्वा तत्पादगौ करावित्यत्र व्यस्तकरावित्यर्थः । तथा चोक्तं पारमेश्वरे— कृत्वाभ्यर्च्यर्चिदादेवस्य पाणिना दक्षिणं पदम् । दक्षिणेनाथ वामेन वामं संगृह्य मन्त्रतः ॥ (६।३०२-३०३) इति ॥ २५-२७ ॥

८० सात्वतसंहिता इसके बाद उनके चरणों पर अपना हाथ रख कर भगवान् से प्रार्थना करे कि हे देव ! मैंने आपके लिये स्नान सामग्री रख दी है । यह शुभ एवं मङ्गलदायी, पादपीठ और महान् स्नान का आसन है । हे प्रभो ! मेरे ऊपर अनुकम्पा कर स्नान के लिये लाई गई इस सामग्री को शीघ्र ग्रहण कीजिये ॥ २५-२७ ॥ स्नानासनं निवेद्याथ देवस्य द्वितयं तु वै ॥ २७ ॥ भक्तिनम्रेण शिरसा दद्यादर्घ्यं तु मूर्धनि । विनिवेद्य ततो हैमं सरत्नं च प्रतिग्रहम् ॥ २८ ॥ दद्याद्वै पाद्यकलशात् पाद्यं पादाम्बुजद्वये । सुशुभे पादुका चाथ तदन्ते स्नानशाटकम् ॥ २९ ॥ सुगन्धशालिसम्पूर्णं मात्रार्थं पात्रमुत्तमम् । दर्पणं पूर्णचन्द्राभं गन्धतोयमनन्तरम् ॥ ३० ॥ स्नानासनाद्युपचारानाह—स्नानासनमित्यादिभिः । अत्र पाणिप्रक्षालनार्थकगन्ध- तोयसमर्पणानन्तरं पादपीथोक्तावपि पाठक्रमादर्थक्रमस्य बलीयस्त्वेन स्नानासनसम- र्पणानन्तरमेव पादपीठोऽपि समर्पणीयः, 'सपादपीठं परमं शुभं स्नानासनं महत्' (६।२६) इति विज्ञापनश्लोक एवोक्तत्वात् । अत एव सात्वतोपबृंहणेश्वर(४।१४३) पारमेश्वर(६।३०४)योः स्नानासनानन्तरमेव पादपीठसमर्पणमुक्तम् । नन्वीश्वर(४।१४६)-पारमेश्वर(६।३०८)योरुभयोरपि 'पाणिप्रक्षालनार्थं तु पादपीठं ततः शुभम्' इति पाणिप्रक्षालनानन्तरमपि पादपीथोक्तिः परिदृश्यते, तस्याः का गतिरिति चेत्, सत्यम् । तत्रोभयत्रापि यथावस्थितसात्वतश्लोकानामेव प्रतिपादि- तत्त्वात् पौनरुक्त्यं दृश्यते । लक्ष्मीतन्त्रे तु— अनुज्ञाप्य ततः पश्चात् स्नानासनमनुत्तमम् । पादपीठमथार्घ्यं च ततः पाद्यप्रतिग्रहम् ॥ पाद्याम्बु पादुका स्नानशाटी मात्रा च शालिका । दर्पणं गन्धतोयं च पाणिप्रक्षालनार्थकम् ॥ दन्तकाष्ठं च वदनप्रक्षालाचमनाम्बुनी । गन्धतैलं च चूर्णं च शालिगोधूमसंभवम् ॥ हरिद्राचूर्णसंमिश्रमीषत् पङ्ककभावितम् । उद्वर्तनार्थं तदनु स्नानार्थं खलिसंयुतम् ॥ उष्णाम्बु चन्दनं चन्द्रमिश्रितं लेपनार्थकम् । (लक्ष्मी० ३९।५-९) इति सात्वतश्लोकानामुपबृंहितत्वान्न पादपीठपुनरुक्तिः । अतस्तत्पौनरुक्त्यं नानुष्ठानप्रतिपादकम्, किन्तु श्लोकपूरणार्थं ज्ञेयम् । यथा पारमेश्वरे मानसे भोगयाग- प्रकरणे—'मन्त्रराट् कर्णिकामध्ये लक्ष्म्याद्याः केसरादिषु' (जय० १२।८१; पा० ५।१३०) इति जयाख्यवचने प्रतिपादितेऽप्यविरुद्धार्थं परिगृह्य विरुद्धं लक्ष्म्यादित्वं परित्यज्य हृन्मन्त्रादित्वमेवाङ्गीक्रियते, तद्वदिहापीति सन्तोष्टव्यमायुष्मता । अत एवा- स्मत्तातपादैः सात्वतामृते पाणिप्रक्षालनतोयसमर्पणानन्तरं पादपीठो नोक्तः ।

षष्ठः परिच्छेदः ८१ प्रकृतमनुसरामः । दन्तकाष्ठमित्यत्र पारमेश्वरे—'दन्तकाष्ठं च तदनु कर्मण्य- क्षीरवृक्षजम्' (६।३०८) इत्युक्तम् । कपिञ्जलेऽपि—'चूतदण्डेन देवस्य दन्त- धावनमाचरेत्' इति । तच्च हेमादिमयमपि ग्राह्यम् । तदुक्तं पारमेश्वर एव द्वितीयेऽध्याये— षोडशाङ्गुलिदीर्घैस्तु वक्रग्रन्थिविवर्जितैः ॥ हेमादिनिर्मितैर्वापि कुशदूर्वादिभिस्तथा । (२।६१-६२) इति । मुखशुद्धिप्रतिग्रहं गण्डूषप्रतिग्रहमित्यर्थः । मुखप्रक्षालनं गण्डूषमित्यर्थः । पुन- राचमनीयानन्तरं ताम्बूलमपि देयम्, 'गण्डूषाचामसलिले ताम्बूलं गन्धभावितम्' (६।३०९) इति पारमेश्वरोक्तेः । तैलं बहु सुगन्ध्यं चेत्यत्र तैलसमर्पणप्रकारः पारमेश्वरे समाराधनाध्याये महोत्सवाध्याये च विस्तरेणोक्तो ज्ञेयः । रजनीचूर्णं हरिद्राचूर्णम् । पद्मकम्, तथैव प्रसिद्धं वैद्य(क)ग्रन्थे । चमषी तैलनिर्हरणार्थकसुगन्धद्रव्यविशेषः । इममर्थं सुस्पष्टं वक्ष्यति प्रतिष्ठाध्याये—'पूर्ववच्च ततोऽभ्यज्य विधिवच्चमसाम्बुना । क्षालयित्वा' (सात्वत० २५।९९-१००) इति । खली च मलनिर्हरणसाधन- द्रव्यम् ॥ २७-३५ ॥ इस प्रकार देवाधिदेव को स्नान, आसन तथा पादपीठ दोनों निवेदित करे । फिर भक्तिपूर्वक शिर झुका कर शिर पर अर्घ्य देवे । इसके बाद सुवर्ण निर्मित रत्नसहित प्रतिग्रह प्रदान करे ॥ २७-२८ ॥ फिर पाद्याम्बु के कलश से दोनों चरण कमलों के लिये पाद्य देवे, फिर सुन्दर पादुका प्रदान करे । इसके बाद स्थान शाटक प्रदान करे ॥ २९ ॥ मात्रा के लिये सुगन्धि एवं शालि से पूर्ण उत्तम पात्र प्रदान करे । पूर्णचन्द्र के समान स्वच्छ दर्पण, तदनन्तर गन्धतोय समर्पित करे ॥ ३० ॥ पाणिभ्यां क्षालनार्थं तु पादपीठं ततः शुभम् । दन्तकाष्ठं च तदनु मुखशुद्धिप्रतिग्रहम् ॥ ३१ ॥ दोनों हाथों से प्रक्षालन के लिये उत्तम पादपीठ प्रदान करे, फिर दन्त- काष्ठ देवे । इसके बाद मुखशुद्धि के लिये गण्डूष (कुल्ला के लिए जल) प्रदान करे ॥ ३१ ॥ जिह्वानिर्लेखनं चैव मुखप्रक्षालनं तु वै । पुनराचमनं देयमभ्यङ्गार्थमनन्तरम् ॥ ३२ ॥ तैलं बहु सुगन्धं च चूर्णं गोधूमशालिजम् । रजनीचूर्णसम्मिश्रमीषत् पद्मकभावितम् ॥ ३३ ॥ फिर जीभ साफ करने के लिये जिह्वा निर्लेखन देवे । तदनन्तर मुख प्रक्षालन के लिये जल देवे, फिर आचमन के लिये जल देवे । तदनन्तर अभ्यङ्ग के लिये अत्यन्त सुन्धित तैल, गोधूम और शालिका मिश्रित चूर्ण, जिसमें हरिद्रा का चूर्ण तथा पद्माकाष्ठ का चूर्ण मिश्रित हो वह (उपटन) प्रदान करे ॥ ३२-३३ ॥

८२ सात्वतसंहिता देयमुद्वर्तनार्थं तु चमषी तदनन्तरम् । स्नानार्थं खलिसंयुक्तं तोयमुष्णमनन्तरम् ॥ ३४ ॥ चन्दनं मुखलेपार्थं घृष्टं कर्पूरभावितम् । फिर उद्वर्तन के लिये चमषी (तैल निकालने के लिये सुगन्धि द्रव्य विशेष, मल दूर करने के लिये द्रव्य विशेष) उसके बाद स्नान के लिये खली संयुक्त उष्ण जल देवे । फिर मुख पर लेप के लिये कर्पूर भावित घिसा हुआ चन्दन देवे ॥ ३४-३५ ॥ क्षीरपञ्चविंशतिकलशस्नपनप्रकारकथनम् गव्यं प्रभूतं स्नानार्थं क्षीरं दधि घृतं मधु ॥ ३५ ॥ ऐक्षवं तु रसं हृद्यमभावे शार्करोदकम् । धात्रीफलोदकं चैव लोध्रतोयमनन्तरम् ॥ ३६ ॥ रक्तचन्दनतोयं च रजनीनीरमुत्तमम् । ग्रन्थिपल्लववार्यैव ततस्तु तगरोदकम् ॥ ३७ ॥ प्रियङ्गुवारि तदनु मांसीजलमतः परम् । सिद्धार्थकौदकं चैव सर्वौषधिजलं ततः ॥ ३८ ॥ पत्रपुष्योदके चैव फलबीजोदके तथा । गन्धोदकं च तदनु हेमरत्नजले ततः ॥ ३९ ॥ पुण्यतीर्थसरित्तोयं केवलं तदनन्तरम् । स्नानार्थं कल्पितेनैव ह्युदकेन विमिश्रितम् ॥ ४० ॥ योक्तव्यं क्रमशो ह्येतदर्घ्यपुष्पसमन्वितम् । अन्तरान्तरयोगेन स्नानानां च महामते ॥ ४१ ॥ क्षालनं चार्घ्यकलशादर्घ्यदानं समाचरेत् । अथ क्षीरादिपञ्चविंशतिकलशस्नपनप्रकारमाह—गव्यमित्यादिभिः । धात्रीफलम् = आमलकम्, लोध्रं = श्वेतलोध्रम्, 'गालवः शबलो लोध्रः' (२।४।३३) इत्यमरः । ग्रन्थिपल्लवं = स्थौणेयम् 'ग्रन्थिपर्णं शुकं बर्हं स्थौणेयं कुक्कुटम्' (२।४।१३२) इत्यमरः । तगरं तथैव प्रसिद्धम् । प्रियङ्गुः = फलिनी, 'प्रियङ्गु फलिनी फली' (२।४।५५) इत्यमरः । ननु 'स्त्रियौ कङ्गुप्रियङ्गू द्वे' (२।९।२०) इत्यमरवाक्यमप्यस्ति, विनिगमना- विरहात् कङ्कुरेव गृह्यतामिति चेन्न, अस्मिन् स्नपने बीजवारिणि कङ्गोः सत्त्वाद् अत्रत्य प्रियङ्गुशब्दस्य पूर्वोत्तरयोर्गन्धद्रव्यसाहचर्याच्च फलिनीपरत्वमेवाङ्गीकार्यम् । मांसी = जटामांसी । सिद्धार्थकः = श्वेतसर्षपः । सर्वौषधीजल-पत्रोदक-पुष्पोदक-फलोदक- बीजोदक-गन्धोदक-रत्नोदकानां द्रव्यविवरणमीश्वरपारमेश्वर्योः स्नपना-ध्याये व्यक्तमुक्तं ग्राह्यम् । अत्रापेक्षितकलशाधिवासादिकमपि तत्रैव ग्राह्यम् । अत्र नित्य-

षष्ठः परिच्छेदः ८३ स्नपनत्वादङ्कुरादिकं न कार्यम् । तथा चोक्तं पाद्मे— नित्ये च स्नपने नापि कौतुकं नाङ्कुरार्पणम् । निशाचूर्णेन स्नपनमिष्यते मण्टपस्थलम् ॥ इति । ‘स्नानार्थं कल्पितेनैव ह्युदकेन विमिश्रितम्’ (६।४०) इत्युक्तत्वाद् धात्री- फलोदकादिविंशतिद्रव्येष्वपि किञ्चित् स्नानीयजलं संयोज्यम्, ‘स्नानीयाम्बुसमेतानि देयान्यम्बून्धमूनि तु’ (लक्ष्मी० ३९।१३) इति लक्ष्मीतन्त्रोक्त्या क्षीरादिपञ्चकं विना आमलकाद्याम्बुष्वेव स्नानीयाम्बुसंयोजनस्य प्रतीयमानत्वात् । अर्घ्यपुष्पसमन्वितमिति पदं क्षालनमित्यस्य विशेषणं ज्ञेयम्, पारमेश्वरेऽप्येषामेव श्लोकानां प्रतिपादितत्वात् । केषुचित् प्रयोगेषु अर्घ्यपुष्पसमन्वितमिति पदस्य स्नपनद्रव्यविशेषणत्वाभिप्रायेण द्रव्यकलशेषु स्नानीयकलशात् किञ्चिज्जलमर्घ्यपात्रात् किञ्चित् पुष्पं च निक्षिप्ये- त्युक्तम् । तत् सात्वतोपबृंहणलक्ष्मीतन्त्रविरुद्धम् । यतस्तत्र ‘क्षीरं दधि घृतं गव्यम्’ (३९।९) इति प्रक्रम्य, हेमरत्नसरित्तीर्थकेवलाम्बूनि वै क्रमात् ॥ स्नानीयाम्बुसमेतानि देयान्यम्बून्धमूनि तु । अर्घ्यपात्रात्तथैवार्घ्यं स्नानान्तरान्तरा ॥ दद्यात् सपुष्पतोयेन क्षालनं चान्तरान्तरा । —(३९।१२-१४) इति सपुष्पत्वं क्षालनतोयस्य विशेषणं कृतम् । अर्घ्यपुष्पसमन्वितम् अर्घ्यपात्रे पूजनार्थं प्रक्षिप्तपुष्पैः सहितमित्यर्थः । अत्र क्षीरादिकलाशस्नपनानां मध्ये मध्येऽर्घ्यो- दकेनोपस्नानं केवलमर्घ्यदानं चोक्तम् । सति विभवे वस्त्राद्युपचारा अपि देयाः । तथा चोक्तमीश्वरपारमेश्वरयोः— प्रतिद्रव्यं तु वस्त्रेण हृद्यर्ध्यालम्भनमाल्यकैः ॥ धूपेन च समभ्यर्च्य ततस्तेनाभिषेचयेत् । यद्वार्घ्यं पाद्यमाचामं गन्धस्रग्धूपदीपकम् ॥ दद्याद् यथाक्रमं सर्वं केवलं चार्घ्यमेव वा ॥ इति । —(ई०सं० १५।१७५-१७७; पा०सं० १४।१७०-१७२) ननु बृहद्बिम्बस्नपनेऽर्घ्योदकस्योपस्नानाऽपर्याप्तत्वे का गतिरिति चेत्, सत्यम् । तदानीम्— अन्तरान्तरयोगेन कुम्भैः शुद्धोदपूरितैः ॥ स्नपनं चार्घ्यदानं च द्रव्याणां तु समाचरेत् । —(ई०सं० १५।७५-७६; पा०सं० १४।७६-७७) इतीश्वरपारमेश्वरयोः स्नपनाध्याये गतिरुक्तैव । एषां पञ्चविंशतिकलशानाम- भिषेचनमन्त्रास्त्वीश्वरपारमेश्वरयोर्दमनकोत्सवप्रकरणे— एको ह वै नारायण इति प्राक्कलशेन तु । तस्य ध्यानान्तःस्थस्येति द्वितीयकलशेन तु ॥