भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 124

पञ्चमः परिच्छेदः ६५ सौषुप्तं चातुरात्म्यं तत् प्रथमं विद्धि वासव ॥ अथ स्वापपदे ह्येवं विभज्यात्मानमात्मना । देवः प्रागादिभेदेन वासुदेवादिरूपतः ॥ समासव्यासभेदेन गुणानां पुरुषोत्तमः । सितरक्तसुवर्णाभ्रसदृशैः परमाद्भुतैः ॥ आदिमूर्तिसमै रूपैश्चतुर्धा ह्यवतिष्ठते । कैवल्यभोगफलदं भवबीजक्षयङ्करम् ॥ चातुरात्म्यं द्वितीयं तत् सुधासंदोहसुन्दरम् । अथ जाग्रत्पदे देवः सितरक्तादिभेदितैः ॥ चतुर्भुजैरुदाराङ्गैः शङ्खचक्रादिचिह्नितैः । नानाध्वजविचित्राङ्गैर्वासुदेवादिंसंज्ञितैः ॥ व्यूहैः सम्प्रविभज्यास्ते विभुर्नाम स्वलीलया । जाग्रत्पदे स्थितं देवं चातुरात्म्यमनुत्तमम् ॥ स्थित्युत्पत्तिप्रलयकृत् सर्वोपकरणान्वितम् । सर्वं तच्चिन्तयेत्तस्य विश्वं तिष्ठति शासने ॥ त्रिविधं चातुरात्म्यं तु सुषुप्त्यादिपदत्रिके । सुव्यक्तं तत्पदे तुर्ये गुणलक्ष्यं परं स्थितम् ॥ इति ॥ —लक्ष्मी० ८६-९२ (१०।२०-२७, ४०-४२) अब 'जाग्रद्व्यूह' का लक्षण युग भेद से एवं वर्ण भेद से होता है, इस बात को कहते हैं—जो स्थिति, उत्पत्ति तथा प्रलय करने वाला है, सभी सृष्टि के उपकरणों से समन्वित है, अपनी प्रकृति पर स्थित हो कर उत्पन्न होता है और अस्त होता है। सारा विश्व जिसके शासन में रहता है, उसे चतुर्थव्यूह (जाग्रद्व्यूह) समझना चाहिए। जिसके शासन में यह सारा विश्व स्थित है, वह विष्णु कृतयुग में सित, रक्त, पीत तथा नील चारों वर्णों को धारण करते हैं। हे महामते! त्रेता में वह विष्णु रक्त वर्ण वाले और श्वेत पीत वर्ण धारण करते हैं। द्वापर में वही पीत कृष्ण, सित, रक्त वर्ण धारण करते हैं तथा कलि में कृष्ण, सित, रक्त और पीत वर्ण धारण करते हैं ॥ ८६-८९ ॥ युगसन्ध्याचतुष्के तु बिभर्ति परमेश्वरः ॥ ८९ ॥ विभिन्नमूर्तिसामान्यं रूपं यत् तन्निबोध मे । सितरक्तं कृतान्ते तु रक्तपीतमतः परम् ॥ ९० ॥ पीतकृष्णं च तदनु कृष्णशुक्लमन्तरम् । वह परमेश्वर चारों युगों की सन्ध्या में विभिन्न रूप में होकर जिस प्रकार सामान्य रूप धारण करते हैं। हे सङ्कर्षण! अब उसे सुनिए—सत्ययुग के अन्त में वह श्वेत रूप, उसके बाद त्रेता के अन्त में वह रक्त पीत, उसके बाद द्वापर के